कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट: अकबर के कातिलों को बचाने के लिए अब नेता रच रहे हैं नए प्रपंच

धर्म की राजनीती के जाल में फंस कर आम लोग गँवा रहे हैं जान और जा रहे हैं जेल

अलवर का नाम आते ही ध्यान आती है गौ रक्षा और उसके नाम पर हत्या। अलवर ज़िले के रामगढ़ कस्बे से 4 किलोमीटर दूर एक गांव है ललावन्डी। जहां 20 जुलाई को पैदल गाय ले जा रहे रकबर की हत्या हो गई। रकबर की मौत को लेकर कई ऐसी कहानियां गढ़ी जा चुकी हैं जिनके पार सच को देख पाना अब मुश्किल है।

दिल्ली से करीब सौ किलोमीटर दूर हरियाणा के नूह जिले का एक कस्बा है फिरोजपुर झिरका। फिरोजपुर झिरका से रामगढ़ जाते वक़्त चौड़े हाईवे से एक पतली संकरी सड़क खुलती है जो रकबर के गांव ले जाती है। गांव के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगा हुआ है जिसपर लिखा हुआ है, कोलगांव।

(कोलगांव)

गांव के शायद किसी घर की कोई पक्की ईंटों की बाड़ेबंधी नहीं है। रहने के छोटे-छोटे कमरों के आगे कच्चे आंगन हैं जिनमें गाय भैंसे बंधी हुई हैं| एक नज़र देखने भर से समझ में आ जाता है कि ये लोग पशुपालक हैं।

रकबर के घर के आसपास पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं की गाड़ियां खड़ी हैं। तंग गली के एक तरफ वाले खुले आंगन में मर्द बैठे हैं तो दूसरी तरफ रकबर के घर के आंगन में औरतें। आसपास के घरों की मुंडेरों से औरतें दोनों तरफ ताक रही हैं। खुले आंगन में राजस्थान के एक सामाजिक संगठन के कार्यकर्ता गांव के मर्दों से घिरे हुए हैं। उसी भीड़ में रकबर के पिता और उनके चचेरे भाई हारून बैठे हुए हैं जो उनके पूछे गए सवालों का जवाब दे रहे हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता के मामले की स्थिति पूछने पर हारून बताते हैं,

“अब रामगढ़ का विधायक आहूजा टांग अड़ा रहा है। सरकार भी अब कह रही है कि रकबर की मौत पुलिस की पिटाई से हुई है| वो सिर्फ रकबर के क़ातिलों को बचाने के लिए ऐसा कह रही हैं। जो नवल किशोर है, वह उस दिन वहां रकबर को पीटने वालों के साथ भी था और उसके बाद पुलिस के साथ भी था। उसकी अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है। हम लगातार मांग कर रहे हैं कि उसकी भी जांच होनी चाहिए। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि सरकार जो कुछ कर रही है वो सब रकबर के क़ातिलों को बचाने के लिए कर रही है|”

जब हारून ये सब बता रहे थे तो बीच-बीच में असहज महसूस कर रहे थे।

(अकबर के घरवाले और गांव के लोग)

भीड़ की आखरी कतार में खड़े एक बच्चे से रकबर की पत्नी के बारे में पूछने पर उसने गली के दूसरी तरफ एक छप्पर के नीचे बैठी औरतों की तरफ इशारा कर दिया। छप्पर के आगे खुले आंगन में गायें बंधी हुई हैं। पूछने पर पता चला कि ये गायें रकबर की हैं। रकबर के परिवार के पास घर के नाम पर एक छोटा सा कोटड़ा(कमरा) है जिसके आगे एक छोटा सा छप्पर है। छप्पर के नीचे बैठी औरतों के बीच में एक खाट पर रकबर की पत्नी असमीना बेसुध होकर लेटी हुई है।

