कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह का कद बढ़ता रहा और उनकी गोद में राकेश अस्थाना पलता रहा!

यह मामला आंतरिक कलह से कहीं ऊपर है, जिसके कनेक्शन सत्ता के गलियारों से होकर गुजरते हैं। शायद, इसीलिए केंद्र की मोदी सरकार ने राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे 13 अधिकारियों का तबादला कर दिया है।

साल 2017, अक्टूबर का महीना। गुजरात कैडर के एक आईपीएस अधिकारी को सीबीआई में दूसरे नम्बर की हैसियत यानी स्पेशल डायरेक्टर का पद सौंपने की तैयारियां चल रही थीं। उसकी नियुक्ति का चौतरफ़ा विरोध होने लगा। विरोध का कारण था उस अधिकारी का भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी होना। अगस्त में सीबीआई ने गुजरात की स्टर्लिंग बायोटेक कंपनी में छापेमारी की थी, छापेमारी के दौरान जब्त एक डायरी में उस आईपीएस अधिकारी का नाम भी मिला था। इसी को आधार बनाकर एक एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस नियुक्ति को ‘ग़ैर-कानूनी’ बताया। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी होने के चलते सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा ने भी इस अधिकारी की नियुक्ति का विरोध किया।
स्पेशल डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए सीबीआई के डायरेक्टर की राय लेना जरूरी है। मगर सीबीआई डायरेक्टर की एक न चली और उस आईपीएस अधिकारी को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर बना ही दिया गया। सीबीआई के डायरेक्टर के विरोध के बावजूद भी उस आईपीएस को नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का करीबी होने की वजह से मिली थी। मोदी और शाह की कृपा से नियुक्ति पाने वाला वह आईपीएस एक बार फिर से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। इस विवादित आईपीएस का नाम है राकेश अस्थाना।

राकेश अस्थाना अभी हाल ही में चल रही सीबीआई की अंदरूनी कलह में दोबारा विवादों के घेरे में आए हैं। सीबीआई ने अपने ही स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना पर जांच की आड़ में पैसे उगाहने के आरोप लगाए हैं।

कौन है राकेश अस्थाना?

साल 1984। गुजरात में बतौर आईपीएस राकेश अस्थाना की नियुक्ति होती है। अपने शुरुआती सालों में ही अस्थाना गुजरात से सेंटर में अपना ट्रांसफ़र करवाना चाहते हैं। मगर ऐसा नहीं हो पाता। 80 के दशक के आख़िरी तक आते-आते अस्थाना गुजरात के कई बड़े उद्योगपतियों के करीबी हो जाते हैं। उद्योगपतियों से दोस्ती के साथ-साथ अस्थाना भाजपा के नेताओं के नज़दीक भी आने लगे थे। 90 के दशक में तो उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के खास अफ़सरों की लिस्ट में जगह भी बना ली थी और आडवाणी की वज़ह से ही नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के साथ भी उनकी खूब पटने लगी थी। नाम न छापने की शर्त पर एक पूर्व आईपीएस अधिकारी बताते हैं कि 1996 में लालू यादव को गिरफ्तार करने के बाद से ही अस्थाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के पसंदीदा अफ़सर बन गए थे। इतना ही नहीं आडवाणी और कई वरिष्ठ नेताओं की सलाह पर नरेंद्र मोदी ने अस्थाना को 2002 में हुए साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड की जांच के लिए एसआईटी का हेड बना दिया। वह रिटायर्ड आईपीएस अफसर उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं,

 “उन दिनों हर मुश्किल घड़ी में सरकार अस्थाना को ही याद करती थी। गोधरा कांड के समय अस्थाना ने अपने काम से मोदी को संतुष्ट कर दिया था। पीठ पीछे अधिकारी अस्थाना को ‘मोदी का भक्त’ जैसे नामों से बुलाते थे और उसके सामने सीनियर अधिकारियों की भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती थी। एक बार कुछ लोगों ने उन्हें मोदी भगत कहा था, लेकिन उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी।”

