कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असम के एनआरसी से भी ज्यादा ख़तरनाक है NPR

ग़ैर-भाजपा शासित प्रदेश की सरकारों को एनपीआर का बहिष्कार करना होगा, वरना वे भी भारत में जर्मनी के नाज़ीवाद के समर्थक माने जाएंगे.

दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दावा किया कि 2014 में आई उनकी सरकार ने देशभर में एनआरसी लागू करने की कोई चर्चा अभी तक नहीं की है. लेकिन, हमें पता होना चाहिए कि संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण में पूरे देश में एनआरसी (एनआरआईसी) की बात कही गई थी. प्रधानमंत्री मोदी के बेहद करीबी और देश के गृह मंत्री अमित शाह ने संसद के भीतर और बाहर भी कई बार देशभर में एनआरसी लागू करने की क्रोनोलॉजी समझायी है. इसलिए एनआरआईसी के बारे में प्रधानमंत्री मोदी की बात जाहिर तौर पर झूठी है.

प्रधानमंत्री मोदी का भाषण सुनकर कई लोगों को लगा कि सरकार अब देशभर में एनआरसी लागू करने के अपने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे से पीछे हट गई है. ऐसा लगा कि देशभर में विरोध झेल रहे प्रधानमंत्री ने राष्ट्रव्यापी एनआरसी के मुद्दे को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

हालांकि कुछ दिनों के भीतर ही यह साफ हो गया कि उनकी सरकार लोगों की बात सुनने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है और जनता की चिंताओं को समझने की उनकी मंशा ही नहीं है.  प्रधानमंत्री एनआरआईसी को दूसरे रास्ते से लेकर आने की तैयारी में लगे हुए थे.

प्रधानमंत्री के भाषण के बाद गृहमंत्री ने भी तुरंत ही औपचारिक तौर पर कहा कि एनआरआईसी को लागू नहीं किया जाएगा, लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि. प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों ने ही कहा कि फिलहाल एनआरसी को लेकर चर्चा नहीं हुई है, उन्होंने भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा. लेकिन इन प्रदर्शनों के बीच ही सरकार एक और नियम लेकर आ गई, जिससे स्पष्ट है कि वह देश को तोड़ने और अशांत करने की अपनी मंशा से हटी नहीं है. अब सरकार ने नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर पर काम करने की घोषणा की है.

सरकार के जिस मंत्री ने एनपीआर की घोषणा की, उनका कहना था कि इसका एनआरआईसी से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन, प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट के प्रति जनता का अविश्वास इतना बढ़ा है कि सरकार की बात मामने को कोई राजी नहीं है. यह सरकार जिस तरह से लोगों के अविश्वास को झेल रही है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ. इसका कारण है कि मौजूदा सरकार ने अर्थव्यवस्था से लेकर रोज़गार, विकास दर और अब नागरिकता को लेकर लगातार झूठ बोले हैं. बिना सार्वजनिक बहस और बिना किसी पारदर्शिता के सरकार एक क़ानून लेकर आ गई, जिसमें राज्य द्वारा संदेह होने पर लोगों को अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी. नागरिकता क़ानून से सरकार स्पष्ट तौर पर यह संदेश देना चाहती है कि वह एक समुदाय विशेष की नागरिकता को ख़त्म करना चाहती है.

सरकार के समर्थकों का कहना है कि प्रधानमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद भी एनपीआर-एनआरसी और नागरिकता क़ानून को एक-दूसरे से जोड़ना फिज़ूल है. उनका मानना है कि भारतीय मुसलमानों को लेकर की जा रही चिंताएं मनगढ़ंत हैं और समाज में डर का माहौल तैयार करने की कोशिश भर है. लेकिन, नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों का स्पष्ट तौर पर मानना है कि सरकार धार्मिक पहचान के आधार पर जनता से भेदभाव कर रही है और ये भारत के संविधान की आत्मा पर हमला है. इन सबके बीच सरकार के रवैये से साफ देखा जा सकता है कि एनपीआर-एनआरआईसी और नागरिकता क़ानून एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. सरकार लोगों को गुमराह करने की करने की कोशिश कर रही है.
……….

