कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

लखनऊ में सांप्रदायिकता और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहीं प्रो. रूप रेखा वर्मा और उनके संगठन “साझी दुनिया” को जानिए

करीब 20 साल की उम्र में समाज सेवा के क्षेत्र में कदम रखने वाली प्रोफेसर वर्मा 76 साल की उम्र में भी उसी जज़्बे के साथ लगी हुई हैं.

2 मई 2005 को गैंगरेप की एक भयावह घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर दिया था. कबाड़ी का व्यापार करने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति की 13 वर्षीय बेटी को लखनऊ के आशियाना से कुछ लोग एक कार में उठाकर ले गए. इसके बाद छ: लोगों ने उस लड़की के साथ बलात्कार किया और उसके शरीर पर सिगरेट से दागे गए. कुछ घंटे बाद इन लोगों ने उस लड़की को डालीगंज के पास सड़क के किनारे फेंक दिया. लड़की गंभीर रूप से बीमार थी. इस गैंग में अमन बख्शी, भारतेंदु मिश्रा, फ़ैजान, सौरभ जैन और आशिफ़ सिद्दीकी थे तथा इनका नेतृत्व कर रहा था समाजवादी पार्टी के एक नेता अरुण शंकर “अन्ना” शुक्ला का भतीजा गौरव शुक्ला.

11 साल की लंबी लड़ाई के बाद, जिसमें गवाहों को डराने और धमकाने की भरपूर कोशिश हुई, 2016 में गौरव शुक्ला को दोषी साबित किया गया. प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा और उनके अधिकार संगठन साझी दुनिया ने रेप पीड़िता को न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.

रूप रेखा वर्मा कौन हैं?

साझी दुनिया संगठन की सचिव प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर मैनपुरी में हुआ था. 39 सालों तक उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का अध्यापन किया और 1998 में एक साल के लिए उन्हें इस विश्वविद्यालय का कुलपति भी बनाया गया था. प्रोफेसर वर्मा सालों से नवाबों के शहर लखनऊ में मानवाधिकार और धर्म निरपेक्षता की लड़ाई लड़ रही हैं.

प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा की विरोधी रही हैं. लगभग 20 साल की उम्र से ही वे सामाजिक कार्यों में जुटी हैं और आज 76 साल की आयु होने के बावजूद भी वे मजबूती से अपने कार्यों में लगी हैं.

न्यूज़सेंट्रल24×7 से बात करते हुए प्रोफेसर वर्मा ने बताया कि 2005 के गैंगरेप मामले में दोषियों ने इसे भटकाने की पूरी कोशिश की. उन्होंने आगे कहा, “यहां तक कि महिला अधिकार संगठन भी दोषियों की ही मदद कर रहे थे.” यहां तक कि जब वे रेप पीड़िता को कोर्ट लेकर जा रही थीं, तो कोर्ट परिसर में ही रूप रेखा वर्मा के ऊपर हमले किए गए. उन्होंने आगे कहा, “मुझे डर था कि चार्जशीट दायर होने के बाद गौरव शुक्ला रेप पीड़ित लड़की को नुक़सान पहुंचा सकता है. एक दिन जब मैं अदालती सुनवाई के लिए पीड़िता के साथ जा रही थी, तो 20-25 वकीलों ने मेरे ऊपर हमला कर दिया. उन्होंने मुझे कोर्ट के छठी मंजिल पर से फेंक देने की धमकी भी दी.”

बीती बातों को याद करते हुए आगे उन्होंने कहा, “प्रशासन और सरकार पर दबाव बनाने के लिए हमने मई और जून की तपती गर्मी में भी धरना-प्रदर्शन किया है. आरोपी हमेशा यह दावा करते थे कि बलात्कार की इस घटना के समय वे नाबालिग थे, लेकिन हमने जुविनाइल बोर्ड के सामने उन्हें चुनौती दी. 11 साल बाद, 13 अप्रैल 2016 को गौरव शुक्ला को 10 साल के लिए जेल की सज़ा सुनाई गई. यह एक लंबी लड़ाई थी.”.

प्रोफेसर वर्मा के मुताबिक अपराधियों ने पीड़िता को डराने-धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. “उन्होंने केस वापस लेने के लिए मेरे घर पर धमकी देने वाली दो चिट्ठी भी भेजी थी. ये चिट्ठियां कई अख़बारों में प्रकाशित भी हुई थीं.”

