कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

फोनी चक्रवातः पीड़ितों की मदद के लिए एकजुट हुए आईटीआई छात्र और सिख संगठन

‘‘लोग मुसीबत में है और हम उनके काम आ रहे हैं तो इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है? किताबों से ज्यादा अनुभव इस काम से मिलेगा.’’

चक्रवाती तूफान फोनी के तबाही मचाने के बाद से अंधेरे में जी रहे लोगों के लिये ओडिशा के आईटीआई छात्र मसीहा बनकर उभरे हैं जो घर घर जाकर पंखे, ट्यूबलाइट, फ्रिज, टीवी जैसा बिजली का सामान मुफ्त में ठीक कर रहे हैं जबकि कई सिख गैर सरकारी संगठन लगातार लंगर चलाकर भूखों का पेट भर रहे हैं.

तीन मई को आये विनाशकारी चक्रवाती तूफान के बाद से पुरी अंधेरे में है जबकि भुवनेश्वर में भी बिजली पूरी तरह नहीं आई है. प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों की जिंदगी में रोशनी लाने की है क्योंकि 250 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चले तूफान में बिजली का पूरा बुनियादी ढांचा ही ठप्प हो गया.

ऐसे में आईटीआई के 500 छात्र रोशनी की किरण बनकर उभरे हैं. ओडिशा के सूचना और जनसंपर्क सचिव संजय सिंह ने भाषा को बताया, ‘‘आईटीआई में इलेक्ट्रीशियन ट्रेड पढ़ रहे छात्र घर घर जाकर लोगों के बिजली के उपकरण और क्षतिग्रस्त तार ठीक कर रहे हैं तथा बिजली की बहाली में मदद भी कर रहे हैं. इससे उन्हें भी अनुभव मिलेगा और काम भी तेजी से पूरा होगा.’’

इससे पहले भी ओडिशा आईटीआई के छात्र केरल में आई बाढ़ और तितली तूफान के दौरान लोगों की मदद कर चुके हैं. पंद्रह से 19 बरस की उम्र के छात्रों की टीम बनाई गई है जिनके साथ एक शिक्षक भी रहता है.

एक छात्र मृत्युंजय साहू ने कहा, ‘‘लोग मुसीबत में है और हम उनके काम आ रहे हैं तो इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है? किताबों से ज्यादा अनुभव इस काम से मिलेगा.’’

ओडिशा, खासकर पुरी में बिजली की बहाली के लिये आंध्रप्रदेश और तेलंगाना से बड़ी संख्या में कुशल कामगार बुलाये गए हैं जिनके लिये एक वक्त के खाने का जुगाड़ यूनाइटेड सिख संगठन कर रहा है.

पिछले 20 साल से भारत, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा समेत 13 देशों में सक्रिय इस संगठन के 25 स्वयंसेवी पुरी में सक्रिय हैं जो अपना काम धंधा सब छोड़कर चार मई को ओडिशा पहुंचे. हरजीवन सिंह की 15 दिन की बच्ची है जबकि गुरपिंदर सिंह की अभी नयी शादी हुई है और बेंगलुरू से इंजीनियर मनजीत सिंह तो नौकरी से छुट्टी लेकर आये हैं.

मनजीत ने भाषा से कहा, ‘‘हम रोटेशन पर सेवा दे रहे हैं. गुरूद्वा

रे में खाना खुद पकाते हैं और पुरी में अंदरूनी इलाकों में बांटते हैं. इसके अलावा, दूसरे राज्यों से आये बिजली मजदूरों के लंच का भी हम इंतजाम कर रहे हैं जिन्हें चावल और दालमा दिया जा रहा है.’’

बरनाला से आये परमिंदर ने कहा, ‘‘हम सबसे पहले तारिणी देवी बस्ती गए जहां लोग तीन दिन से भूखे थे. हम सोलर लैंप जुटाने की भी कोशिश कर रहे हैं.’’

इंग्लैंड के गैर सरकारी संगठन खालसा एड के 12 स्वयंसेवी 25 स्थानीय लोगों को लेकर लगातार काम में जुटे हैं. इनमें कोलकाता, पंजाब, जम्मू कश्मीर, दिल्ली और देहरादून से आये स्वयंसेवी शामिल हैं.

जम्मू से आये इंजीनियर गगनदीप सिंह ने कहा, ‘‘हम अभी तक 5000 लोगों को लंगर बांट चुके हैं. कोलकाता से पीने का पानी भी ट्रकों में मंगवाया है जबकि पंजाब से एक हजार मेडिकल किट आ रही है जिसमें दवाइयां, पानी साफ करने की टैबलेट और सैनिटरी नैपकिन शामिल हैं.’’

इन संगठनों को रोज सुबह कलेक्टर के कार्यालय से सूची मिलती है कि उन्हें किस इलाके में खाने का बंदोबस्त करना है. उसके बाद ये गुरूद्वारे में लंगर तैयार करने में जुट जाते हैं. ऑनलाइन और चंदे से आर्थिक मदद जुटा रहे ये संगठन केरल, बांग्लादेश, म्यामां और इंडोनेशिया में भी काम कर चुके हैं.

इनके अलावा भुवनेश्वर में गुरूद्वारा सिंह सभा का चार मई से दोपहर और रात के वक्त लंगर चल रहा है और रोजाना दो हजार लोग दोपहर को तथा करीब 2500 लोग रात के समय गुरूद्वारे में बनी खिचड़ी और आम की चटनी खा रहे हैं. गुरूद्वारे में 15 से 20 महिला और पुरूष स्वयंसेवी लगातार सेवा में जुटे हुए हैं और बिजली, पानी बहाल होने तक लंगर चलता रहेगा.

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