इसे समझने के लिए हमें 2003 के नागरिकता संशोधन को जानना होगा. तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने उस समय जो नींव रखी थी, उसी पर चलकर नरेन्द्र मोदी की सरकार नागरिकता संशोधन क़ानून लेकर आई है. अगर 2004 में भाजपा केंद्र में वापसी करती तो हो सकता है कि एनआरसी और एनपीआर की प्रक्रिया उसी वक्त शुरू हो जाती. 2003 का नागरिकता संशोधन कहता है कि भारत में जन्मे उस इंसान को नागरिकता नहीं मिल सकती, जिसके माता-पिता में से कोई एक “अवैध प्रवासी” के तौर पर भारत में रह रहा है. उसके बाद सरकार ने “अवैध प्रवासियों” की पहचान के लिए एनआरसी को अपना हथियार बनाया. एनआरआईसी को किस तरह लागू किया जाएगा, सरकार ने क़ानून के भीतर इसके लिए कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं दिए और सबकुछ रुल्स के ऊपर छोड़ दिया गया. रुल्स संसद में पारित नहीं किए जाते. कार्यपालिका अपनी सुविधा के अनुसार इसे तैयार करती है. नागरिकता नियम 2003 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह रजिस्ट्रार जनरल के जरिए एनपीआर तैयार करे. इस एनपीआर का उपयोग नेशनल रजिस्टर ऑफ इंडियन सिटिजंस तैयार करने में होना है.

इस प्रकार सरकार के तमाम दावों के बावजूद भी यह स्पष्ट है कि एनपीआर एक रास्ता है एनआरआईसी की ओर बढ़ने का. एनपीआर के रुल्स में कहा गया है कि एनआरआईसी की प्रक्रिया शुरू करने में एनपीआर सहायता प्रदान करेगा. जुलाई 2019 में ही रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी एक अधिसूचना से इस दिशा में काम शुरू हो चुका है.

एनपीआर तैयार करने के बाद सरकार के स्थानीय मुलाज़िम “संदिग्ध” लोगों की पहचान करेंगे. लोगों को चिह्नित करने का अधिकार तहसीलदार से ऊपर के सरकारी मुलाज़िमों को होगा. ये सरकारी मुलाज़िम ना सिर्फ अपनी मर्जी के अनुसार लोगों को “संदिग्ध” बताएंगे बल्कि, वे किसी भी व्यक्ति से उसका दस्तावेज़ मांगने के भी अधिकारी हैं.

नागरिकता छीनने का अधिकार

हमें यहां ध्यान देना चाहिए कि सरकार ने अपने मुलाज़िमों को कोई साधारण अधिकार नहीं दिया है. इस अधिकार का इस्तेमाल करके सरकारी अधिकारी किसी भी नागरिक को संदिग्ध बताकर उससे पुराने दस्तावेज़ मांगेंगे. जो लोग दस्तावेज़ों के जरिए अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे, उन्हें “अवैध प्रवासी” घोषित कर दिया जाएगा. ऐसे लोगों को सालों तक डिटेंशन सेंटरों में बंद रखा जाएगा और उनसे नागरिकता का हक, वोट देने का अधिकार और यहां तक कि संपत्ति अर्जित करने का अधिकार भी छीन लिया जाएगा. असल में सरकारी मुलाज़िमों को “जनता की नागरिकता छीन लेने का अधिकार” मिला है.

एक बार जब एनआरआईसी का ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा तो सरकार उसे सार्वजनिक करेगी और इस लिस्ट पर पब्लिक ऑब्जेक्शंस को आमंत्रित करेगी. अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर किसी भी दूसरे इंसान ने आपत्ति दर्ज कराई है, तो उस व्यक्ति की नागरिकता पर ख़तरा पैदा हो सकता है. सरकार ने अपने रुल्स में कहीं भी नहीं बताया है कि सरकारी अधिकारी किन शिकायतों पर विचार करेंगे. इसके लिए कोई दिशा-निर्देश नहीं दिया गया है.

यह प्रक्रिया साफ तौर पर सरकारी अधिकारियों को अपनी शक्ति का ग़लत इस्तेमाल करने की छूट देती है. ऐसा लगता है कि सरकार ने अपने अधिकारियों को छूट दी है कि वह किसी भी व्यक्ति या परिवार की नागरिकता अपनी मर्जी के अनुसार छीन ले. समस्या इतनी सी नहीं है कि सरकार ने रुल्स में नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी है बल्कि सरकारी मुलाज़िमों को छूट है कि वह अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग दस्तावेज़ों को भी मानक बना सकता है.

