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पाकिस्तान के PM इमरान खान ने काहलिल जिब्रान को गलत उद्धृत किया, मीडिया ने भी किया गलत रिपोर्ट

ऑल्ट न्यूज़ की पड़ताल

19 जून को, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने लेबनीज़-अमेरिकी लेखक और कवि, काहलिल जिब्रान के एक उद्धरण को साझा किया, जिसमें लिखा गया था कि,”I slept and dreamed that life was joy. I woke and I saw that life is all service. I served and I saw that service was joy. (मैं सो गया और सपना देखा कि जीवन आनंदमय था। मैं जागा और मैंने देखा कि जीवन सिर्फ सेवा है। मैंने सेवा की, और देखा कि सेवा ही आनंदपूर्ण थी।-अनुवाद)”।

इस लेख को लिखते समय तक खान के ट्वीट को 38 ,000 से ज्यादा लाइक और 7,700 से ज़्यादा बार रीट्वीट किया गया है।

इसके बाद, मुख्यधारा के मीडिया संगठनो ने यह दावा करते हुए रिपोर्ट लिखा कि खान ने एक झूठा उद्वरण साझा किया है क्योंकि यह उद्धरण जिब्रान का नहीं बल्कि भारतीय कवि रवींद्रनाथ टैगोर का था। इंडिया टुडेDNAएबीपी न्यूज़मिड डे, इकोनॉमिक्स टाइम्सन्यूज़ 18NDTVANIज़ी न्यूज़टाइम्स नाउ, हिंदुस्तान टाइम्स और रिपब्लिक टीवी  द्वारा रिपोर्ट की गई।

कुछ पाकिस्तानी मीडिया संगठन- पाकिस्तान टुडेएक्सप्रेस ट्रिब्यूनद न्यूज़ ने ऐसी ही रिपोर्ट प्रकाशित की।

टैगोर, जिब्रान या दोनों ही नहीं?

ऑल्ट न्यूज़ ने पाया कि कई वेबसाइटों ने इसे जिब्रान (1883 – 1931) और टैगोर (1861 – 1941) दोनों का उद्धरण बताया था। हालांकि, इनमें से कोई भी या तो विश्वसनीय साहित्यिक स्रोत नहीं थे और न ही उन्होंने प्रकाशन की तारीख या जहां पर पहली बार यह पंक्ति प्रकाशित की गई थी, उसका विवरण दिया हो।

एलेन स्टर्गिस हूपर (1812 – 1848)

गूगल पर इन पंक्तिओ को सर्च करने से एक अन्य नाम एलेन स्टर्गिस हूपर सामने आया, ये 19वीं सदी के अमेरिकी कवि है, जो इन पंक्तियों पर विश्वास रखते हो। मगर इस उद्वरण का संबध उनसे या टैगोर या ज़िब्रान से होने के बारे में दो तथ्यों पर आधार रखा जा सकता है, एक तो इसके प्रकाशन का वर्ष और दूसरा इन पंक्तिओं का स्त्रोत।

कई साहित्यिक स्रोतों के अनुसार, यह पंक्तियां हूपर की एक कविता का हिस्सा थीं, जो 19वीं 20वीं सदी के अमेरिकी ट्रान्सेंडैंटलिस्ट पत्रिका द डायल में प्रकाशित हुई थी।

हूपर का जन्म 1812 में और मृत्य 1848 में हुई थी, जहां पर उनका जन्म टैगोर (1861) और जिब्रान (1883) दोनों के जन्म से पहले हुआ था।

यहां उनकी कविता को देखा जा सकता है:

“I slept, and dreamed that life was Beauty;
I woke, and found that life was Duty.
Was thy dream then a shadowy lie?
Toil on, sad heart, courageously,
And thou shalt find thy dream to be
A noonday light and truth to thee.” 

1885 के पत्रिका लेख में, द डायल का एक ऐतिहासिक और जीवनीपूर्ण परिचय दिया गया है जि समें, लेखक जॉर्ज विलिस कुक ने लिखा है कि हूपर की कविता द डायल के पहले खंड (1840) में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसे इटली की भाषा में अनुवादित करके जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कान्त का बताया गया था।

यह कविता द डायल  में हूपर के नाम के बिना प्रकाशित हुई थी। इसकी वजह से इन पंक्तियों को कांत का समझा गया था।

कई अन्य स्रोतों के अनुसार, हूपर की कविताओं को द डायल में 11 बार बेनाम कविताओं के तौर पर प्रकाशित किया गया था।

यात्रा गुमनाम कविताओं की

अमेरिकी कवि स्टर्गिस हूपर द्वारा लिखी गई कवीता को, 1840 में बिना नाम के पत्रिका में प्रकाशित किया गया था, जिसे गलत तरीके से जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांत का बताया गया था। पिछले सालों में, एक ही कविता के विभिन्न अनुवादों को लेबनीज़-अमेरिकी लेखक काहलिल जिब्रान और भारतीय कवि रवींद्रनाथ टैगोर को बताकर साझा किया जा रहा है। आकस्मित रूप से, इन्हीं पंक्तिओं को मदर टेरेसा का भी बताया गया था।

एक ही पंक्तियों के कई अनुवादों को टैगोर का बताया गया

इमरान खान द्वारा ट्वीट किए गए इन उद्धरण के कई संस्करणों को टैगोर का बताया गया है। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, इन पंक्तियों का लेखन भी बदलता रहा जबकि इसका मूल सार आज भी बरकरार है।

एक दार्शनिक किताब ‘Being Alive: Human Structure and Functions‘, 1942 में प्रकाशित हुई थी, जो इस उद्वरण की पहली दो पंक्तियों का समावेश करती है। इसे पहले भी टैगोर के नाम से प्रकाशित किया गया था, जिसे हम गूगल बुक्स पर ढूंढने में असमर्थ रहे है।

1986 के UCSF स्वयंसेवकों के लिए किये गए एक प्रकाशन में, हमने पाया कि पंक्तियों के शब्दों को और भी बदल दिया गया था। इन पंक्तियों को बंगाली कवि का बताया गया था, लेकिन इसमें “जीवन आनंद है” की बजाय “जीवन ख़ुशी है“, बताया गया था। इनमें “मैंने सेवा की और देखा कि सेवा ही आनंद है” की बजाय “मैंने सेवा की और पाया कि सेवा में ही ख़ुशी है”-लिखा गया था।

ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां कविता के मूल रूप को बदल दिया गया है। यह उद्धरण मूल रूप से टैगोर का नहीं हैं, और विकिपीडिया में भी इसे ‘विवादित’ बताया है। इमरान खान ने गलत उद्धृत किया था, लेकिन भारतीय और पाकिस्तानी दोनों मीडिया ने उन्हें बिना किसी साहित्यिक सबूत के ज़िम्मेदार मान लिया।

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