कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अब डीयू की लड़कियों को कैद करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है!

बेश़क इनकी मांगों के आगे पितृसत्तात्मक समाज दहाड़ मार रहा हो। लेकिन, उस समय इनके इस गाने ने उस दहाड़ को खामोशी में तब्दील कर दिया था और सुबह तक ये लड़कियां और इनके आज़ादख़याली विचार डीयू के बाहर हवाओं में तैरते रहे।

तारीख 8 अक्टूबर, साल था 2015। रात के करीब 8 बजे दिल्ली यूनिवर्सिटी की कुछ छात्राएं दिल्ली विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन के पास इक्कट्ठा हुई थीं। ये लड़कियां विश्वविद्यालयों में हो रहे लैंगिक भेदभाव के खिलाफ यहां आई थीं। लड़कियां इससे पहले भी एक दूसरे से मिला करती थीं, लेकिन किन्हीं दूसरे मुद्दों के खिलाफ़ होने वाले धरनों पर। पहली बार लड़कियां विश्वविद्यालयों में अपने साथ हो रहे लैंगिक भेदभाव के खिलाफ मोर्चेबंद हुई थीं, जिसकी शुरुआत उन्हीं दिनों जामिया प्रशासन द्वारा लड़कियों को रात को हॉस्टल से निकलने पर पाबंदी लगाने वाले पितृसत्तात्मक फ़रमान के खिलाफ़ हुई थी।

इक्कठा हुई लड़कियां मार्च निकालना शुरू करती हैं। लड़कियों का मार्च जैसे ही डीयू के महिला छात्रावासों की तरफ जाता है, छात्रावास के कमरों में बंद लड़कियां छात्रावास के ताले तोड़कर इस मार्च में शामिल हो जाती हैं और उस रात यह मार्च डीयू की धरती पर आंदोलन की शक्ल ले लेता है। उस आंदोलन का नाम पड़ा पिंजरा तोड़।

विरोध मार्च निकालती छात्राएं, तस्वीर साभार- पिंजरा तोड़ ब्रेक द हॉस्टल लॉक्स

8 अक्टूबर, 2015 की उस हल्की ठंडी रात में प्रशासन ने लड़कियों के आन्दोलन को आंशिक रूप से तो दबा दिया। लेकिन, वैचारिक रूप से इस आन्दोलन की नदियां फूट पड़ीं और देश के अलग-अलग कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इसकी धाराएं बह निकलीं। इसीलिए पिछले कई दिनों से देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों से लड़कियों के आंदोलित होने की ख़बरें लगातार सामने आ रही हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में पढ़ रही लड़कियों का गुस्सा उनके साथ हो रहे लैंगिक भेदभाव के खिलाफ रह-रहकर बाहर आ रहा है। पिछले 3 साल से चल रहे इस आंदोलन के आगे अभी शिक्षण संस्थानों का पितृसत्तात्मक प्रशासन नहीं झुका है। इन्हीं पितृसत्तात्मक नियमों के खिलाफ डीयू में तीन साल बाद एक बार फिर उसी तारीख को आंदोलन फुंकारे मारने लगता है।

तारीख 8 अक्टूबर, साल 2018। शाम के चार बज रहे हैं। अस्त हो रहा सूरज इमारतों और दरख्तों की बड़ी-बड़ी परछाइयां धरती पर उकेर रहा है। हॉस्टल गेट के आगे पसरी इसी छांव में लड़कियां अपने चार्टों की लड़ी, बैनर और पोस्टर लगा रही हैं। एक-दो के हाथ में डफ़ली और छोटा अंग्रेज़ी बाजा भी है। गेट से बाहर आने वाला लगभग हर शख़्स इन लड़कियों को पराई सी निगाहों से देखकर आगे का रस्ता नापने लगता है। एक नज़र में ऐसा लग रहा है जैसे ये लड़कियां नुक्कड़ नाटक खेलेंगी और लोगों की वाहवाही लूटकर चलती बनेगीं।

बैनर और पोस्टर, तस्वीर साभार- पिंजरा तोड़ ब्रेक द हॉल्टल लॉक्स

मगर यह सच नहीं है, जैसे ही लाग रंग में रंगे इनकी मांगों के बैनर हवा में लहराने लगते हैं, तब समझ आता है कि नाटक की नहीं बल्कि नारों की महफ़िल सजने वाली है। दो फैंसी से दिखने वाले लड़के जो इन लड़कियों को कई देर से देख रहे थे, उनमें से एक कहता है चल भई चलते हैं यहां से। यहां इन्हें आज़ादी लेने दे।

चंद मिनट बीतते ही कुछ लड़कियां गेट के आगे पहुंच जाती हैं और पैनी सी आवाज़ वाला एक छोटा सा माइक लेकर गाना शुरू करती हैं, “तोड़ दो ताले, जमाना क्या करेगा। इन तालों से है झगड़ा अपना पुराना, जमाना क्या करेगा।”

अब डीयू की लड़कियों को कैद करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है! रिपोर्ट: मनदीप पूनिया

अब डीयू की लड़कियों को कैद करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है! (रिपोर्ट: मनदीप पूनिया)