कार्यपालिका के पास ऐसी बेलगाम ताकत हो जाना संविधान के नियमों का उल्लंघन है. संविधान में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि किसी भी अधिनियम को लागू करने के लिए संसद स्पष्ट दिशानिर्देश बनाएगी. संसद को एक स्पष्ट खांका तैयार करके कार्यपालिका को देना होगा ताकि वह किसी भी नियम को लागू करा सके. सुप्रीम कोर्ट ने हमदर्द दवाखाना मामले (1959) में कहा है कि अगर सरकार को किसी क़ानून में “अबाध और अनियंत्रित” शक्ति मिलती है, तो वह नियम असंवैधानिक है. एनपीआर और एनआरआईसी मामले में सरकारी मुलाज़िमों को अपार शक्ति देना, संविधान की भावना के ख़िलाफ़ है.

सरकारी मुलाज़िम अपनी ताकत का इस्तेमाल लोगों को विक्टिमाइज करने के लिए भी कर सकते हैं. हम जानते हैं कि नागरिकता का अधिकार सभी अधिकारों की जड़ है. इसके बिना हम किसी भी अधिकार को नहीं पा सकते. नागरिकता जैसे इस अति महत्वपूर्ण मामले को सिर्फ सरकारी मुलाज़िमों की मर्जी के आधार पर तय करना भयानक है. अगर असम के एनआरसी का उदाहरण देखें तो दस्तावेज़ों में छोटी-छोटी ग़लतियों के कारण लोगों की नागरिकता निरस्त कर दी गई.

इस प्रक्रिया में पब्लिक ऑब्जेक्शंस लेना भी ख़तरनाक है. एनपीआर के रुल्स में सरकारी अधिकारियों को छूट दी गई है कि वे लोगों की व्यक्तिगत जानकारियों को इकट्ठा करें. यह 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आधार मामले का उल्लंघन है. इसमें कोर्ट ने कहा था कि सरकार निश्चित तौर पर लोगों की गोपनीयता का ध्यान रखे. लेकिन, सरकार एनपीआर-एनआरआईसी के मामले में ठीक इसके उलट काम कर रही है. लोगों से उनकी व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा की जाएगी और सरकार उन जानकारियों को सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित करेगी. इसके बाद सरकार आम लोगों से एनपीआर-एनआरआईसी में प्रकाशित नामों के ऊपर आपत्ति मांगेगी. इसमें भी व्यक्तिगत निशानदेही की संभावना अधिक है.

कल्पना कीजिए कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार के पास ऐसी ताकत हो तो क्या होगा. मुसलमानों के प्रति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घृणा जगजाहिर है. यह अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि योगी आदित्यनाथ के राज्य के अधिकारी किस समुदाय के व्यक्तियों को “संदिग्ध” बताएंगे. आम लोगों के पास अधिकार है कि वो दूसरे किसी व्यक्ति की नागरिकता पर आपत्ति उठाए. ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं है कि आरएसएस की पूरी फौज किसकी नागरिकता को संदिग्ध बताने में जुट जाएगी. असल में ये सभी प्रक्रिया एक हथियार की तरह हैं, जिनका इस्तेमाल सरकार और उसके समर्थक किसी ख़ास धर्म के लोगों और अपने विरोधियों के लिए करेंगे.

इस प्रकार एनपीआर-एनआरआईसी की प्रक्रिया ख़तरनाक है. इसमें किसी भी व्यक्ति को जटिल क़ानूनी खंडहर में धकेला जा सकता है, जहां लाख दस्तावेज़ होने के बावजूद भी आप सरकारी मुलाज़िमों को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे.

…..

नागरिकता संशोधन क़ानून ख़ामियों से भरा पड़ा है. सरकार दावा करती है कि इस क़ानून में भारत के पड़ोसी देशों में प्रताड़ना झेल रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है. लेकिन, यह सुविधा सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक ही सीमित रखी गई है. इसमें चीन, म्यांमार और श्रीलंका के अल्पसंख्यकों को नज़रअंदाज किया गया है. लिंग और भाषा की बजाय धार्मिक भेदभाव को सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून का आधार क्यों बनाया इस पर कोई स्पष्ट तर्क नहीं दिए गए हैं. भारत के पड़ोसी देशों में मुसलमानों पर भी भारी पैमाने पर अत्याचार हो रहे हैं, क़ानून में उन सभी तथ्यों को दरकिनार कर दिया गया है. हिन्दू प्रवासियों के लिए भी यह उचित क़ानून नहीं है. दिसंबर 2014 के बाद अगर कोई हिन्दू प्रताड़ना झेलकर इन पड़ोसी देशों से आता है तो उसे नागरिकता मिलने का प्रावधान नहीं है. ये सभी नियम संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं.