2002 के बाद मोदी से बढ़ी नज़दीकियों की बदौलत ही अस्थाना को मन-माफ़िक पोस्टिंग मिलती रही। उस दौर में लगभग सभी लोग यह मानते थे कि अमित शाह और अस्थाना एक दूसरे को पसंद नहीं करते हैं। लेकिन, यह अधूरा सच है क्योंकि बेशक अस्थाना और अमित शाह उन दिनों सार्वजनिक रूप से एक साथ ज्यादा न देखे गए हों मगर अंदरखाने के हर काम में दोनों की रजामंदी होती थी। अगर अस्थाना के अब तक के करियर को ध्यान से देखें तो वह हर उस मामले की जांच में शामिल मिलेंगे जिसने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के राजनैतिक जीवन को अहम मोड़ दिए हैं। गोधरा कांड की जांच से लेकर चारा घोटाला, अहमदाबाद बम धमाके और आसाराम के मामले में हुई जांच में अस्थाना का मुख्य किरदार रहा है। राकेश अस्थाना को लालू प्रसाद यादव से छह घंटे पूछताछ के बाद लोग जानने लग गए थे। अस्थाना द्वारा की गई लगभग हर मामले की जांच पर सवाल खड़े हुए है। इशरत जहां वाले मामले में तो गुजरात के ही आईपीएस सतीश वर्मा गुजरात हाई कोर्ट चले गए थे। हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका से पता चला था कि गुजरात सरकार की शह में अस्थाना ने एक फोरेंसिक अफ़सर को तथ्यों के साथ फ़ेरबदल करने के लिए मज़बूर करने की कोशिश भी की थी।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात कैडर के करीब 20 अफसरों को केंद्र में सेवाएं देने के लिए बुलाया गया है। वित्त मंत्रालय के सचिव हंसमुख अधिया से लेकर वाणिज्य सचिव रीता टोटिया तक कई अधिकारी गुजरात में कार्यरत रहे हैं।

सीबीआई के पास चल रहे मामलों को राजनैतिक तराजू में तौलने के बाद ही शायद अस्थाना को कई महत्वपूर्ण मामलों की जांच के लिए गठित हुई एसआईटी की जिम्मेदारियां मिलती रहीं। 2016 के बाद के ऐसे सभी मामले जिनमें विपक्ष के नेताओं को घेरा जा सकता था, उन मामलों की जांच अस्थाना को ही दी गई है। फिर चाहे वो अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला हो, आईएनएक्स मीडिया का मामला हो, विजय माल्या का लोन फ्रॉड हो या राजस्थान का एम्बुलेंस घोटाला आदि।

हर मामले की जांच को लेकर कठघरे में खड़े राकेश अस्थाना पर इस बार खुद सीबीआई ने ही एफ़आईआर दर्ज करवाई है। हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोइन क़ुरैशी को क्लीनचीट देने के लिए घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई है। इसके साथ ही सीबीआई मुख्यालय में छापामारी कर अस्थाना के साथी डीएसपी देवेंद्र कुमार को गिरफ़्तार किया है। इस मामले को लेकर अस्थाना दिल्ली हाइकोर्ट चले गए हैं और कोर्ट ने 29 अक्टूबर तक उनपर कोई कार्रवाई न करने की बात कही है। 29 अक्टूबर को ही कोर्ट में सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा को अस्थाना के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों पर जवाब देना होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने मीट कारोबारी मोईन कुरैशी भ्रष्टाचार मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के ज़रिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी है और लगभग तीन करोड़ रुपये अस्थाना को भेजे जा चुके हैं।

इससे पहले अस्थाना का निजी जीवन भी चर्चा का विषय रहा है। साल 2016 में बेटी की लग्ज़री शादी और प्राइवेट चॉपर में विदेश घूमने के कारण भी लोगों ने अस्थाना पर खूब सवाल खड़े किए थे।

राकेश अस्थाना ने सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ होने के बाद आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ भी सीवीसी में कथित भ्रष्टाचार के 10 मामले दर्ज़ कराए हैं। हालांकि, आलोक वर्मा का इस तरह से विवादों से नाता नहीं रहा है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आलोक वर्मा को उन पुलिस अधिकारियों में गिना जाता है, जिन्होंने पुलिस सेवा को बेहतर बनाने के लिए काम किया है।

बेशक मीडिया हाउस और लोग इस मामले को सीबीआई की आंतरिक कलह बता रहे हों। लेकिन, यह मामला आंतरिक कलह से कहीं ऊपर है, जिसके कनेक्शन सत्ता के गलियारों से होकर गुजरते हैं। शायद, इसीलिए केंद्र की मोदी सरकार ने राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे 13 अधिकारियों का तबादला कर दिया है।

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