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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ किसानों को नहीं बीमा कंपनियों को पहुँच रहा है, प्रीमियम राशि में 350 वृद्धि लेकिन नहीं हुआ ठीक से भुगतान

बीमा कंपनियों को चुकाई गई प्रीमियम राशि में 350 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि फ़सल बीमा में कवर किए गए किसानों की संख्या में केवल 0.42 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई है.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शासन काल में पुरानी फ़सल बीमा योजनओं में बदलाव कर जनवरी 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की थी. इस योजना की शुरुआत करने पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह योजना किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आएगी. इस योजना से किसानों के जीवन में बदलाव तो नहीं आया लेकिन बीमा कंपनियों को चुकाई गई प्रीमियम राशि में 350 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि फसल बीमा में कवर किए गए किसानों की संख्या में केवल 0.42 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई है. इसके मतबल यह हुआ कि कंपनियों के जमा प्रीमियम में वृद्धि होने के बावजूद किसानों को प्रीमियम दावों का सही तौर पर भुगतान नहीं किया गया.

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में दायर आरटीआई के तहत मिली जानकारी से पता चलता है कि बीमा कंपनियों को चुकाई प्रीमियम राशि में 350 प्रतिशत की वृद्धि में बीमा कवर किसानों की संख्या केवल 0.42 प्रतिशत बड़ी है. हालांकि फसल बीमा योजना लागू करते समय सरकार द्वारा दावा किया गया था कि किसानों को कम प्रीमियम भरना होगा और पहले के मुकाबले प्रीमियम दावों का भुगतान जल्दी किया जाएगा. लेकिन अब सरकार के दावों की पोल खुलती साफ़ नज़र आ रही है. यदि आंकड़ों पर नज़र डाली जाए तो योजना के तहत वर्ष 2016-17 और 2017-18 के बीच निजी और सरकारी बीमा कंपनियों ने प्रीमियम के रूप में 47,408 करोड़ रुपये इकट्ठा किए हैं. लेकिन किसानों को प्रीमियम दावों के रूप में केवल 31,613 करोड़ रुपयों का भुगतान किया गया है. यानी दो सालों में बीमा कंपनियों के पास प्रीमियम की 15,795 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अब तक मौजूद है.

यदि 2014-15 और 2015-16 के आंकड़ों की तुलना की जाए तो प्रधानमंत्री द्वारा बीमा योजना शुरू करने से पहले राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) और संशोधित (एमएनएआईएस) द्वारा10,560 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में इकट्ठा हुए थे और इस राशि में से किसानों को 28,564 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था जो कि जमा प्रीमियम राशि के मुकाबले दोगुना से भी अधिक था. यानी साफ तौर पर देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू होने के बाद बीमा कंपनियों को 36,848 करोड़ रुपये से ज़्यादा का प्रीमियम प्राप्त हुआ है, जो पहले के मुकाबले 348 प्रतिशत ज़्यादा है. यहां गौर करने की बात यह कि प्रीमियम दावों का भुगतान सिर्फ 67 प्रतिशत ही किया गया है.

साल 2016-17 में कुल पांच करोड़ 70 लाख किसान कवर किए गए थे लेकिन साल 2017-18 के बीच किसानों की संख्या में 14 प्रतिशत की गिरावट आई और इस वर्ष कुल चार करोड़ 80 लाख किसान ही कवर किए गए.  हालांकि इन सब के बीच कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने राज्यसभा में स्वीकार किया था कि बीमाकृत क्षेत्र और किसानों की संख्या में कमी आने का कारण कर्ज़ माफ़ी की घोषणा, बेहतर मानसून और फसल बीमा को आधार से जोड़ना है. गौरतलब है कि किसानों की संख्या में गिरावट आने के बावजूद भी बीमा कंपनियों ने अधिक प्रीमियम इकट्ठा किया है. 2016-17 के बीच कुल 22,000 करोड़ रुपये और 2017-18 के बीच 25,000करोड़ रुपये की प्रीमियम राशि इकट्ठा की गई है. इसका एक कारण औसतन प्रीमियम राशि का बढ़ना है. वर्ष 2017-18 के बीच प्रति किसान प्रीमियम राशि 31 प्रतिशत बढ़कर 5,135 रुपये हो गई है.

प्रीमियम की बढ़ोतरी पर पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन का कहना है कि, प्रीमियम बढ़ने का कारण पता लगाने के लिए राज्य स्तर पर विस्तृत विश्लेषण करने की आवश्कता है. उन्होंने यह भी कहा कि, सबसे पहले आंकड़ों को समझना होगा और फिर राज्य स्तर पर बढ़े प्रीमियम, वहां की फसल और उसकी स्थिति का विश्लेषण करना होगा. हुसैन ने आगे कहा कि बीमा कंपनियां प्रीमियम दरों की बढ़ोतरी को कई आधारों पर सही बता सकती है जिसमें कई शर्तें शामिल हैं, जैसे आवारा पशुओं के कारण फसल की बर्बादी और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के संशोधित दिशानिर्देश 2018 में प्रस्तावित जुर्माना शामिल किया जाना, इत्यादि. हरियाणा के किसान नेता विकल पचार ने कहा, “अगर रबी सीजन की फसल ख़राब होती है तो खरीफ की बुवाई होने से पहले दावों का भुगतान किया जाना चाहिए. वर्ना किसान बुवाई कैसे करेगा? नुकसान की वजह से किसान के पास पैसे नहीं होते हैं.”

ज्ञात हो कि इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कार्य प्रदर्शन पर एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें बताया गया कि योजना के वित्तीय प्रबंधन में बदलाव करने की ज़रूरत है ताकि कंपनियों को अनुचित मुनाफ़ा न हो सके. इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि योजना में बहुत सी बीमा कंपनियों के पास पर्याप्त अनुभव, बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक सेवा नहीं है. ज्ञात हो कि साल 2017-18 के बीच बीमा योजना में कुल 18 बीमा कंपनियों को शामिल किया गया था.

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