प्रोफेसर वर्मा के मुताबिक मीडिया ने इस मामले में एक अहम भूमिका निभाई थी. मीडिया ने अहम सवाल उठाए और इस घटना को लेकर जनता के बीच अच्छी राय बनी. मीडिया ने प्रशासन और सत्ताधारी पार्टी पर भी दबाव बनाया था. हालांकि, अब प्रोफेसर वर्मा मानती हैं कि आज की मीडिया के पास ऐसी रिपोर्ट दिखाने के लिए हिम्मत नहीं है. अब उनका मानना है कि राज्य मीडिया को नियंत्रित करता है.

“किसी समाज सुधारक ने अपने जीवन में बड़े बदलाव नहीं देखे”

90 के दशक में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देश में नफ़रत और घृणा का माहौल था. इसमें हजारों लोगों की जानें गईं. तब प्रोफेसर वर्मा ने कुछ समान विचार वाले लोगों के साथ मिलकर “नागरिक धर्म समाज” नाम की संस्था की शुरुआत की. इसे सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए बनाया गया था.

साझी दुनिया का कार्यालय

2004 में नागरिक धर्म समाज का नाम बदलकर साझी दुनिया कर दिया गया. इस संस्था की शुरुआत सहिष्णुता और विभिन्नता को बढ़ावा देने के लिए हुई थी, लेकिन अब ये लैंगिक समानता, प्राथमिक शिक्षा और अन्य मानवाधिकारों को लेकर भी काम कर रही है. साझी दुनिया ने महिलाओं के ख़िलाफ़ लैंगिक हिंसा और अब्यूज़िंग को लेकर 200 से अधिक मामलों की लड़ाई लड़ी है.

यह संस्था मुख्य रूप से प्रोफेसर वर्मा के पेंशन और कुछ दानकर्ताओं के दिए पैसे से चलती है.

साझी दुनिया के कार्यकारी सदस्य तजीन ख़ान घरेलू हिंसा के शिकार औरतों की काउंसलिंग करने का काम करते हैं. न्यूज़सेंट्रल24×7 से बातचीत में उन्होंने बताया कि महिलाएं सांप्रदायिक दंगों में ना के बराबर ही हिस्सा लेती हैं पर उन्हें सेक्सुअल अब्यूज़ का शिकार बनाया जाता है.

न्यूज़सेंट्रल24×7 से बात करते हुए प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा ने कहा, “हमें पता है कि किसी एक व्यक्ति को सुधार कर पूरे समाज की धारणा को नहीं बदला जा सकता, लेकिन हमें अपने समाज में ऐसे मददगार लोगों की जरूरत है. देश में हिंसा और यौन हिंसा की शिकार लाखों महिलाएं हैं, इन सबकी सहायता करना असंभव है. हमारी कोशिश है कि उनमें से कुछ लोगों के साथ हम खड़े हों. हम समाज में एक क्रमिक बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं. कभी-कभी महिलाओं को न्याय मिल पाता है और कभी नहीं भी मिलता है. समाज में बदलाव के लिए हम स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता फैलाने वाले सेमिनार आयोजित करते हैं. हमें अपने समाज में यह संदेश देने की जरूरत है कि कैसे महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध को रोका जा सकता है.” आगे उन्होंने कहा, “निश्चित तौर पर हमारे प्रयासों का समाज पर सकारात्मक असर पड़ेगा, लेकिन इसमें समय लगेगा. किसी भी समाज सुधारक जैसे कि राजा राम मोहन राय, सावित्री फुले, ईश्वर चंद विद्यासागर और रूकैया शेखावत ने अपने जीवन काल में बड़े बदलाव नहीं देखे.”

26 वर्षीय संगीता कुमारी* पेशे से एक सरकारी शिक्षक हैं. न्यूज़सेंट्रल24×7 से बातचीत में उन्होंने बताया कि लखनऊ में अग्नि विभाग में काम करने वाले संतोष सिंह ने एक साल तक उन्हें शारीरिक रूप से परेशान किया था. मैं इसके ख़िलाफ़ लड़ना चाहती थी, लेकिन परिवार वालों ने मेरा साथ नहीं दिया. मैं पूरी तरह से सदमे में थी और आत्महत्या का भी मन बना लिया था. इसके बाद मैंने अपनी परेशानी अपने एक दोस्त से बताई. फिर मेरे दोस्त ने साझी दुनिया से मेरा संपर्क करवाया. रूप रेखा वर्मा और तजीन ख़ान ने मुझे हिम्मत दी. उन्होंने एफ़आईआर दर्ज कराने में मेरी मदद की और पूरे मुक़दमे के दौरान इन लोगों ने मुझे सहयोग दिया. हमें धमकियां भी मिलीं पर प्रोफेसर वर्मा ने कभी पीछे नहीं हटने दिया.”

