कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

क्या चुनाव के जरिए देश ने लोकतंत्र को जीया? या अब सत्तानुकूल अनुशासनात्मक ठप्पे को ही लोकतंत्र कहा जाएगा- पूण्य प्रसून बाजपेयी

जो सोच रहे हैं कि आने वाले वक्त में चुनाव की ज़रूरत ही नहीं होगी. उसका पहला एहसास तो 2019 में ही हो गया कि जितना लोकतंत्र [ ईवीएम़ ] वोटिंग बूथों के भीतर थे उससे ज्यादा लोकतंत्र बूथों के बाहर था.

अंधेरा घना है और अंधेरे की सियासत तले लोकतंत्र का उजियारा खोजने की कोशिश हो रही है. मौजूदा वक्त में  लोकतत्र का ये ऐसा रास्ता है जिसने आजादी के बाद से ही सत्ता हस्तातरण के उस मवाद को उभार दिया है जिसमें देश चाह कर भी बार बार 1947 की उसी परिस्थिति में जा खड़ा होता है जहां न्याय और समानता शब्द गायब रहे. ये कोई आश्चर्यजनक नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट आज लोकतंत्र को खतरे में होने एलान कर दें और देश में आह तक ना हो.

न्यायपालिका खुद के संकट को उभारे और समाज में कोई हरकत ना हो. चुनाव आयोग की स्वतंत्र पहचान खुले तौर पर गायब लगे और आयोग के भीतर से ही आवाज आये कि सत्तानुकुल ना होने पर बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है या सत्ता के विरोध के स्वर को जगह भी चुनाव आयोद में दर्ज नहीं की जाती और समाज के भीतर कोई हलचल नहीं होती. एक तरफ ईवीएम के जरीय तकनीकी लोकतंत्र को जीने का सबब हो तो दूसरी तरफ यही ईवीएम सत्ता के लिये खिलौना सरीखा हो चला हो. पर देश तो लोकतंत्र तले जीने का आदी है तो कोई उफ नहीं निकलता.

आश्चर्य तो इस बात भी नहीं हो पा रहा है कि रिजर्व बैंक जनता के पैसों की लूट के लिये समूची बैकिंग प्रणाली को भी सत्ता के कदमों में झुकाने को तैयार है और जनता के भीतर से कोई विरोध हो नहीं पाता. खुले तौर पर जनता के पैसों में जमा रुपयों का कर्ज लूट होती है. रईस कानून व्यवस्था को धता बता कर फरार हो जाते हैं लेकिन संसद कानून का राज कहकर लोकतंत्र क चादर ओढ़ लेती है. और तो और किसी तरह की कोई बहस अपने ही बच्चोंं की शिक्षा के गिरते स्तर या शिक्षा की तरफ की जा रही अनदेखी को लेकर भी मां-बाप में नहीं जाग रहे हैं.

प्रीमियर जांच एंजेसी सीबीआई के भीतर डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर यानी वर्मा-आस्थाना के खुले तौर पर भ्रष्ट होने के आरोपो पर भी समाज में कोई हरकत नहीं हुई और खुले तौर पर पीएमओ की दखलअंदाजी को लेकर भी बहुसंख्यक तबका सिर्फ तमाशबीन ही बना रहा है. कैसे और किस तरह से पीने लायक पानी, स्वच्छ पर्यावरण, हेल्थ सर्विस सबकुछ बिगाड कर सत्ताधारियों ने लोकतंत्र का पाठ चुनाव के एक वोट पर जा टिकाया और बेबस देश सिर्फ देखता रहा. और कैसे बेबसी से मुक्ति के लिये हर पांच बरस बाद होने वाले चुनाव  को ही उपचार मान लिया गया.

