कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नए हिंदुस्तान का नया इंसाफ- गुरुग्राम की हिंसा आम हो चुकी हमारी बीमार सोच का हिस्सा है.

हर बार की तरह, यहां भी मज़लूम ही गुनहगार बन गया है. पुलिस ने पीड़ितों के खिलाफ़ भी केस दर्ज कर दिया है. वो अब हर तरह से टूट चुके हैं.

“जब हमारा ये तीन मंज़िला घर बनकर पूरा हो गया, तब हमने छत पर सबसे ऊंचे स्थान से राष्ट्रीय ध्वज को फहराने का फैसला किया, क्योंकि हमारी छत गांव में सबसे ऊंची है और यहां से पूरा गांव इसे देख सकता है.”, बुरी तरह से चोटिल मोहम्मद साजिद ने कहा. “और फिर भी उन्होंने हमें पाकिस्तान जाने के लिए कहा और ऐसा सलूक़ किया.”

साजिद पूछते हैं: “हमें पाकिस्तान क्यों जाना चाहिए? हमें पाकिस्तान के साथ क्या करना है? यह हमारा देश है और हम इसे प्यार करते हैं. फिर भी, देखो कि उन्होंने हमारे साथ क्या किया है.”

कारवां-ए- मोहब्बत की एक टीम हमले के पांच दिन बाद उनसे मिलने गुरुग्राम स्थित भोंसडी गांव के उनके घर गई थी. डरे-सहमे चहरे, ताज़ा ज़ख्मों के निशान, चारों तरफ़ फैले कांच के टुकड़े और ज़मीन पर लगे खून के धब्बों ने उनकी दर्द बयानी को थोड़ा आसान कर दिया था. घर के लगभग हर बिस्तर पर कोई घायल दर्द से कराह रहा था. अभी बच्चे घर से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं. वो स्कूल जाने से भी डर रहे हैं.

घर के मुखिया साजिद के बड़े भाई हैं, जो एक हाथ से विकलांग है. वह बिलक-बिलक कर मुझसे सवाल कर रहे थे. उनको संभालना मुश्किल था. उनका एक ही सवाल था: ‘अब मैं अपने घर को कैसे बचाऊंगा? मेरे परिवार का क्या होगा?’

बात दोबारा तिरंगे पर आकर अटक गई. “मैंने अपने घर के बाहर झंडा नहीं फहराया है,” मैंने कहा. “हम जानते हैं कि आप अपने देश से प्यार करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज को फहराना इसका सबूत नहीं है.”

साजिद ने टोका, “हमने किसी को कुछ भी साबित करने के लिए झंडा नहीं लगाया है. हमने ऐसा इसलिए किया क्योंकि हम अपने देश से प्यार करते हैं. हमारे नए घर के सबसे ऊंचे स्थान पर हमारे झंडे को फहराने की इच्छा – हमारे दिल से निकली है.”

साजिद चार भाइयों में सबसे छोटे हैं. वह गुरुग्राम से लगभग 70 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के बागपत के पांची गांव में जन्मे और पले-बढ़े हैं. उनके पास कोई जमीन नहीं थी, और वे हमेशा काम की तलाश में रहते थे. इसलिए, 25 साल पहले, उनमें से एक भाई काम की तलाश में में यहां आया था. तब गुड़गांव, तेजी से शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की तरफ़ बढ़ रहा था. शुरू में, उन्होंने गैस स्टोव बनाने का रोजगार पाया. शहर के बढ़ने से तरक्की के अवसर बढ़े, और एक-एक करके उन्होंने अपने भाइयों, और बेटों को भी यहां बुला लिया.

सबसे बड़े भाई भी उनके साथ आए थे. वो घर पर रहते हैं, बच्चों की देखभाल करते हैं और उन्हें स्कूल ले जाते हैं; कभी-कभी वो अपनी दुकान पर बैठ जाते हैं. उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स और पुराने फर्नीचर की मरम्मत के लिए अपने काम का विस्तार किया. 2006 में, वे अपने बाकी परिवार को ले आए, और प्रत्येक भाई ने गुड़गांव के आसपास के गांवों में एक घर किराए पर लिया.

