कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

स्वच्छ भारत अभियान पर वाहवाही लूट रहे हैं PM मोदी, लेकिन खुले में शौच करने को मजबूर हजारों लोग, जानें कौन-सा राज्य सबसे आगे

चार राज्यों में किए गए सर्वे में दो साल से अधिक उम्र वाले 44 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं.

सरकार भले ही स्वच्छ भारत मिशन को लेकर अपनी उपलब्धियां गिनाती नहीं थक रही है लेकिन एक सर्वेक्षण में यह बात सामने निकलकर आई है कि शौचालय होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग खुले में शौच कर रहे हैं. सरकार उनकी व्यवहारों में परिवर्तन नहीं ला पाई है.

ग्रामीण स्वच्छता व्यवहार को लेकर साल 2018 में बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में एक सर्वेक्षण किया गया था. इसमें कुल 1,558 घरों को शामिल किया गया.

सर्वेक्षण के मुताबिक़ चार राज्यों में किए गए सर्वे में दो साल से अधिक उम्र वाले 44 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं. इनमें वे लोग शामिल हैं जिनके पास शौचालय है. यानी सरकार शौचालय तो बना दी लेकिन लोगों में उसकी आदतें विकसित नहीं कर पाई.

ऐसा ही सर्वेक्षण साल 2014 में इन राज्यों के अलावा हरियाणा में भी किया गया था. 2018 के सर्वेक्षण में 1224 ऐसे परिवार शामिल थे जो 2014 के सर्वेक्षण के दौरान भी मौजूद थे. हालांकि इस सर्वे में 334 नये घरों को भी शामिल किया गया. जिसके कारण साल 2018 का सर्वे कुल 1,558 घरों पर किया गया.

रूरल इंडिया ऑनलाइन के मुताबिक, 2014 में स्वच्छ भारत मिशन के बाद से 2018 के सर्वेक्षण में ग्रामीणों ने खुले में शौच के परिवर्तनों को समझने की कोशिश की. इस सर्वेक्षण में चार उत्तरी राज्यों में एसबीएम के प्रदर्शन का आकलन किया गया है, जो भारत की ग्रामीण आबादी का दो-तिहाई हिस्सा है.

स्वच्छ भारत मिशन का लक्ष्य 2019 तक खुले में शौच को खत्म करना था. लेकिन मध्य प्रदेश में लगभग 25 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 39 प्रतिशत, राजस्थान में 53 प्रतिशत और बिहार में 60 प्रतिशत लोग हैं, जो अभी में खुले में शौच कर रहे हैं.

हालांकि सर्वेक्षणकर्ताओं का कहना है कि स्वच्छ भारत मिशन 2014 से 2018 के बीच इन चार वर्षों में खुले में शौच में लगभग 26 प्रतिशत की कमी आयी है.

हालांकि ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि स्वच्छ भारत मिशन को कामयाब करने के लिए स्थानीय अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों के साथ जबरदस्ती और धमकी आम बात थी. इसके अलावा पत्रकारों द्वारा कभी-कभी हिंसा और धमकाने की सूचना भी सामने आयी थी.

चार राज्यों में शौचालय होने के बावजूद भी 23 फीसदी लोग खुले में शौच करते हैं. मध्य प्रदेश में 16 प्रतिशत शौचालयों के मालिक खुले में शौच को जाते हैं, वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश में 21 प्रतिशत और राजस्थान में क़रीब 40 प्रतिशत ऐसे लोग हैं.

