कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: “हम होली-दिवाली साथ में ही मनाते थे पर अब हिन्दुओं के मुहल्ले में डर लगता है”

कोरोना वायरस के प्रकोप से दिल्ली दंगा पीड़ितों के ऊपर दोहरी मार पड़ी है.

दिल्ली के उत्तर पूर्वी हिस्से में दंगे के बाद की स्थिति सामान्य होती दिखती है. मुस्तफ़ाबाद इलाके में दंगा पीड़ित लोग ठिकाने की तलाश में लोग एक जगह से दूसरे जगह भटक रहे हैं. इस इलाके में कई राहत शिविर लगे हैं, जहां हजारों की संख्या में लोगों ने शरण ली है.

मुस्तफ़ाबाद के ईदगाह में दिल्ली सरकार और कई सामाजिक संगठनों की ओर से राहत शिविर लगाई गई है. यहां सैकड़ों की तादाद में मुस्लिम परिवारों ने शरण ली है. इन्हीं शरणार्थियों में शिव विहार के गली नंबर 14 के निवासी 71 वर्षीय ग़ुलाम मोहम्मद शामिल हैं. दंगे के बाद ग़ुलाम मोहम्मद ने अपना घर-बार छोड़ परिवार के सभी 6 लोगों को लेकर अपने रिश्तेदार के यहां मुस्तफ़ाबाद में शरण ली थी. ग़ुलाम बताते हैं, “मैं सीआरपीएफ़ से रिटायर्ड हूँ. 1971 की जंग में मैंने लड़ाई लड़ी थी. पूरी ज़िंदगी मैंने देश के लिए वफ़ादारी की है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव में देश की सरकार और दिल्ली की पुलिस ने हमारे साथ गद्दारी कर दी. मैं दंगों के वक्त पुलिस को कॉल लगाता रहा, करीब 100 कॉल लगाने के बाद भी पुलिस ने हमारा जवाब देना जरूरी नहीं समझा.”

ग़ुलाम मोहम्मद. (चित्र साभार: अभिनव प्रकाश)

दंगों के बारे में वे आगे बताते हैं, ” मंगलवार, 25 फरवरी की शाम 5 बजे हमने देखा कि नाले के पास भीड़ घरों को आग लगा रही थी और लोगों को मार रही थी. यह सब देखकर हमने 100 नंबर पर पुलिस को कॉल लगाना शुरू किया. दो घंटे तक कोई जवाब नहीं आने पर हमने अपने रिश्तेदारों को फ़ोन करना शुरू किया. मेरे रिश्तेदार ने कहीं किसी से बात करके सेना के जवानों को हमारे पास भेजा, जिसकी वजह से हमलोग बाहर आ सके. मेरे घर में 2 औरतों समेत कुल 6 लोग हैं. जान बचाने की हड़बड़ी में हमलोग जैसे थे वैसे ही वहां से भाग निकले. ना कुछ कपड़ा लिया, ना ही कोई आधार कार्ड या डॉक्यूमेंट. अपने मुहल्ले से निकलकर हम चमन पार्क में एक राहत शिविर में रहे. उस शिविर में हमें कपड़े मिले. आज हमें मालूम चला कि ईदगाह के पास सरकार ने राहत शिविर लगाई है, तो हम यहां आ गए.”

इसी कैम्प में शिव विहार गली नंबर 13 के निवासी 54 वर्षीय मो. बशारत भी मायूस बैठे हैं. वे बताते हैं, ” मुस्तफ़ाबाद चौक पर मेरी दो दुकानें थी. पान, बीड़ी, सिगरेट और राशन का सामान बेचा करता था. इन दुकान में तीन लाख से ज्यादा की पूंजी लगी थी. जय श्री राम के नारे लगाती भीड़ ने मेरे सामने ही मेरी दुकान जला दी. इसके बाद जब मैं अपने घर पहुंचा तो वहां भी लूट मची हुई थी. लोगों के ऊपर तेजाब, लाठी और डंडे से हमले किए जा रहे थे. किसी तरह जान बचाकर हम वहां से निकलकर चमन पार्क पहुंचे. पुलिस ने हमारी कोई मदद नहीं की. हमें ना इस पुलिस से कोई उम्मीद है, ना ही दिल्ली की सरकार से. हमारे साथ इतना कुछ हो गया पर हमारा विधायक हमें पूछने तक नहीं आया.”