यानी सत्ता परिवर्तन के जरीये लोकतंत्र के मिजाज को जीना और सत्ता के लिये देश में लूटतंत्र को कानूनी जामा पहना देना , दोनो हालातो को को देश के हर वोटर ने जिया है और हर नागरिक ने भोगा है. इससे इंकार कौन करेगा. 1947 के बाद संसद हर पांच बरस में सजती संवरती रही. जनता की भागीदारी संसद को ही लोकतंत्र का मंदिर मान कर समती गई.

और 2014 में जब पहली बार किसी नये नवेले प्रधानमंत्री ने संसद की जमीन को माथे से लगाया तो लोकतंत्र का पावन रूप हर उस आंख में बस गया जिन आंखो ने 1952 से लेकर 2014 तक संसद के भीतर बाढ-सूखा की तबाही ,मंहगाई तले पिसते मध्यम वर्ग , अनाज की किमत तक ना मिलपाने से कर्ज में डूबे किसान की खुदकुशी , न्यूनतम मजदूरी के ना मिलने पर तिल तिल मरते परिवार , गांव गांव में पीने के पानी के लिये भटकते लोग , दो जून की रोटी के लिये गांव से पलायन करते किसानी छोड मजदूर बन शहरों की सड़कों पर भटकते परिवार के परिवार. तमाम मुद्दों पर संसद की अंसेवनशीलता भी हर किसी ने हर दौर में देखी.

आलम ये भी रहा कि 15 फिसदी सांसदों की मौजदगी भी इन मुद्दों पर बहस के वक्त नहीं रहती और बिना कोरम पूरा हुये संसद में जिन्दगी से जुडे़ मुद्दों को सिर्फ सवाल जवाब में खत्म कर दिया जाता. जिन मुद्दों पर सत्ता को विपक्ष घेरता और उन्ही मुद्दों पर न्याय दिलाने की आस बनाकर विपक्ष सत्ता पाता और सत्ता पाने के बाद उन्ही मुद्द को भूल जाता.  ये सब कैसे कोई भूल सकता है. शायद इसीलिये अंधेरा धीरे धीरे गहराता रहा और समूचे समाज ने आंखे मूंद रखी थी. क्योंकि लोकतंत्र के आदि हो चले भारत में आवाज उठाने कर असर डालने का हक़ उसी राजनीति , उस सियासत के मत्थे थोप दिया गया जिसने अंधेरे को फैलाया और धीरे धीरे गहराया.

1947 में बहस थी हाशिये पर जी रही जातिया या समुदायो को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आरक्षण के जरीये रियायत दी जाये. आर्थिक तौर पर विपन्न तबकों को सत्ता रुपये बांट कर राहत दें. मुफ्त या सस्ते आनाज को बांटे. पर धीरे धीरे आरक्षण राजनीतिक हथियार बन गया और हाशिये पर रहने वाली जातियो को मुख्यधारा से जोडने के बदले उन्हे ही मुख्यधारा बनाने की कोशिश शुरू हो गई.

दलित-आदिवासी-मुस्लिमों की बस्तियो मे स्कूल, हेल्थ सेंटर या जीने की जरुरतों की व्यवस्था नहीं की गई बल्कि हाशिये पर के लोगों को सियासी दान-दक्षिणा या सब्सडी या राजनीतिक रुपयों की राहत तले ही लाया गया. हर राज्य ने दो से पांच रुपये में सस्ता खाना मुहैया कराने के लिय दुकाने खोल दी. और लूट उसमें भी होने लगी. रईसो को मुफ्त आनाज बांटने का ठका भी चाहिये और मीड डे मिल का टेंडर भी चाहिये. क्योकि देश बडा है करोड़ों लोग है तो लूट का एक कौर भी करोड़ों के वारे न्यारे कर देता है.