सर्वेक्षण में कुछ महत्वपूर्ण बिंदू सामने आएं-

  • सभी चार राज्यों में 1 प्रतिशत वयस्क महिलाएं (जिनके पास स्वयं का शौचालय नहीं हैं) खुले में शौच करती हैं. जबकि, 20 प्रतिशत वयस्क महिलाएं खुद का शौचालय होने के बावजूद खुले में शौच करती हैं.
  • वहीं, इन सभी चार राज्यों में वयस्क पुरुष (जिनके पास खुद का शौचालय नहीं हैं), 44 प्रतिशत खुले में शौच करते हैं. जबकि शौचालय होने के बावजूद 25 प्रतिशत वयस्क पुरुष का खुले में शौच करते हैं.
  • सभी 1,158 घरों में (शौचालय के साथ या बिना) 56 प्रतिशत लोगों में कम से कम एक व्यक्ति ऐसा है जो खुले में शौच करता है. वहीं शौचालय होने वाली 40 प्रतिशत लोगों में कम से कम एक व्यक्ति खुले में शौच करता है.
  • सर्वैक्षण वाले सभी चार राज्यों में कुल मिलाकर खुले में शौच करने का स्तर 2014 में 70 प्रतिशत से गिरकर 2018 में 44 प्रतिशत हो गया है. सबसे अधिक गिरावट मध्य प्रदेश (43 प्रतिशत) देखी गयी है. वहीं, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 26 प्रतिशत और बिहार में 15 प्रतिशत की गिरावट देखी गयी है.
  • वहीं, इन घरों में खुद के शौचालय में बढ़ोतरी देखी गयी है. 2014 में यह आंकड़ा 37 प्रतिशत था जो 2018 में बढ़कर 71 प्रतिशत हो गया है. 2018 के सर्वे में राजस्थान में 78 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 73 प्रतिशत और बिहार में 50 प्रतिशत की तुलना में मध्य प्रदेश में खुद का शौचालय होने वाले 90 फीसदी घरों में यह सर्वेक्षण किया गया.
  • 2018 के सर्वेक्षण के पहले पांच साल में बिहार के 19 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 43 प्रतिशत, राजस्थान के 46 प्रतिशत और मध्य प्रदेश के 53 प्रतिशत घरों को सरकार ने शौचालय निर्माण के लिए सहायता राशि प्रदान की थी.
  • सर्वे में शामिल सभी घरों में 56 प्रतिशत लोग (जिनके पास खुद का शौचालय नहीं था) ने माना कि उनकों स्वच्छ भारत मिशन के कार्यान्वयन को लेकर स्थानीय अधिकारियों द्वारा किसी न किसी रूप में अवगत कराया गया था.
  • स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के तहत खुले में शौच करने से रोकने के लिए लोगों को परेशान किया जाने लगा. एसबीएम का पालन नहीं करने पर सार्वजनिक रूप से मिलने वाली लाभ (जैसे खाद्य राशन) के नुकसान की धमकी मिलती है और इसके साथ ही स्वच्छ भारत मिशन का पालन नहीं करने पर जुर्माना भी लगाया जा रहा है.
  • सर्वेक्षणकर्ताओं ने कहा कि मध्य प्रदेश में मुख्य रूप से शौचालय बनाने के लिए लोगों को समझाया गया. वहीं. उत्तर प्रदेश में लोगों को एक निश्चित सीमा तक समझाया गया. यानी कि उन लोगों के समझाया गया जो खुद का शौचालय होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं करते थे.
  • जिनके पास शौचालय था और जिनके पास नहीं था उनके बीच दलित और आदिवासी घराने के लोगों के साथ अन्य घरानों की तुलना में जोर-जबरदस्ती करने की अधिक संभावना थी.
  • सर्वे में कहा गया है कि बड़ी टंकी वाले शौचालयों वाले घरों में खुले में शौच की करने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी. छोटे टंकी को बार-बार खाली करनी पड़ती है और सफ़ाई का काम एक जाति विशिष्ट के साथ जुड़ा हुआ है. ऐसे में बड़ी टंकी वालें शौचालयों के लिए मेहतर की जरूरत नहीं पड़ती.
  • बड़े टंकी वाली शौचालयों के निर्माण की कीमत औसतन 34 हज़ार है. जबकि एसबीएम के लिए सरकार की तरफ से दी जाने वाली सहायता राशि 12 हज़ार रूपये है. जिससें यह पत्ता चलता है कि कई घरों में शौचालय क्यों नहीं बनवाए गये या फिर ऐसी जगह जहां सहायता राशि आसानी से मिलने की संभावना होने के बावजूद भी लोगों ने शौचालय निर्माण का काम नहीं करवाया.
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