Posted by NewsCentral24x7 on Tuesday, October 9, 2018

गाने से सफ़र शुरू करते हुए लड़कियां नारों पर आती हैं। कुछ नारे लगाने के बाद इन लड़कियों के बीच बातचीत का एक लंबा दौर शुरू होता है। आगे मंच पर अपनी बात रखने आने वाली हरेक लड़की चिल्ला-चिल्लाकर अपनी आज़ादी की मांग उठा रही थी। लड़कियों के बिल्कुल पीछे लगे हुए एक लंबे लाल रंगे बैनर पर इनकी मांगे लिखी हुई थीं। उस बैनर में लिखा था,

# दिल्ली विश्वविद्यालय व इससे जुड़े सभी कॉलेज़ों में लड़कियों के हॉस्टल की समय और दूसरी पाबंदियां फौरन हटाई जाएं।

# हॉस्टल 24 घण्टे खुले रहें।
# लोकल गार्ज़ियन के नियम को रद्द किया जाए।
# दिव्यांग छात्रों के लिए अलग हॉस्टल बनाया जाए।
# हॉस्टल की सीट जरूरत के आधार पर मिले, योग्यता के आधार पर नहीं।
# सभी हॉस्टलों के सीट आवंटन में sc/st और ओबीसी आरक्षण को लागू किया जाए।

आंदोलन का नाम पिंजरा तोड़ ही क्यों?

आंदोलन का नाम लड़कियों ने पिंजरा तोड़ इसलिए रखा क्योंकि उन्हें रात के समय में हॉस्टल से बाहर नहीं निकलने दिया जाता और रात को बंद हॉस्टल पिंजरे जैसा लगता है। जबकि यूनिवर्सिटी के कैंपस तक पहुंचने वाली लड़कियां 18 साल से ऊपर की हो चुकी होती हैं। इसके उलट लड़कों पर इस तरह की कोई पाबंदी नहीं होतीं। इस आंदोलन में शामिल एक लड़की बताती हैं, “यूनिवर्सिटी एक तो सभी लड़कियों को हॉस्टल नहीं देती है, जिन्हें देती है उन्हें लैंगिक भेदभाव करते हुए रात को हॉस्टल में कैद रखती है। अगर किसी लड़की का सुबह के चार बजे बाहर चाय पीने का मन हो तो उसे जाने नहीं दिया जाता है। जिन लड़कियों को हॉस्टल नहीं मिलता है, उन्हें बाहर पीजी लेकर रहना पड़ता है और वहां भी उन्हें रात के समय बाहर निकलने की आज़ादी नहीं दी जाती है। हम छात्राओं को घर और समाज में तो पितृसत्तात्मक नियमों में घेरकर रखा ही जाता है, मगर यूनिवर्सिटी प्रशासन भी ऐसा करने में बिल्कुल पीछे नहीं हैं। रात को अगर लड़की थोड़ा सा लेट हो जाती है तो इसपर भारी-भरकम ज़ुर्माना लाद दिया जाता है। हम आज यूनिवर्सिटी प्रशासन के पितृसत्तात्मक नियमों के खिलाफ़ यहाँ इक्कठे हुए हैं और यहां से अब इसकी कमर तोड़कर ही हटेंगे।”

पिंजरा तोड़ आंदोलन में अपने हक़ों के लिए आवाज़ उठाती छात्राएं

छात्राओं को धरना देते देख प्रशासन के एक दो लोग मिलने आए और मांगों को मानने की बजाय इन लड़कियों को समझाने लगे। जिसके बाद लड़कियों ने आपा खो दिया और रात के साढ़े आठ बजे डीयू के पास पड़ने वाले मॉल रोड की तरफ कूच कर दिया। रोड पहुंचकर लड़कियों ने वाहनों को रुकवाकर रोड को जाम करने की कोशिशें की। इससे यातायात काफी अस्त-व्यस्त हो गया। जिसके चलते पुलिस उन लड़कियों को खींच-खींचकर रोड के किनारे करने लगी।

गुस्साई लड़कियां पुलिस की कार्रवाई के बावजूद रोड पर डटी थीं। तकरीबन 10 बजे तक रोड जाम करने के बाद लड़कियां गेट की तरफ़ वापस लौट गईं औऱ फिर से वहां अपनी आज़ादी का जश्न मनाने लगीं। जश्न मनाते वक़्त ढफ़ली और हथेली की ताल पर एक गाना शुरू करती हैं, “तोड़-तोड़ के बंधनों को देखो बहनें आती हैं, आएंगी जुल्म मिटाएंगी, वो तो नया जमाना लाएंगी।” लड़कियां इस गाने को झूम-झूमकर गा रही थीं, जैसे प्रशासन ने इनकी मांगों को मान लिया हो।

बेश़क इनकी मांगों के आगे पितृसत्तात्मक समाज दहाड़ मार रहा हो। लेकिन, उस समय इनके इस गाने ने उस दहाड़ को खामोशी में तब्दील कर दिया था और सुबह तक ये लड़कियां और इनके आज़ादख़याली विचार डीयू के बाहर हवाओं में तैरते रहे।

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