कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

शर्मनाक: सीवर सफ़ाई के दौरान मौत के ज़्यादातर मामलों में न दर्ज़ होती एफ़आईआर, न मिलता है मुआवज़ा

पिछले छह महीनों में हर चौथे दिन एक शख़्स की मौत सीवर में सफ़ाई करने के दौरान हुई है।

सीवर सफ़ाई के दौरान सफ़ाई कर्मियों की मौत के मामले में एक शर्मनाक सच्चाई सामने आई है। एक रिपोर्ट में सामने आया है कि सफ़ाई के दौरान हुई मौत के ज़्यादातर मामले में अभी तक ना एफ़आईआर दर्ज हुई है ना कोई मुआवजा ही मिला है।

द वायर के अनुसार मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन का काम करने वाले सामाजिक संगठनों के गठबंधन राष्ट्रीय गरिमा अभियान ने 11 राज्यों में सर्वे के बाद एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में सफ़ाई के दौरान हुए मौत के 51 मामलों को आधार बनाया गया है। इन मामलों में कुल 97 लोगों की मौत हुई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सफाई के दौरान मौत के 59 प्रतिशत मामलों में एफआईआर अबतक दर्ज नहीं की गई है। वहीं 16 प्रतिशत मामलों में मृतक के परिजनों को एफआईआर दर्ज होने या न होने की कोई जानकारी नहीं है।

केवल 35 प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर दर्ज की गई है। इसमें से 31 प्रतिशत मामलों में ही पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया गया है। बाकी के 69 प्रतिशत मामलों में मृतक के परिजन अभी तक मुआवजे को तरस रहे हैं।

उक्त रिपोर्ट के अनुसार जिन भी मामलों में मुआवज़ा दिया गया है उनमें कुछ मामले ही ऐसे हैं, जिनमें मैनुअल स्कैवेंजिंग (एमएस) एक्ट 2013 की धारा 7 और 9 के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है। एमएस एक्ट के तहत मामला दर्ज होने से पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा मिलने में आसानी होती है। लेकिन इस एक्ट के तहत दर्ज किए गए मामलों की संख्या काफी कम है। ज्यादातर मामलों में कोशिश की गई है कि किसी को सजा न हो और पैसे देकर मामले को खत्म कर दिया जाए।

27 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत सरकार मामले में यह आदेश दिया था कि 1993 से लेकर अब तर सीवर में मरे लोगों की पहचान की जाए और पीड़ित परिवारों को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाए। लेकिन, कोर्ट के आदेश के चार साल बाद भी सभी राज्यों ने इस मामले में जानकारी नहीं दी। बल्कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के पास यह जानकारी भी नहीं है कि देश में कुल कितने सफ़ाई कर्मचारी हैं।

बेंगलुरु के अलावे किसी भी मामले में एक भी कॉन्ट्रैक्टर या नियोक्ता की गिरफ़्तारी नहीं हुई है। जिन मामलों में एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई, उनके परिजनों का कहना है कि उनके ऊपर लगातार समझौता करने का दबाव बनाया जाता है। ज्ञात हो कि सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में 172 लोगों की मौत सीवर में दम घुटने से हुई थी। वहीं साल 2017 में यह आंकाड़ा 323 तक पहुंच गया था। यह सर्वेक्षण 2018 जनवरी से जुलाई के बीच किया गया था। पिछले छह महीनों में हर चौथे दिन एक शख़्स की मौत सीवर में सफाई करने के दौरान हुई है।

राष्ट्रीय गरिमा अभियान के सदस्य रहे आसिफ शेख़ ने द वायर से कहा, ‘वाल्मीकि, मेहतर, डोम, भंगी और हलालखोर जैसे कई अन्य दलित समुदाय के लोग मैला ढोने के काम में हैं और इन्हें अपने हाथों से मानव-मल या सीवर लाइनों और सेप्टिक टैंक को साफ करने के लिए मजबूर किया जाता है। प्रशासन इस समुदाय को जानबूझकर नज़रअंदाज कर रहा है और इनका पुनर्वास नहीं किया जा रहा है।’

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मानव अधिकारों का पूरी तरह से उल्लंघन करते हुए भारत के दलितों को जाति आधारित काम जैसे कि मैनुअल स्कैवेंजिंग में धकेला जाता है।  इस प्रकार का भेदभाव शुद्धता, प्रदूषण और अस्पृश्यता की धारणा से उत्पन्न होता है। रिपोर्ट से यह बात भी सामने आई है कि ऐसे मामले में एक भी परिवार को ‘मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए चलने वाली स्व-रोजगार योजना’ के तहत कोई सहायता नहीं दी गई।

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