कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

दिनकर की भारतीयता: वंचित वर्गों की आर्थिक मुक्ति ही प्रथम राष्ट्रधर्म

दिनकर पर रवीन्द्र, इकबाल और गांधी के राष्ट्रवादी चिंतन का गहरा प्रभाव है लेकिन उसकी भावी दिशा नेहरू के इतिहासबोध से जुड़ी है। 

जकल ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ की बहस फिर से चारों ओर है। पिछले सालों में अनेक भारतीय प्रतीकों की तरह दिनकर की छीना झपटी शुरू है। कुछ सत्ता संगठनों के लिए इसके राजनीतिक और भावनात्मक कारण ज्यादा हैं सांस्कृतिक और वैचारिक कम। एक कारण दिनकर के बहुआयामी वैचारिक स्तर और यात्राएं भी है। आखिर दिनकर के पास भविष्य के भारत का नक्शा कैसा था? आज यह एक जलता हुआ सवाल है।

दिनकर अपने समस्त काव्य चिंतन और गद्य दर्शन में एक नए भारत की खोज में उलझे हुए दिखाई देते हैं। भारत एक राष्ट्र है की धारणा 19वीं सदी के सांस्कृतिक चिंतन की देन है। बंगाल, महाराष्ट्र और हिंदी प्रदेश ने उलझे हुए ढंग से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी कि भारत इंग्लैण्ड से भिन्न किस्म का सामासिक देश है।

 दिनकर पर रवीन्द्र, इकबाल और गांधी के राष्ट्रवादी चिंतन का गहरा प्रभाव है लेकिन उसकी भावी दिशा नेहरू के इतिहासबोध से जुड़ी है।

दिनकर का भारत भारतीय नवजागरण के संकट से काफी कुछ मुक्त इसलिए है कि उनके ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ पर भारतीय विविधता और आधुनिकता का सकारात्मक प्रभाव है। दिनकर नए भारत की खोज के लिए आख्यान को कई धरातलों और दिशाओं में ले जाते हैं।

प्रस्थान उनके निजी और ग्रामीण परिवेश से होता है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिवेश से जुड़कर आकार ग्रहण करता है। दिनकर का भारत बोध जन गण और प्रभु वर्ग के तनाव से पैदा होता है। किसान और गाँव की लूट पर फिरंगी शासन का पूरा ताना बाना खड़ा था। इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति तक भारतीय खेती की लूट और पारंपरिक उद्योग की बर्बादी पर टिकी थी। दिनकर की बीस साल की उम्र में रचित किसान विद्रोह केंद्रित पहली काव्य पुस्तिका विजय संदेश उपनिवेश और उसके देसी आधार ज़मींदार विरोध का उदाहरण है। दिनकर के राष्ट्र चिंतन में यह तनाव आज़ाद भारत की रचनाशीलता में भी लगातार बना रहता है।

राष्ट्र किसका होना चाहिए और कैसा होना चाहिए। यह तनाव उन्हें गांधी से मार्क्स तक की यात्रा कराता है। उनके लिए हाशिए की आर्थिक मुक्ति ही प्रथम राष्ट्रधर्म है।

स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच मूल्यों, संस्कृतियों और भाषाओं का जैसा अंतर्विरोध भारत में है यूरोप के लिए यह अकल्पनीय है। दिनकर की शुरूआती कविताओं में मिथिला और ग्रामीण लोक संस्कृति की अनोखी व्यंजना है। बाद की कविताओं में राष्ट्रीयता स्थानीयता पर हावी होती चली गई। दिल्ली पर लिखी कविताओं में गाँव फिर लौटता है। वस्तुतः राष्ट्रवाद स्थानिक राष्ट्रीयता का उत्पीड़क है लेकिन तत्कालीन परिवेश की शायद वह जरूरी मांग थी। किसान जीवन पर यदि दिनकर खण्डकाव्य लिखते तो आज वह करोड़ों किसानों की मुक्ति का लाइट हाउस बन सकती थी। फिर भी जनतंत्र का जन्म जैसी कविताएँ जन भारत की खोज है।

दिनकर के सामने ही भारत की भारतीयता संकटग्रस्त हो चुकी थी। संकीर्णता के विचारों ने अनेक स्तरों पर भारत को कब्जे में ले लिया था लेकिन अतीतबोध एक खतरनाक यात्रा पर था। एक ओर ब्रिटिश बौद्धिकता भारत को संपेरों और मनुस्मृति-पुराणों के देश के रूप में गढ़ रही थी, दूसरी ओर पुनरुत्थानवादी विचारधारा भी कमोवेश इसकी पुष्टि दूसरे स्तरों पर कर रही है। राष्ट्र के एकल आख्यान और प्राधिकार को दिनकर ने कविता और गद्य में जितनी बड़ी चुनौती दी है हिंदी का कोई दूसरा उपनिवेशकालीन लेखक नहीं दे पाया।

दिनकर की अतीत और वर्तमान के रिश्तों पर ये पक्तियां गौरतलब हैं –

” जब भी अतीत में जाता हूँ

मुदों को नहीं जिलाता हूँ

पीछे हटकर फेंकता वाण

जिससे कंपित हो वर्तमान।”

 

आजकल शव साधना की बहार है। दिनकर दो संस्कृत महाकाव्यों में अधिक विविध, लोकतांत्रिक, रचनात्मक और राजनीतिक महाकाव्य महाभारत की कथा चुनते हैं और सिर्फ रूपक के माध्यम से वर्तमान भारत की समस्या का हल पेश करते हैं। कुरुक्षेत्र एक साथ भारतीय युद्ध की हिंसा की परंपरा और आधुनिकता से उपजे युद्ध की हिंसा दोनों को कटघरे में खड़ा कर देती है। रश्मिरथी सत्ता में बहिष्कृत को जगह दिलाने का आख्यान है।

अतीत और वर्तमान के रिश्तों पर संस्कृति के चार अध्याय को नए सिरे से देखा जाना चाहिए। यह भारतीयता की अवधारणा पर दिनकर के चिंतन का निचोड़ है। कट्टर हिन्दुत्वपंथी के लिए यह बेहद असुविधाजनक किताब है। दिनकर भारत की खोज करते हुए औपनिवेशिक ज्ञानकांड की राजनीति का गहरा खंडन करते हैं। दिनकर के भारत की निर्मिति में सिर्फ वेद और उपनिषद ही नहीं बल्कि बौद्ध, जैन, पारसी, इस्लाम का बराबर का योगदान है।

लेखक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर होने के साथ-साथ हिंदी के कवि और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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