कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेस को फिर से जिंदा कर रहा है, तो मोदी संघ-परिवार का खात्मा कर रहे हैं: पुण्य प्रसून बाजपेयी

किसान संघ के सक्षम नेतृत्व को कैसे मोदी सत्ता के काल में खत्म किया गया ये मध्यप्रदेश में क्काजी के जरिए उभरा.

कांग्रेस की पहचान नेहरू-गांधी परिवार से जुड़ी है. बीजेपी की पहचान संघ परिवार से जुड़ी है. बिना नेहरू-गांधी परिवार के कांग्रेस हो ही नहीं सकती तो कांग्रेस की कमजोरी-ताकत दोनों ही नेहरू-गांधी परिवार में सिमटी है और बिना संघ परिवार के बीजेपी का अस्तित्व ही नहीं है तो वैचारिक तौर पर संघ की सोच हो या हिन्दुत्व की छतरी तले बीजेपी के राजनीतिक भविष्य को आक्सीजन देने का काम यह संघ परिवार पर ही टिका है.

कांग्रेस अभी तक नेहरू गांधी परिवार के करिष्माई नेतृत्व के आसरे सत्ता पर काबिज रही है, चाहे वह नेहरू का काल हो या इंदिरा गांधी का या फिर राजीव गांधी या परदे के पीछे सोनिया गांधी की सियासत का और इस दौर में जनसंघ से जनता पार्टी होते हुए बीजेपी में उभरी स्वयंसेवको की टोली की ये पहचान रही कि वह कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध के आसरे धीरे धीरे आगे बढ़ती रही और सत्ता के जरिए कांग्रेस विरोध के दायरे को बढ़ाती भी रही और कांग्रेस विरोध के आसरे अपनी सत्ता गढ़ती भी रही.

लेकिन, सौ बरस की उम्र पार कर चुकी कांग्रेस में ये पहला मौका है कि नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी के दो सदस्य कांग्रेस को संभालने के लिए एक साथ चलने को तैयार हैं और दूसरी तरफ 2025 में सौ बरस की होने जा रहे संघ परिवार से निकले स्वयंसेवकों का सत्ताकरण ही कुछ इस तरह हुआ कि वह संघ परिवार को ही कमजोर कर सत्ता की ताकत तले संघ परिवार को ले आए. तो ये वाकई दिलचस्प हो चला है कि एक तरफ करिष्माई नेतृत्व के आसरे सत्ता की चौखट पर पहुंचने वाली कांग्रेस में धीरे-धीरे राहुल गांधी ने चुनावी जीत के आसरे खुद को करिष्माई तौर पर स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं तो प्रियंका गांधी की राजनीतिक झलकियों ने ही उन्हें पहले से करिष्माई मान लिया है, तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने पूर्व स्वयंसेवकों की लीक छोड़ 2014 में खुद को करिष्माई तौर पर स्थापित तो किया, लेकिन इसी स्थापना को अपनी ताकत मान कर संघ परिवार की सोच तक को ख़ारिज़ कर दिया या कहे मोदी सत्ता के दौर में संघ परिवार के मुद्दे भी सरोकार खो कर मोदी के करिष्माई नेतृत्व में ही हिन्दुत्व से लेकर स्वदेशी और भारतीयकरण से लेकर स्वयंसेवक होने के पीछे के संघर्ष को ही खत्म कर बैठे तो नेहरू-गांधी परिवार और संघ परिवार की इसी बिसात पर 2019 का आम चुनाव होना है तो पांसे कैसे और किस तरह फेंके जायेगें ये वाकई रोचक है और सवाल कई हैं.