 ऐसे में कोई क्या कहे क्या सोचे कि 70 बरस की उम्र युवा लोकतंत्र के नारे तले छोटी लग सकती है लेकिन 70 बरस का मतलब पांच पीढियो का खपना है और 31 करोड की जनसंक्या से 130 करोड तक पहुंचना भी है. और साथ ही 1947 के वक्त के भारत के बराबर तीन भारत को गरीबी मुफलिसी , हाशिये पर ढकेल कर संसदीय लोकतंत्र के रहमो करम पर टिकाना भी है. और जो पीड़ा इस अंधेरे में समाये भारत के भीतर है उससे अनभिज्ञ या फिर उस तरह आंख मूंद कर कौन से भारत को विकसित बनाया ज सकता है ये सवाल मुबई की झोडपट्टियो में से निकले एंटीला इमरत को देख कर कुछ हद तक तो समझा जा सकता है.

लेकिन समूचा सच 2014 के बाद जिस तरह खुले तौर पर उभरा उसने पहली बार साफ साफ संकेत दे दिये कि अंधेरोंं की रजामंदी से उजियारे में रहने वालो को खत्म किया जा सकता है या फिर उनके लोकतंत्र को धराशायी कर हशिये पर लडे़ तबकों में इस उल्लास को भरा जा सकता है कि सत्ता ने उनके लोकतंत्र को जिन्दा कर दिया है. क्योंकि देश में अब सिर्फ अंधेरा हो गया और सड़क पर बिलबिलाते समाज को ये रोशनी दिखायी देगी कि उनके हिस्से का अंधेरा और हर जगह छाने लगा है. लोकतंत्र के इस मवाद को कोई सत्ता के लिये भी हथियार बना सकता है ये इससे पहले कभी किसी ने सोचा नहीं या फिर इससे पहले संसदीय लोकतंत्र की उम्र बची हुई थी इसलिये किसी ने ध्यान ही नहीं दिया.

हो जो भी लेकिन अंधेरे की सत्ता लोकतंत्र के उजियारे को कैसे अपनी मुठ्ठी में कौद कर सकती है और कैसे ढहढहाकर लोकतंत्र सत्ता के आगे नतमस्तक हो सकता है उसकी लाइव कमेन्ट्री देश देख भी रहा है और भोग भी रहा है. संसदीय लोकतंत्र में अब ये इतिहास के पल हो चुके है कि जनता के मुद्दे होने चाहिये. उम्मीदवारों की पहचान होनी चाहिये. मुद्दों के जरीये संसद की जरुरत होनी चाहिये और उम्मीदवारों क जरीये समाज के अलग अलग तबके से सरोकार होने चाहिये. यानी ये महसूस होना चाहिये कि संसद में जनता के प्रतिनिधित्व करने वाले पहुंचे हैं.

और भारत की विवधता को संसद समेटे  हुये हैं. पर अब तो ना मुद्दे मायने रखते है ना ही उम्मीदवार. और ना ही संसद की वह गरिमा बची है जिसके आसरे जनता में भावनात्मक लगाव जागे कि संसद चल रही है तो उनकी जिन्दगी से जुडे मुद्दो पर बात होगी. रास्ता निकलेगा. अब ना तो हमारे पास संसद की गरिमा है. ना ही हमारे पास संविधान की व्याख्या करने वाली सुप्रीम कोर्ट है. ना ही कोई संविधानिक सस्थान है जो सत्ताधारियो पर लगते आरोपो की जाच तो दूर सत्ता की मर्जी के बिना अपने ही काम को कर सके.

ना ही हर पांच बरस बाद लोकंतत्र को जीने की स्वतंत्रता का एहसास कराने वाला चुनाव आयोग है. ना ही मानवाधिकार आयोग है जो जनता के हक की रक्षा का भरोसा जगाए. ना ही किसान-गरीब-मजदूरो के हक के सवालो को लिये संघर्ष करने वाले समाजसेवी संगठन है. ना ही ऐसे शिक्षा संस्थान है जो दुनिया की दौड़ में भारतीय बच्चो पर खडा कर सके , शिक्षित कर सके. और ना ही हमारे पास राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का वो एहसास है जो राजनीति को सहकार-सरोकार और बहुसंख्यक जनता से जोडने की दिशा में ले जाये.

