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शर्मनाक: मीटू मामले में जांच के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय ने रिटायर्ड जजों की समिति के गठन का प्रस्ताव ठुकराया

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने #Metoo आन्दोलन में यौन शोषण के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए सेवानिवृत जजों की एक कमेटी बनाने की मांग की थी।

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने #Metoo आन्दोलन में सामने आये यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए चार सेवानिवृत जजों की समिति के गठन की मांग की थी। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी के कार्यालय ने इस प्रस्ताव को कथित रूप से खारिज़ कर दिया है।

बुधवार को पत्रकार अभिसार शर्मा ने इस बात का खुलासा किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने जजों की बजाय मंत्रिमंडल के मंत्रियों की एक तीन सदस्यीय समिति का गठन करने का निर्णय लिया है।
गौर करने की बात यह है कि जब मोदी सरकार के मंत्रिमंडल के एक मंत्री को यौन उत्पीड़न के आरोपों के चलते ही इस्तीफा देना पड़ा है, ऐसे में मंत्रिमंडल की समिति से इन मामलों में स्वतन्त्र और निष्पक्ष जांच कैसे करेगी।

अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किये एक विडियो में शर्मा ने कहा, “अब आप सोचिये कि अपने ही पार्टी के मंत्रियों के ख़िलाफ़ लगे आरोपों की जांच ये मंत्री किस तरह से करने वाले हैं? क्या आप देख सकते हैं कि यह सरकार आपको किस तरह से बेवकूफ़ बना रही है।”

शर्मा के मुताबिक सूत्रों ने उन्हें यह भी बताया कि जब मेनका गाँधी ने इन आरोपों की जांच के लिए स्वतन्त्र समिति जांच समिति की घोषणा की, तब उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय से एक कॉल आया।

अब सरकार गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों के एक समूह का गठन कर रही है जो यौन उत्पीड़न क़ानूनों की सत्यता की जांच करेगी।

प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला यह सवाल पूछने पर मजबूर कर देता है कि क्या उनकी सरकार यौन उत्पीड़न के मामलों के निपटारे को लेकर सच में गंभीर है? अगर हाँ, तो मेनका गाँधी के सेवानिवृत जजों की एक स्वतन्त्र समिति गठित करने के प्रस्ताव को क्यों ठुकरा दिया?

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