कैम्प के महिला बैरक में बैठी शिव विहार गली नंबर 11 की 35 वर्षीय मुमताज परवीन ने बताया कि हमलावर भीड़ में बाहर के लोग तो थे ही, लेकिन हमारे मुहल्ले के स्थानीय लोगों ने भी उस भीड़ का साथ खूब दिया. परवीन बताती हैं, “मंगलवार (25 फरवरी) की दोपहर से ही आगजनी की ख़बरें आ रही थी. शाम को मैं अपने बच्चों के साथ बैठी खाना पका रही थी. तभी हमारी गली में भयानक शोर हुआ. बंद दरवाजों को तोड़कर भीड़ घरों में घुस रही थी. हम सभी लोग छत पर भाग कर चले गए. कुछ घंटों बाद हम अपने घरों से बाहर निकलकर चमन पार्क आए. उस दिन की याद करके हमारे रूह कांप जाते हैं. दंगाई हमारे साथ कुछ भी कर सकते थे.”

(चित्र साभार: अभिनव प्रकाश)

मुस्तफ़ाबाद इलाके में अलग-अलग सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों द्वारा कई राहत शिविर लगाए गए हैं. इनमें पीड़ितों के रहने, खाने, ईलाज और क़ानूनी मदद का इंतजाम किया गया है. बाबूनगर के गली नंबर 4 के अल-इस्लाह स्कूल में सिटिजन्स फॉर कलेक्टिव पीस की ओर से राहत शिविर लगी है. इसमें तकरीबन 50 लोगों के रहने, खाने और ईलाज की व्यवस्था है. इसी शिविर में रह रहे मो. जीशान बताते हैं कि अब आगे से कभी भी वो हिन्दुओं के मुहल्ले में नहीं रहेंगे.

जीशान का कहना है, “मेरे पास एक ई-रिक्शा थी. 25 फरवरी की शाम की दोपहर लालबाग और करावलनगर के बीच रिक्शा से सवारी ढो रहा था. तभी एक भीड़ आई और मेरे रिक्शे से लोगों को उतार कर मुझे मारा और रिक्शा को मेरे सामने ही आग लगा दी. घर पहुंच कर देखा तो वहां भी हमारा कुछ नहीं बचा था. हमारी बीवी-बच्चों को भी बुरी तरह मारा गया था. इससे पहले हमें कभी भी डर नहीं लगा. ईद-होली में हम सबलोग एक साथ मिलकर रहते थे, लेकिन अब मैं मुस्लिम एरिया में ही रहूँगा. हिन्दुओं के बीच रहना अब सेफ नहीं है.”

दिल्ली दंगों में कम से कम 53 लोगों के मौत की पुष्टि हो चुकी है. 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं. हजारों लोग दंगे के बाद से बेघर हो चुके हैं. दिल्ली सरकार 2 मार्च से राहत शिविर लगा रही है. लेकिन, इसके इंतजाम पीड़ितों की संख्या के हिसाब से नाकाफ़ी हैं. मौजूदा दौर में जब दिल्ली के भीतर 31 मार्च तक लॉक डाऊन की गई है और जनजीवन अस्त-व्यस्त है, दिल्ली दंगे के पीड़ित असहाय महसूस कर रहे हैं. कोरोना वायरस दंगा पीड़ितों के लिए दोहरी मार बनकर सामने आया है.

इधर, दिल्ली सरकार ने दंगे में मारे गए लोगों के परिजनों को 10 लाख, नाबालिग मृतकों के परिजनों को 5 लाख, पूरी दुकान या मकान जलने पर 5 लाख, गंभीर रूप से घायलों को 2 लाख, मामूली रूप से चोटिल लोगों को 20 हजार का मुआवज़ा देने की घोषणा की है. हालांकि सभी पीड़ितों के पास अभी मुआवज़े की राशि नहीं पहुंची है.

(लेखक कारवां मीडिया टीम से जुड़े हैं.)

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