अब हमारे पास मजदूरों की ऐसी फौज है जिसके लिये कोई काम है ही नहीं. किसानों की बदहाली है जिनके लिये सिवाय खुदकुशी के कुछ देने की स्थिति में सत्ता नहीं है. अब हमारे पास अरबपतियो की ऐसी कतार है जो देश में लूट मचाकर दुनिया के बाजार में अपन धमक बनाये हुये है. अब हमारे पास बेरोजगारों की ऐसी फौज  है जो राजनीति पार्टियो में नौकरी कर रही है या कैरियर बनाने के लिेये नेताओ की चाकरी में जुटी है.

अब हमारे पास अपराधी और भ्रष्ट्र सांसदों विधायकों की ऐसी फौज है जो जनता के प्रतिनिधी बनकर संविधान को खत्म कर संविधान से मिले विशेषाधिकार का भी लुत्फ उठा रही है और अपराध भी खुले तौर पर कर रह है. अब हमारे पास कानून-व्यवस्था नहीं है बल्कि सडक पर लिचिंग कर न्याय देने का जंगल कानून है. अब हमारे पास ऐसी फौज है जो बिना वर्दी फौज से ज्यादा ताकत रखती है. फिर हमारे पास अब नये चेहरे के साथ नाथूराम गोडसे भी है. और इस आधुनिक पूंजी पर अंगुली उटाने वाले या सवाल करने वाले या तो लुटियन्स के बौध्दिक करार दिया जा चुके है या फिर शहरी नक्सलवादी या फिर खान मार्केट के ग्रूप या फिर देश द्रोही या पाकिस्तान की हिमायती.

तो संविधान के नाम पर ही जब सत्ता लोकतंत्र को हडप कर अंधेरे को ही देश का सच बताने निकल पडी हो तो फिर सवाल ये नही है कि चुनाव के जरीये देश के नागरिको ने लोकतंत्र को  जीया या नहीं बल्कि सवाल तो ये है कि एक वोट का लोकतंत्र भी गायब हो गया . क्योंकि नागरिक भी ईवीएम के सामने बौना हो गया और ईवीएम में समाये लोकतंत्र में सत्ता को ना तो बीजपी की जरुरत है और ना ही संघ परिवार की.

तो लोकतंत्र को जीते देश में जनता के प्रतिनिधी हो या नौकरशाही या फिर न्यायपालिका हो या मीडिया. जो जितनी जल्दी मान लें कि उसकी भागेदारी बटी ही नहीं उसके लिये उतनी ही जल्दी ठीक हालात होंगे. क्योंकि लोकतंत्र की नई परिभाषा में सत्ता के लिये काम करते लोकतंत्र के स्तम्भ ही असल स्तम्भ है.

इसीलिये जो सोच रहे है कि आने वाले वक्त में चुनाव की जरूरत ही नहीं होगी. उसका पहला एहसास तो 2019 में ही हो गया कि जितना लोकतंत्र [ ईवीएम़ ] वोटिंग बूथों के भीतर थे उससे ज्यादा लोकतंत्र बूथो के बाहर था. आप बूथो के बाहर कतारों में खडे़ थे और बाहर बिना कतार ज्यादा अनुशासत्मक तरके से लोकतंत्र का ठप्पा लग रहा था. तो एक वक्त इंदिरा ने लोकतंत्र खत्म कर  एमरजेन्सी को अनुशासनात्मक कारर्वाई कहा था और अब सत्तानुकुल अनुशासानात्मक ठप्पे को ही लोकतंत्र कहा ज रहा है. देश बहुत आगे निकल चुका है . आप कहीं पिछड तो नहीं गये .

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बायपेयी के फ़ेसबुक पोस्ट से हू-ब-हू लिया गया है.)

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