मसलन, क्या मोदी का करिष्माई नेतृत्व बीजेपी-संघ परिवार की सत्ता को बरकरार रख पायेगा? क्या राहुल गांधी के साथ खड़ी प्रियंका का करिष्मा मोदी सत्ता की जड़े हिला देगा? क्या मोदी-शाह में सिमट चुकी बीजेपी के पास कोई नेता ही नहीं है, जो कांग्रेस के करिष्माई नेतृत्व को चुनाव मैदान में पटकनी दे दें या फिर बीजेपी में हर नेता के सामने ये चुनौती है कि वह कैसे मोदी-शाह को पहले पटकनी दें फिर खड़ा हो सके. क्या राहुल प्रियंका की जोड़ी अब मोदी विरोध के गठबंधन के सामने ही चुनौती बन रहे हैं यानी एक वक्त के बाद क्षत्रपों के सामने संकट होगा कि वह बीजेपी विरोध के साथ कांग्रेस विरोध की दिशा में भी बढ जाये. जाहिर है ये सारे सवाल हैं. लेकिन, इन सवालों के आसरे ही चुनावी राजनीति के परखे तो तीन सच सामने उभरेंगे. पहला , प्रियंका के जरिए महिलायें और युवाओं का वोट सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि अखिलेश-मायावती से भी खिसकेगा. दूसरा , यूपी में चेहरा खोज रही कांग्रेस को प्रियंका का एक ऐसा चेहरा मिल चुका है, जो लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश-मायावती के उस सौदेबाजी में सेंघ लगाने के लिए काफी है कि राज्य कौन संभाले और केन्द्र कौन संभाले  (अगर लोकसभा चुनाव के बाद मायावती पीएम उम्मीदवार के तौर पर उभरती हैं) क्योंकि कांग्रेस ने अभी प्रियंका गांधी को पूर्वी यूपी की कमान सौंपी है.

अगला कदम रायबरेली से चुनाव मैदान में उतारना होगा और फिर 2022 में यूपी विधानसभा के वक्त प्रिंयका गांधी को ही सीएम उम्मीदवार पद के लिये उतरना. तीसरा, क्षत्रपों को अब समझ में आने लगा है कि गठबंधन का मतलब तभी है जब उसमें कांग्रेस शामिल हो. यानी सिर्फ क्षत्रपों का मिलना गठबंधन तो है, लेकिन वह सिर्फ सत्ता के लिये सौदेबाजी का दायरा बढ़ना है और इन तीन हालातों के दौर को और किसी ने नहीं, बल्कि मोदी के करिष्माई नेतृत्व ने ही पैदा किया है और मोदी के करिष्माई नेतृत्व के पीछे संघ परिवार को ही कमजोर करना रहा. क्योंकि संघ परिवार का हर वह संगठन जो कांग्रेस की सत्ता को चुनौती देने के लिए संघर्ष करते हुए बीजेपी का रास्ता अभी तक बनाता रहा उसे ही मोदी के करिष्माई नेतृत्व ने खत्म कर दिया. विहिप के पास प्रवीण तोगड़िया नहीं हैं तो विहिप को प्रवीण तोगड़िया के हर कदम से लड़ना पड़ रहा है.

किसान संघ के सक्षम नेतृत्व को कैसे मोदी सत्ता के काल में खत्म किया गया ये मध्यप्रदेश में क्काजी के जरिए उभरा. फिर भारतीय मजदूर संघ हो या स्वदेशी जागरण मंच या फिर आदिवासी कल्याण संघ, हर संघठन को कमजोर किया गया. या कहें संघ के हर संगठन का काम ही जब करिष्माई नेतृत्व मोदी के लिये ताली बजाना हो गया, तो फिर वह नीतियां भी बेमानी हो गईं जो किसान को खुदकुशी की तरफ़ धकेल रही थी. युवाओं को बेरोजगारी की तरफ़. उत्पादन ठप पड़ा है तो उघोगपतियों के पास काम नहीं है. व्यापारियों के सामने जीएसटी से लेकर विदेशी निवेश और ई-मार्केटिंग का खतरा है. मजदूर को नोटबंदी ने तबाह कर दिया. यानी संकट काल स्वयंसेवक की सत्ता के वक्त संघ की सोच के विपरीत है.

तो आख़िरी सवाल यही हो चला है कि कांग्रेस की राजनीति ने संघ या पुरानी बीजेपी की कार्यशैली को अपना लिया है और मोदी के करिष्माई नेतृत्व ने कांग्रेस के करिष्माई सोच को अपना लिया है.

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