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सुप्रीम कोर्ट में 10 % आरक्षण बिल को चुनौती, याचिकाकर्ता ने कहा- आर्थिक तौर पर आरक्षण का एकमात्र आधार नहीं

10 घंटे से ज़्यादा लंबी बहस के बाद बुधवार को इस विधेयक को राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया.

सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने वाले संविधान संशोधन विधेयक को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन और कौशल कांत मिश्रा ने दायर याचिका में इस विधेयक को रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि आर्थिक मानदंड आरक्षण का  एकमात्र आधार नहीं हो सकता.

न्यूज़18 की एक ख़बर के मुताबिक़ याचिका में कहा गया है कि यह विधेयक संविधान की मूल विशेषताओं का उल्लंघन करता है, क्योंकि आर्थिक आधार पर आरक्षण सिर्फ सामान्य वर्ग तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है. इसके अलावा 50 फीसदी आरक्षण की सीमा की भी अवहेलना नहीं की जा सकती है.

गौरतलब है कि 10 घंटे से ज़्यादा लंबी बहस के बाद बुधवार को इस विधेयक को राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया. एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मिलने वाले मौजूदा50 फीसदी आरक्षण के ऊपर कोटा खत्म हो जाएगा. अधिकांश दलों ने बिल के लिए अपना समर्थन दिया.

इस मामले में समाजवादी पार्टी के नेता राम गोपाल यादव ने पूछा, “आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण एक महान विचार है. लेकिन नौकरियां कहां हैं? आखिरकार आप इससे क्या हासिल करेंगे?”

वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि यह बिल इस बात की स्वीकृति है कि हमने पर्याप्त नौकरियां नहीं बनाई हैं. इस बिल से केवल गरीबी रेखा फिर से बनेगी और नई गरीबी रेखा 2,100 रुपये प्रतिदिन है.”

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