ऐसे जितने भी केस कारवां-ए-मोहब्बत ने देखे हैं, वहां यही गंदी प्रक्रिया दोहराई जाती है. नफ़रत और धार्मिक हिंसा के शिकार पीड़ितों पर ही कभी गौकशी तो कभी लव जिहाद जैसे बेबुनियाद आरोप और फर्जी मुकदमे लगा दिए जाते हैं. इसलिए, अपने हमलावरों के खिलाफ़ लड़ने के बजाय, वे अपने बचाव के लिए इस दल-दल से बाहर हो जाते हैं. समय के साथ, पुलिस या गांव के बुजुर्ग एक एकतरफ़ा “समझौता” करवा देते हैं. अदालत से बाहर निकलते ही पीड़ित अपने हमलावरों को नहीं पहचान पाते, और बदले में पुलिस उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामलों को हटवा देती है!

यह इलाके का सबसे आलीशान घर है. हो सकता है कि कुछ ग्रामीणों ने जलन के कारण यह हमला किया है. “हां शायद नज़र हाय लग गई”, या ‘शायद इसे बुरी नज़र लग गई है.”, साजिद ने कहा.

*खूनी होली*

21 मार्च को होली के दिन, चारो भाई, उनकी पत्नियां और बच्चे- सभी साजिद के घर पर इकट्ठा हुए थे. महिलाएं रसोई में खाना बना रही थीं, बड़े आदमी गपशप कर रहे थे और बच्चे घर के आसपास खेल रहे थे. लड़कों ने अपने घर के सामने एक खाली प्लॉट में क्रिकेट खेलने का फैसला किया. उनमें से कुछ सिर्फ तीन या पांच साल के थे.

अचानक, नौ लोग तीन मोटरसाइकिलों से वहां पहुंचे, उनके चेहरे होली के रंगों से दमक रहे थे. शायद वे नशे में थे. बेवजह, उन्होंने इन लड़कों का अपमान किया, मुसलमानों के लिए अपमानजनक शब्द कहे, और धमकी देकर उन्हें पाकिस्तान जाने के लिए कहा. लड़कों में बहस हुई. डरकर, मुस्लिम लड़कों ने निवेदन किया, “हम खेलना बंद कर देंगे. हम यहां कभी नहीं खेलेंगे.”, लगभग आधे घंटे बाद, तलवारें, भाले, हॉकी डंडे लिए एक भीड़ ने उनके घर पर धावा बोल दिया. उन्होंने घर पर पत्थर फेंके, और सामने कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों को तोड़ दिया. टूटी खिड़कियों से वे अंदर घुस आए.

परिवार के लोग दहशत में चिल्लाने लगे, क्योंकि भीड़ ने तुरंत लाठी डंडों से पीटना शुरू कर दिया. एक वृद्ध महिला ने अपने हाथों को जोड़ लिया, हमलावरों से भीख मांगते हुए रहम करने को कहा; उन्होंने अपनी तलवार रोकी और उसे थप्पड़ मारा. छह साल की एक लड़की एक अलमारी में छिप गई थी, उन्होंने उसे भी बुरी तरह पीटा. एक डेढ़ साल के बच्चे को बिस्तर पर पटक दिया. चारों तरफ तबाही थी. परिवार के कई सदस्य पहली मंजिल के बरामदे में छिप गए, क्योंकि लोहे के दरवाजे को हमलावर नही तोड़ सकते थे, लेकिन उन्होंने खिड़की पर लगी ग्रिल को तोड़ा और अंदर आ गए, उन्होंने सभी को पीटा और यहां तक ​​कि उनमें से एक को छत से फेंक दिया.

विकलांग भाई, बच्चों के साथ, दूसरी मंजिल के बरामदे में शरण लिए हुए थे. हमलावरों के आते ही बच्चों ने बरामदे के लोहे के दरवाजे को दबाव से रोके रखा. वहां की लड़कियों में से एक- दानिशता ने, असाधारण साहस दिखाया और अपने सेल फोन से सबकुछ रिकॉर्ड करने लगी.

