कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बेपरवाह तरीके से देशभर में NRC लागू करने को बेचैन अमित शाह, पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के विचार भी भयावह

इस फ़ैसले से देश की आत्मा को चोट पहुंचेगी और भारत के धर्म-निरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान की भी धज्जियां उड़ेंगी.

आज देश भीषण मानवीय पीड़ा और अन्याय को झेलने के कगार पर खड़ा है. जैसा कि गृहमंत्री अमित शाह ने घोषणा की है, अगर पूरे देश में एनआरसी की प्रक्रिया लागू की जाती है तो इसके परिणाम बहुत दुखद होंगे. नागरिकता संशोधन विधेयक, जो ग़ैर-मुस्लिम सभी धर्म के लोगों को बिना किसी दस्तावेज के ही भारत की नागरिकता देने का वादा करता है, के साथ एनआरसी लागू होने पर देश एक बार फिर से विभाजन के घाव को झेलेगा. इस फ़ैसले से देश की आत्मा को चोट पहुंचेगी और भारत के धर्म-निरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान की भी धज्जियां उड़ेंगी.

पिछले छ: सालों से असम के लोग अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र, भूमि स्वामित्व का प्रमाण पत्र, स्कूल और मतदाता पहचान पत्र जुटाने में लगे थे. उनका बहुत कुछ दांव पर लगा था. अगर वे लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाते तो उन्हें अपने परिवारों से दूर होकर डिटेंशन सेंटरों में रहना पड़ता. वे लोग भारत से बाहर किए जाने की आशंका से भी डरे हुए थे. असम के ग़रीब, निरीह लोगों ने महंगे वकील रखने, सरकारी अफसरों को खिलाने-पिलाने में अपने सारी संपत्तियां बेच दीं. कुछ हताश लोगों ने तो अपनी जान भी दे दी.

जब एनआरसी की फाइनल लिस्ट जारी हुई, तो इसमें 20 लाख लोगों को अवैध माना गया था. तब बाकी लोगों को उम्मीद बंधी की वो अब चैन से रह पाएंगे. लेकिन, अमित शाह ने अब कहा है कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया फिर से शुरू की जाएगी. इस घोषणा के बाद वैसे लोग भी परेशान हो गए हैं, जिनके नाम एनआरसी की पहली वाली लिस्टों में आ चुके हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक पास होने के बाद एनआरसी का मतलब है असम के मुसलमानों को फिर से सवालों और जटिल प्रक्रिया से गुजारने के लिए मजबूर करना. उनके दुख का अंत निकट भविष्य में नहीं दिखता. मौजूदा सरकार की दलील है कि एनआरसी की प्रक्रिया का नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट कर रहा था. यह सच है. सुप्रीम कोर्ट ने ना सिर्फ एनआरसी की प्रक्रिया को मॉनिटर किया बल्कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई इसे लागू कराने को लेकर काफी उत्साहित भी रहे.

अपने रिटायरमेंट के कुछ दिन पहले ही जस्टिस गोगोई ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में असम में एनआरसी की प्रक्रिया का जोरशोर से बचाव भी किया. यह अप्रत्याशित है कि एक मौजूदा चीफ जस्टिस एक बड़े राजनीतिक मुद्दे पर अपने विचार इस तरह से खुल कर रख रहे हों. जस्टिस गोगोई ने एनआरसी को “भविष्य के लिए एक जरूरी दस्तावेज” करार दिया. उनके मुताबिक इससे “अवैध प्रवासियों” से जुड़े तथ्य सामने आएंगे और एनआरसी उन बाधाओं को भी ख़त्म करेगा जिनकी वजह से समाज और संस्कृति के बीच असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई है. जस्टिस गोगोई ने एनआरसी के आलोचकों को “अल्पज्ञानी”, “लापरवाह”, “ग़ैर जिम्मेदार”, “स्थिति को बिगाड़ने वाला”, “आग से खेलने वाले लोग” और “बुरे इरादे वाला” करार दिया. एनआरसी के बहुत सारे आलोचक जस्टिस गोगोई के कोर्ट में प्रतिवादी थे. मैं भी उनमें से एक था.

असम में एनआरसी को एक उपाय के तौर पर पेश किया गया, जो वर्षों से चली आ रही हिंसा की घटनाओं पर रोक लगा सकता था. ऐसा दर्शाया गया कि इससे वहां के वंचित समुदाय के लोगों के संस्कृति और जमीन की रक्षा की जा सकेगी और घुसपैठ पर रोक लगेगा. लेकिन, हम सब जानते हैं कि एनआरसी को किस तरह लागू किया गया. इसमें संविधान और संवैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई जिसके परिणामस्वरूप एक मानवीय त्रासदी की स्थिति उत्पन्न हो गई. एक दशक पहले सुप्रीम कोर्ट ने अवैध प्रवासियों को “बाहरी आक्रांता” और एक आक्रमण बताया था. इसके बाद से नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी उस शख़्स की हो गई, जिसकी नागरिकता पर सवाल उठे हों. सरकार को अपने दावे से जुड़े तथ्य रखने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया.