जब असमीना से रकबर के बारे में पूछा तो रुंधे हुए गले से उसने बोलना शुरू किया, “वो मेरी अम्मी से पैसे उधार लेकर आए थे गाय लाने के लिए। मैंने ही उनसे कहा था कि बच्चे बड़े हो रहे हैं तो अब पैसों की जरूरत पड़ेगी। इसलिए वो गाय लाने वहां गए थे|”

इतना कहते ही असमीना का सांस टूट गया। पास बैठी एक औरत ने अपने पल्लू से असमीना को हवा करनी शुरू कर दी।

(खाट पर लेटी हुई अकबर की पत्नी असमीना)

असमीना और रकबर के सात बच्चे हैं। रकबर की बड़ी बेटी वहां बैठी औरतों को पानी भी पिला रही है जो करीब 12 साल की है। बाकी बच्चे आसपास बैठे हुए हैं।

मुस्लिम बहुल नूह जिला शिक्षा के मामले में हरियाणा सूबे का एक पिछड़ा इलाका है। यहां के ज्यादातर लोग पशुपालक और किसान हैं, जो आसपास के गांव या वहां भरने वाले पशु मेलों से पशु खरीदते हैं। पिछले 2 साल में इस तरह की पांचवी घटना है जिसमें किसी गौपालक को भीड़ ने गौरक्षा के नाम पर मार दिया हो।

कोलगांव के कुछ किलोमीटर दूर ही हरियाणा-राजस्थान की सीमा है। सीमा के उस पार चले जाने पर सिर्फ सूबे का नाम बदलता है संस्कृति नहीं। राजनैतिक सीमाएं इस इलाके को अलग करती हैं तो एक ही जैसी बोली, एक ही तरह का रहनसहन इन्हें जोड़ता भी है।

हम दूसरे पक्ष को जानने के लिए कोलगांव से करीब 25किलोमीटर दूर राजस्थान के ललावंडी गांव पहुंचते हैं जहां रकबर को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। ललावन्डी पहुंचने के बाद एक लड़के से गिरफ्तार हुए आरोपियों के बारे में पूछने पर वह हमें नरेश के घर छोड़ आया। नरेश के घर हमारी मुलाकात उसकी मां बिमला से हुई। उनके बेटे की गिरफ्तारी के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया,

“नरेश तो सरकार की मदद कर रहा था और पुलिस ने उसे ही गिरफ्तार कर लिया। सरकार ने ही तो कह रखा है कि अगर कोई गाय की तस्करी करे तो हमको बता दो। ये शिव सेने(सेना) और विश्व हिन्दू सरकार की ही तो है इसलिए तो उन्होंने नवल किशोर को फ़ोन करा था। अब तो सरकार भी कह रही है कि वो आदमी(रकबर) पुलिस की कस्टडी में मरा है। पता नहीं हमारे बच्चे ही क्यूं उठा लिए।”

इतना कहते ही वो रोने लग जाती हैं।

इसके बाद हम गिरफ्तार हुए दूसरे आरोपी परमजीत के घर गए। परमजीत क़ा घर गांव के बिल्कुल आख़िरी छोर पर है।

(गिरफ्तार हुए आरोपी परमजीत का घर)

घर के बरामदें में परमजीत की मां एक चारपाई पर बैठकर टीवी को इंटरव्यू दे रही हैं। साथ में एक नवविवाहित सी लग रही लड़की भी बैठी हुई है। पूछने पर पता चला कि वह परमजीत की पत्नी है उन दोनों की शादी 6 महीने पहले ही हुई है। परमजीत की मां रो-रोकर अपने बेटे को निर्दोष बता रही हैं और पत्नी सिर्फ लगातार रो ही रहीं हैं। वहीं पर कुर्सी डालकर बैठे परमजीत के बड़े भाई रंजीत सिंह से इस मामले के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, “उस रात परमजीत और उसका दोस्त धर्मेंद्र हमारे खेतों की रखवाली कर रहे थे। तभी दो जनों ने हमारे खेतों में गाय घुसा दी जिसके बाद उनकी वहां थोड़ी बहुत मारपीट हुई।”