नागरिकता क़ानून के साथ एनआरआईसी लागू होने पर सिर्फ लोगों की नागरिकता को रेगुलेट करना ही बड़ी चुनौती नहीं रहेगी. सरकार ने अभी यह भी नहीं बताया है कि ग़ैर-मुस्लिम लोग किस आधार पर साबित करेंगे कि वे किस देश से और किस तारीख को आए हैं. लोग अपनी धार्मिक प्रताड़ना कैसे साबित करेंगे वह भी स्पष्ट नहीं है. हो सकता है कि सरकार ग़ैर-मुसलमानों के लिए इन प्रक्रियाओं में ढील दे. एनपीआर-एनआरआईसी की प्रक्रिया में दस्तावेज़ ना होने पर ग़ैर-मुस्लिम लोग नागरिकता संशोधन क़ानून के आधार पर नागरिकता पा सकते हैं. मुसलमानों को इस तरह की कोई भी रियायत नहीं मिलेगी.

नागरिकता संशोधन क़ानून से मुसलमानों को बाहर करके उसी धारणा को मजबूत की जा रही है, जिसमें माना जाता है कि मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक हैं और उनकी नागरिकता संदिग्ध है. इस संशोधन को सरकार उन नागरिकों के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेगी, जिन्हें वह अवांछित मानती है.

उत्तर प्रदेश में हमने पाया कि पुलिसकर्मी मुसलमानों के घरों में जाकर तोड़फोड़ कर रहे हैं और महिलाओं, बुजुर्गों और छोटे-छोटे बच्चों तक पर लाठियां बरसा रहे हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस दंगाई बनकर सामने आई है. कई परिवारों ने हमसे बताया कि पुलिस वाले कहते हैं कि नया क़ानून लागू होने से मुसलमानों को अपना घर छोड़कर पाकिस्तान जाना होगा.

अस्पताल में इलाजरत छात्र के साथ हर्ष मंदर. (चित्र साभार: नताशा बधवार)

अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने नागरिकता क़ानून-एनआरआईसी-एनपीआर को लेकर अपने समर्थकों और सरकारी अधिकारियों तक में इस तरह की समझ पैदा की है, तो यह समझना कठिन नहीं है कि इन सभी नियमों का इस्तेमाल किस समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ किया जाना है.

कुल मिलाकर देखें तो सरकार जो एनपीआर लाई है, वह असम के एनआरसी से ज्यादा ख़तरनाक है. असम में एनआरसी की प्रक्रिया एक भयानक मानवीय त्रासदी साबित हुई है. इन सबके बावजूद असम में एनआरसी एक मुस्लिम विरोधी प्रोजेक्ट के तौर पर नहीं लाई गई थी. इसमें सभी मज़हब के लोगो से दस्तावेज़ मांगे गए थे. लेकिन, एनपीआर के बाद जो एनआरआईसी लागू होगी, उसमें सरकार उन्हीं लोगों से दस्तावेज़ मांगेगी, जिनके ऊपर सरकारी मुलाज़िमों को संदेह हुआ हो. इसमें भारत के मुसलमानों के साथ-साथ वंचित तबके से आने वाले लोगों को भारी पैमाने पर इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा. बेघर लोगों, विकलांगों, ट्रांसपर्सन्स, अनाथ बच्चे और लाखों लोगों को इस भय में गुजारना पड़ेगा कि कब सरकार उनकी नागरिकता छीन कर उन्हें डिटेंशन सेंटरों में भेज देगी. ( यहां भी प्रधानमंत्री मोदी ने साफ तौर पर झूठ बोलते हुए कह दिया था कि भारत में कोई डिटेंशन सेंटर है ही नहीं.)

1 जनवरी 2020 से कर्नाटक में एनपीआर की प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है. 1 अप्रैल से इसे देशभर में लागू किया जाना है. जब तक सभी ग़ैर-भाजपा सरकारें अपने प्रदेश में एनपीआर की प्रक्रिया का बहिष्कार नहीं करते हैं तब तक यह समझा जाएगा कि उन्होंने भारत में जर्मनी के नाज़ीवाद का समर्थन किया. इतिहास इन सरकारों को कभी माफ़ नहीं करेगा.

(यह लेख स्क्रॉल डॉट इन में अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+