समय के साथ-साथ इस प्रक्रिया में होने वाला अन्याय भी बढ़ता गया. एनआरसी की मॉनिटरिंग का काम न्यायपालिका ही करती रही. 2014 से 2019 के बीच सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका से ज्यादा विधायिका का काम करते हुए दिखता है. यह उस दौर की बात है जिसमें जस्टिस गोगोई मुख्य न्यायाधीश थे. पिछले 7 और 8 सितंबर को कई रिटायर्ड जज और विचारक एक पीपुल्स ट्राइब्यूनल में शामिल हुए. उनका कहना था, “सामान्य तौर पर प्रशासनिक कामों को देखने का काम विधायिका करती है और इसमें कहीं किसी के अधिकार का उल्लंघन होता है तो उपचार के लिए लोग न्यायपालिका के पास जाते हैं. लेकिन, जब सुप्रीम कोर्ट ही किसी काम को लागू कराने लगता है तो उसमें हुई त्रुटियों की शिकायत किससे की जाए? ऐसा बमुश्किल ही हो पाता है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की जाए.”

इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों कमजोर लोगों के ऊपर अपनी नागरिकता साबित करने का दबाव आ गया. उनके ऊपर जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल के दस्तावेज़, भूमि प्रमाण पत्र इकट्ठा करने का भार पड़ गया. गांवों में रहने वाले कमजोर और निरीह लोगों के लिए यह काम बहुत मुश्किल था. फिर भी जब उन्होंने दस्तावेज़ इकट्ठा कर लिए तो उनमें कई सामान्य सी ग़लतियां सामने आने लगी. ये ग़लतियां होती थी बांग्ला नामों की अंग्रेजी स्पैलिंग में या उम्र में. हम सब जानते हैं कि गांवों में रहने वाले अधिकतर लोगों को आज भी अपने जन्म की तारीख मालूम नहीं होती. असम के कई लोगों के पास उनके ज़मीन का कानूनी दस्तावेज़ नहीं है. इन सामान्य कारणों की वजह से असम के लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. एनआरसी प्रक्रिया के बीच में ही “मूल असमिया” श्रेणी जोड़ दी गई. इस कैटेगरी में आने वाले लोगों के पास दस्तावेज़ ना होने की स्थिति में भी उनके लिए कड़ा रूख अख़्तियार नहीं किया जाएगा.

डिटेंशन सेंटर में बंदी बनाए गए लोगों के मुद्दे और डिटेंशन की प्रक्रिया के संवैधानिक वैधता पर सवाल करने के लिए मैं सुप्रीम कोर्ट गया था. इन डिटेंशन सेंटरों में अमानवीय तरीके से लोगों को बंदी बनाकर रखा गया है. जेल के भीतर भी जेल बनाकर बंदियों को रखा गया है. परिवार के लोगों को एक दूसरे से काफी अलग-अलग रखा गया है. पति को किसी दूसरे डिटेंशन सेंटर में तो पत्नी को कहीं और बंदी बनाया गया है. उनके बीच संपर्क का कोई साधन नहीं है. बच्चे तो अक्सर बाहर अकेले ही रहा करते हैं. बंदियों के पास कोई काम नहीं होता ना ही उन्हें पैरोल की सुविधा मिलती है. उनके रिहा होने की कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि बांग्लादेश कभी भी उन्हें स्वीकार नहीं करेगा.

एनआरसी मुद्दे की सुनवाई करते समय जस्टिस गोगोई की जो बातें मीडिया के जरिए सामने आई उससे मैं बहुत आहत हुआ. एक बार उन्होंने असम के मुख्य सचिव को कहा था, “मौजूदा डिटेंशन सेंटरों की क्षमता 900 बंदियों की ही है, जबकि इससे कहीं अधिक लोग विदेशी घोषित साबित हुए हैं. इन सेंटरों की क्षमता हजारों कैदियों की क्यों नहीं है?” जस्टिस गोगोई की इन बातों से बांग्ला मूल के असमिया लोगों के बीच आशंका और भी बढ़ गई.  इसके बाद से डिटेंशन सेंटरों में लोगों को बंदी बनाने की प्रक्रिया में और अधिक तेजी हो गई.

इसलिए मैं चाहता था कि जस्टिस गोगोई को एनआरसी मुद्दे पर सुनवाई से अलग रखा जाए. पर गोगोई ने कहा कि वे इस मामले से खुद को अलग नहीं करेंगे. इसके बजाय उन्होंने मेरी ही याचिका से मेरा नाम हटा दिया. जैसा कि मैंने उनसे कोर्ट में कहा था कि असली न्याय के भीतर सहानूभुति का भाव होता है और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की बातों में इन्ही भावों की कमी महसूस हुई.

एनआरसी के मुद्दे पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और गृहमंत्री अमित शाह के बयानों में भी सहानुभूति या दया भाव की कमी है. ये दोनों लोग एनआरसी का दंश झेल रहे लाखों वंचितों के लिए एक ही समान सोच ही रखते हैं.

यह लेख 25 नवंबर को द इंडियन एक्सप्रेस के प्रिंट संस्करण में “द अबसेंस ऑफ कम्पैशन” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है. लेखक जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. इस लेख का हिन्दी अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.

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