कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

NCDHR: दलित-पिछड़ी जातियों के शोषण और अत्याचार के ख़िलाफ़ बुलंद एक मजबूत आवाज़

 नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्यूमन राइट्स देश के 20 राज्यों में काम कर रही है.

नेशनल कैंपने फॉर दलित ह्यूमन राइट्स यानी एनसीडीएचआर देश में दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की आवाज़ को पिछले 20 से अधिक सालों से उठा रहा है. जिला से लेकर राज्य स्तर तक इसके कार्यकर्ता वंचितों की आवाज़ बन रहे हैं. इनका काम दलितों के साथ हो रही ज्यादती को प्रशासन के सामने लाना और उसकी कानूनी लड़ाई लड़ने का है.

नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स पिछले बीस सालों से दलितों के अधिकार की लड़ाई में लगा हुआ है. 1998 में इसकी स्थापना हुई. तब से आज तक यह भारत के 20 राज्यों में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. इसका मुख्य काम है- दलितों से जुड़े मामलों को उचित स्थान मिले, दलित अधिकारों से जुड़े मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मीडिया संस्थानों के संज्ञान में लाना, दलितों पर अत्याचार से जुड़े मामलों में राज्य पर जवाबदेही तय करना.

न्यूज़सेंट्रल24×7 ने इस संस्था के जिला और राज्य स्तर के अधिकारियों से मुलाकात की. पूर्वी चंपारण जिले में एनसीडीएचआर के संयोजक राजू बैठा ने बताया कि वह 2007 से इस संस्था में जुड़े हैं. तब से आज तक उन्होंने अपने जिले में हजारों ऐसे मामले उठाए हैं, जिन्हें दबाने या कुचलने का पूरा प्रयास किया गया.

राजू बैठा ने कहा कि पूर्वी चंपारण जिले में इस संस्था के 13-14 लोग हैं, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता, वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं. ये सभी लोग दलित जातियों से ताल्लुक रखते हैं.

राजू बैठा बताते हैं, “हमें समाचार पत्रों और दूसरे माध्यमों से दलितों के अत्याचार से जुड़ी ख़बरें मिलती हैं. इसके बाद हम मौके पर पहुंचते हैं. सभी पक्षों से बात करते हैं. फिर मामले की पूरी तफ़्तीश करने के बाद हम एक विस्तृत जांच रिपोर्ट तैयार करते हैं और जिला प्रशासन और पुलिस के ऊपर कार्रवाई को लेकर दबाव बनाते हैं. ये सभी काम हमलोग नि:शुल्क करते हैं.”

संगठन के काम को गिनाते हुए उनका कहना है कि पश्चिमी चंपारण के बेतिया में 2016-17 में दलित युवतियों के साथ गैंगरेप हुआ था. इस मामले में हमने सभी आरोपियों को जेल भिजवाया. फिलहाल इसमें स्पीडी ट्रायल चल रहा है.

एक अन्य मामले का जिक्र करते हुए राजू बैठा ने बताया, “बंजरिया के एक गांव में एक दलित की लड़की (खुशबू कुमारी) की शादी उसकी सौतेली मां ने ठीक कर दिया था. बच्ची नाबालिग थी. उसे पढ़ने का शौक था. मोतिहारी कोचिंग आने के बाद उस बच्ची ने हमसे संपर्क किया फिर उसका एडमिशन मोतिहारी गोपाल साह उच्च विद्यालय में कराया. इसके बाद बाल अधिकार कमिटी के पास हमने बच्ची से आवेदन करवाया. फिर जिले के एसडीएम की सहायता से बच्ची के परिवार वालों पर कार्रवाई की गई. इसके बाद उसके परिवार वालों ने गारंटी दी कि अब बच्ची के साथ कोई भी ज्यादती नहीं की जाएगी. तब से बच्ची ठीक स्थिति में है. इस साल उसने मैट्रिक की परीक्षा 82 प्रतिशत अंकों से पास की है.”

खुशबू कुमारी इकलौती नहीं हैं, जिनके जीवन में इस संगठन ने बदलाव लाए हैं.

एनसीडीएचआर की राष्ट्रीय महासचिव वीणा पल्लिकर ने बताया कि उनके संगठन ने दलितों-पिछड़ों से जुड़े कई मामले राष्ट्रीय स्तर पर उठाए हैं. उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय स्तर पर हमने कई मुद्दे उठाए हैं. हमने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम संशोधन विधेयक का ड्राफ्ट तैयार किया है. अनुसूचित जाति-जनजाति के सब प्लान का मुद्दा भी राष्ट्रीय उठाया है.” संगठन के बारे में उन्होंने आगे बताया कि यह 20 राज्यों में काम कर रही है. इसमें करीब 50 स्टाफ है, इसके अलावा वोलिंटियर्स और वकीलों का नेटवर्क भी है.

इस प्रकार नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्यूमन राइट्स देश की ऐसी संस्थाओं में शुमार है, जो दलित-पिछड़ी जातियों तथा वंचित समाज के हक दिलाने और उनके ऊपर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए प्रयासरत है.

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