अभी रंजीत बोलना बंद भी नहीं हुआ था कि पास में खड़े एक सज्जन ने उन्हें बीच में ही टोक दिया। उसने कहा, “अरे क्या कर रहे हो। ये बोलो कि वे गौतस्कर थे और परमजीत होर ने उन कसाइयों से गऊ माता की जान बचाई। उसके बाद नवलकिशोर जी पुलिस लेकर आए। फिर वो पुलिस की पिटाई से मरा है।”

जब उन सज्जन के बारे में पूछा तो पता चला कि वो पास के ही किसी गांव का है और आरएसएस का आदमी है।

नवल किशोर के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, “नवल किशोर तो समाज सेवी आदमी हैं। यहां बहुत सारी गाय उन्होंने बचाई हैं।”

(नवल किशोर शर्मा, फोटो क्रेडिट: डेक्कन हेराल्ड)

नवल किशोर वही आदमी है जिसके बारे में रकबर के घरवाले भी जांच की बात कर रहे थे। नवल किशोर विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़ा हुआ है और वहां के विधायक ज्ञानदेव आहूजा का भी खास आदमी है। उन लोगों से बातचीत करते वक़्त पता चला कि उस दिन रकबर को रात के करीब 1 बजे गिरफ्तार करने के बाद नवल किशोर पुलिस के साथ ही था। गांव से कुछ दूर निकल जाने के बाद पुलिस ने रकबर को एक टयूबवेल पर नहलाया भी है और उसके कपड़े भी साफ किए हैं। फिर रामगढ़ के एक खोखे पर चाय पी है और उसके बाद गाय छोड़ने गौशाला गए हैं। फिर 3 घण्टे बाद सुबह 4 बजे उसको अस्पताल लेकर गए हैं।

हमने जब नवल किशोर के पुलिस के साथ जाने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि वे रास्ता बताने के लिए पुलिस के साथ गए थे।

मगर सच तो यह है कि लालवंडी से रामगढ़ थाने की दूरी सिर्फ  4 किलोमीटर है और बिल्कुल सीधा रास्ता है।

उस शख्स से नम्बर लेकर हमने नवल किशोर को फ़ोन मिलाया और उससे बात की। अपनी बातचीत के दौरान नवल ने यह बात जरूर कबूली कि वह पूरा समय पुलिस के साथ था। लेकिन रकबर को मारने वाली बात पर उसने अपना पल्ला झाड़ लिया और बार-बार यही कहता रहा कि पुलिस ने उसकी आंखों के सामने रकबर की पिटाई की है।

वहीं दूसरी तरफ पुलिस ये जरूर मान रही है कि रकबर की मौत पुलिस की कस्टडी में हुई है, लेकिन यह मानने को तैयार नहीं है कि उन्होंने रकबर को गिरफ्तार करने के बाद पिटाई की।

रकबर की हत्या होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। अब दोषी पक्ष सारा ठीकरा पुलिस के ऊपर फोड़कर अपने आपको निर्दोष गौरक्षक बताने पर तुला है। वहां के भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा भी दोषियों के पक्ष में खड़े हैं। जब घटना घटी तो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक षड़यंत्र या उसका राजनीतिक उद्देश्य शायद ना रहा हो लेकिन अब भाजपा की और भाजपा के इस विधायक की राजनैतिक महत्वकांक्षा जरूर साफ नज़र आ रही है। नवल किशोर को बचाने के लिए सारे इल्ज़ाम अब पुलिस के ऊपर लगाए जा रहे हैं।

भाजपा रकबर के घरवालों को इंसाफ दिलवाती नहीं बल्कि अपनी हिंदुत्व वाली राजनीति की तिकड़में भिड़ाती साफ दिखाई दे रही है। पूरा देश बेशक रकबर के लिए इंसाफ की मांग कर रहा हो लेकिन रामगढ़ में आरोपियों को निर्दोष साबित करने की कहानियां लगातार गढ़ी जा रही हैं।

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