वास्तव में, यह विडियो ही है, जिसने शायद परिवार को बचाया और दुनिया को इस बात की जानकारी देने में मदद की कि उन्हें क्या नुकसान हुआ है. हमलावर लोहे के दरवाजे को नहीं तोड़ सके, लेकिन पहली मंजिल के बरामदे से उन्होंने दानिशता को सब फिल्माते हुए देखा. उन्होंने उसे धमकी दी; वह कहती है कि उनमें से एक ने उस पर गोली भी चलाई थी. उसने ध्यान से कैमरे को छिपाया, और यह फैसला किया कि अगर वो उसे पकड़ लेते हैं, तो भी वह उन्हें नहीं बताएगी कि उसका फोन कहां है.

परिवार ने पुलिस की हेल्पलाइन पर कॉल किया और दो आदमी लगभग 8 किमी दूर पुलिस स्टेशन गए. फिर भी, हमलावरों के जाने के आधे घंटे बाद ही पुलिस पहुंची. पुलिस शुरू में इसे क्रिकेट खेलने पर हुए एक साधारण विवाद के रूप में खारिज करना चाहती थी. लेकिन, विडियो सबूत था कि यह एक सामप्रदायिक अपराध है. एक दूसरा विडियो, जो इतने व्यापक रूप से नहीं फैल सका, उसमें साफ़ मालूम होता है कि हमला शायद गुरुग्राम के सांप्रदायिक माहौल को खराब करने के मकसद से हुआ था.

जो 1 मिनट की विडियो पूरी दुनिया का दिल दहला रही है सोचिए वह एक घंटा हम पर कैसे गुजरा होगा.’

घायल लोगों को पुलिस ने दिल्ली के लोक नायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती कराया. सभी को छह दिनों के बाद छुट्टी दे दी गई, लेकिन हमने उन्हें घर पर फिर से काम करते हुए पाया. वे अफ़वाहों से चिंतित थे कि उनके हमलावरों ने खुद को अस्पताल में भर्ती कराया है. यह दावा किया गया था कि पहले मुस्लिम परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा हमला किया गया था, और यहां तक ​​कि हमलावर बुरी तरह से घायल हो गए हैं!

परिवार ने कई बैठकें की कि अब आगे क्या करना है. सबसे बड़े भाई और कुछ अन्य लोगों ने बागपत में अपने गांव वापस जाने की सलाह दी है. वहां कोई नौकरी नहीं है और बच्चों को अपना स्कूल छोड़ना होगा. उन्होंने कहा, लेकिन कम से कम, मुसलमानों के बीच रहकर वे सुरक्षित रहेंगे. परिवार के बाकी सदस्य सहमत हो गए हैं और लगभग सबने घर बेचने का मन बना लिया है.

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हालांकि, जाते-जाते, जब हमने इस बारे में पूछा, तो साजिद ने जवाब दिया, “हमने इस पर विचार किया है. अगर न्याय हुआ है, तो हम अपना घर क्यों छोड़ेंगे?” गुरुग्राम के पुलिस प्रमुख, हिमांशु गर्ग ने बाद में सिटीजन वेबसाइट को इसकी पुष्टि की. हमले के मुख्य आरोपी राजेंद्र ने पुलिस से शिकायत की है कि पहले मुस्लिम परिवार के लोगों ने सिर्फ़ पेट पर गेंद लगने का विरोध करने के लिए, उसके सिर पर बैट से वार किया था. गर्ग का कहना है कि पुलिस ‘ड्यूटी बाउंड’ है मामला दर्ज करने के लिए.

गुरुग्राम में भी यही सनकी नाटक दोहराया जा रहा है. यह नए भारत का नया न्याय है!

हमने पीड़ित परिवार से बात की है. हमारे वकील भी झूठे केस को खत्म करने के लिए अदालतों में याचिका दर्ज कर रहे हैं. लेकिन फिलहाल सब पूरी तरह से मायूस और टूटे हुए हैं. मुझे डर है कि वो अब गुरुग्राम छोड़ देंगें. यह एक और त्रासदी होगी, उस हिंदुस्तान के विचार के खिलाफ़ जहां विभिन्न धर्मों के लोग विश्वास, दोस्ती और मोहब्बत के साथ रहते हैं.

(यह लेख अलिशान जाफ़री द्वारा अनुवाद किया गया है.)

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