कोर्ट ने 6 अप्रैल 2019 को संतोष सिंह को दोषी पाया.

“देश में नहीं बचा है लोकतंत्र”

लखनऊ में साझी दुनिया की दो मंजिली इमारत हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और सामाजिक कार्यकर्ता यशपाल से जुड़ा हुआ है. यशपाल हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशियसन से जुड़े हुए थे. वे भारत को “हिन्दू राष्ट्र” घोषित करने के हिन्दू महासभा के विचार के पूरे ख़िलाफ़ थे. इस बिल्डिंग के प्रवेश द्वार पर लिखा है:

“हाकिम-ए-वक्त का फ़रमान-ए-जुनून
फिर से सुनो ना तो ये बात नई है, ना पुरानी होगी
फिर वही बिकने बिकाने की कहानी होगी
जो भी कुछ पास है सब बेच दो सब निलाम करो
जिस्म वो जान इज्ज़त-ओ-ग़ैरत सब कुछ
हंसते हुए क़ातिल के हाथ धरो
आओ कह दें के ये सौदा
हमें मंज़ूर नहीं, सौ बार नहीं.”

72 वर्षीय रमेश दीक्षित 1982 से 2011 तक लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीतिविज्ञान के प्रोफेसर रह चुके हैं. उनका कहना है कि प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा आजीवन भगवाधारियों की विरोधी रही हैं. इनके मुताबिक, इसी वजह से लखनऊ में सालों से साझी दुनिया सांप्रदायिकता और लैंगिक हिंसा को रोकने में लड़ती रही है.

प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा नरेन्द्र मोदी की सरकार को हिटलर का तीसरा रूप बताती हैं. उनका कहना है कि मुसलमानों को देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है. पिछले कुछ सालों में, खासकर मोदी सरकार में दलितों-आदिवासियों और मुसलमानों के अधिकारों की बात करने वाले कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ लगातार कार्रवाई की जा रही है. इनके ऊपर राजद्रोह और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुक़दमा दर्ज किया जा रहा है.

पिछले साल जुलाई के महीने में, लखनऊ विश्वविद्यालय के करीब 20 विद्यार्थी विभिन्न कोर्सो में एडमिशन ना मिलने के कारण प्रदर्शन कर रहे थे. छात्रों ने विश्वविद्यालय के फ़ैसले को ग़लत बताया था. 4 जुलाई को जब विश्वविद्यालय के कुलपति धरने वाली जगह के पास से गुजर रहे थे, तभी कुछ छात्रों ने उनका रास्ता रोक दिया. इसके बाद झड़प हो गई. प्रोफेसर वर्मा ने छात्रों के प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया था, इस कारण इस हिंसा के लिए विश्वविद्यालय और पुलिस ने उनके ऊपर ही दोष मढ़ दिए.

न्यूज़सेंट्रल24×7 से बात करते हुए रूप रेखा वर्मा ने कहा, “उन्होंने कोशिश की की 2018 में कुलपति के ख़िलाफ़ हुए हिंसा का दोष मेरे ऊपर मढ़ा जाए. जबकि मैं उस दिन धरनास्थल पर मौजूद भी नहीं थी.” आगे उन्होंने कहा, “इसके बाद से मैंने प्रत्यक्ष तौर पर कोई काम नहीं किया, अगर मैं तब से प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय रहती तो आज आपके सामने नहीं बैठी होती.”

भारतीय जनता पार्टी भले ही पहले से ज्यादा बहुमत लेकर सत्ता में आ गई हो, लेकिन प्रोफेसर वर्मा भी झुकने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है, “देश में लोकतंत्र अब नहीं बचा है.” आगे उन्होंने कहा, “चाहे समय जितना भी मुश्किल क्यों ना हो, हम एक बेहतर समाज के लिए अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे. ऐसा समाज जहां धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव ना किया जाए.”

*पहचान गुप्त रखने के उद्देश्य से नाम बदल दिए गए हैं.

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