कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

क्या भारतीय वायु सेना राफ़ेल का नाम वर्त्तमान एयर मार्शल के नाम पर रख रही है?

दो रक्षा संवाददाताओं के एक जैसे ट्वीट्स इस मामले की जानकारी देते हैं.

राफ़ेल सौदे को लेकर चल रहे घमासान के बीच एक और ख़बर अब सामने आ रही है. राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा मामलों की रिपोर्टिंग करने वाले कुछ पत्रकारों ने बुधवार सुबह कई ट्वीट किए जिसमें यह दावा किया गया है कि भारतीय वायु सेना (आईएएफ) ने भारत के लिए निर्मित पहले टू-सीटर राफेल लड़ाकू विमान का नाम आरबी008 रखा है जिसमें आरबी एयर मार्शल राकेश भदुरिया के नाम से आया है, जिन्होंने फ्रांस के साथ हुए इस विवादास्पद सौदे की वार्ता में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी.

अपने ट्वीट्स में दोनों रक्षा संवाददाताओं द्वारा इस जानकारी के एक दूसरे से मिलते हुए स्रोत का उल्लेख किया गया है. इन ट्वीट्स के बाद सेवानिवृत वाईस एयर मार्शल मनमोहन बहादुर ने इस मामले में जानकारी दी. ज्ञात हो कि पूर्व वाईस एयर मार्शल मनमोहन बहादुर वर्त्तमान में सेंटर फॉर एयर पॉवर स्टडीज़ के अतिरिक्त निदेशक हैं और आईएएफ के विशेषज्ञ दल का हिस्सा हैं.
बहादुर ने स्पष्ट किया कि “आईएएफ़ अपने विमानों का एक आधिकारिक प्रक्रिया के तहत नंबर देता है. अल्फा संख्या ‘टेल नंबर’ का अल्फा हिस्सा जहाज़ों के समूह का प्रतिनिधित्व करता है.
यहां ‘आर’ राफेल के लिए इस्तेमाल किया गया है और ‘बी’ टू-सीट ट्रेनर संस्करण के लिए इस्तेमाल हुआ है.”

ग़ौरतलब है कि दोनों रक्षा संवाददाताओं ने इस ख़बर के लिखे जाने तक अपनी ट्वीट में कोई संशोधन नहीं किया है. लेकिन, इससे साफ़ तौर पर झलकता है कि किस तरह से मीडिया संस्थानों द्वारा राफ़ेल के बारे में कवरेज की जा रही है.
राफ़ेल सौदा शुरू से ही एक विवादास्पद सौदा रहा है, जिसके बारे में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद ने कहा था और बार-बार दोहराया था कि दसॉल्ट ने अनिल अम्बानी के रिलायंस डिफेन्स को भागीदार के रूप में चुना, क्योंकि मोदी सरकार ने 36 फ़्रांसीसी लड़ाकू विमान ख़रीदने के नए फार्मूले में यह एक शर्त रखी थी.
ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी मोदी सरकार से 36 राफ़ेल लड़ाकू विमानों को ख़रीदने के पीछे के तर्क पर सवाल किया है, जिसका जवाब सरकार को इस मामले में याचिकाकर्ताओं को देना पड़ेगा. शीर्ष अदालत ने सरकार से इसकी कीमत भी पूछी है और यह भी प्रश्न उठाया है कि यह किस तरह से बेहतर था. यह जानकारी सरकार न्यायालय को एक सील बंद लिफाफे में देगी. इस मामले में मुख्य न्यायाधीश द्वारा अगले हफ्ते सुनवाई की जाएगी.
इन सब के अलावे एक और मामला विवादों से घिर रहा है. दसॉल्ट द्वारा अनिल अम्बानी की घाटे में चल रही एक और कंपनी रिलायंस एयरपोर्ट्स में 294 करोड़ रुपयों के निवेश का मामला सामने आया है. अजीब बात यह है कि रिलायंस एयरपोर्ट्स के पास वर्त्तमान में कोई प्रोजेक्ट्स नहीं हैं और इसका कोई व्यवहारिक भविष्य भी नहीं है. दसॉल्ट ने इससे पहले इस तरह का कोई निवेश नहीं किया है, न ही भारत में और न ही विश्व में कहीं और. इस वजह से इस पैसे और उसके राफ़ेल सौदे के साथ सम्बन्धों पर सवाल उठ रहे हैं.
ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अप्रैल 2015 में इन 36 राफ़ेल विमानों के सौदे की घोषणा पेरिस में की थी.
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