कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

गोदी मीडिया के बहकावे में न आएं, ओलांद हैं अपने बयान पर क़ायम, मोदी ने नहीं दिया था अम्बानी के अलावा कोई और नाम

मोदी को राफेल घोटाले में क्लीन चिट देने लगे हैं कई मीडिया संस्थान

राफेल सौदे पर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद शनिवार को मोदी सरकार ने भरमाने वाली प्रतिक्रिया दी। सरकार ने फ़्रांस्वा ओलांद के आरोपों को ख़ारिज कर दिया। इसके बाद फ़्रांस्वा ओलांद ने एक बार फिर अपनी प्रतिक्रिया दी। ओलांद के इस बयान को आधे अधूरे तौर पर पेश करके भारतीय मीडिया ने मोदी सरकार को क्लीन चिट दे दी। लेकिन इस मामले की सच्चाई कुछ और है।

राफेल विमान सौदे पर शुक्रवार को फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का बयान सामने आने के बाद गोदी मीडिया ने मोदी सरकार की तरफ़ से बयानबाजी शुरू कर दी है। फ्रांस के समाचार वेबसाइट एएफपी में छपे फ्रांस्वा ओलांद के बयान से आधे अधूरे तथ्य उठाकर कई भारतीय मीडिया संसथान नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देने में लगी है। गोदी मीडिया का कहना है कि ओलांद ने मोदी को पाक साफ़ घोषित कर दिया है। जबकि इस मामले की सच्चाई कुछ और है।

लेकिन असल बात यह है कि फ्रांस्वा ओलांद अभी भी अपने पुराने बयान पर कायम हैं। हम यहाँ आपको तथ्यों के साथ इस मामले की पूरी सच्चाई बता रहे हैं।

यूपीए की पिछली सरकार ने फ्रांस से 126 राफ़ेल विमान खरीदने का सौदा किया था। साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले सौदे को अमान्य कर दिया और इसके बदले फ्रांसीसी कम्पनी दसॉल्ट से 36 लड़ाकू विमान खरीदने का मसौदा तैयार किया। इस नए डील में कहा गया कि दसॉल्ट को अनिवार्य तौर पर भारत के किसी घरेलू कम्पनी में डील की आधी रकम इन्वेस्ट करना होगा। फ्रांस की कम्पनी ने ऐलान किया इसके लिए उसकी सहयोगी अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस होगी। विपक्ष का आरोप है कि नरेन्द्र मोदी ने अपने उद्योगपति मित्र को फ़ायदा पहुंचाने के लिए यह डील किया था। जबकि सरकार कहती रही है कि अपना पार्टनर चुनने के लिए दसॉल्ट आज़ाद थी।

नया फॉर्मूला

शुक्रवार को फ्रांस के समाचार वेबसाइट को ओलांद ने बताया कि भारत सरकार ने अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को दसॉल्ट के पार्टनर के तौर पर पेश किया था और वो उसमें कुछ भी नहीं कर सकते थे। ज्ञात हो कि जब मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदा किया था तब फ्रांस्वा ओलांद ही फ्रांस के राष्ट्रपति थे।

शनिवार को फ्रांसीसी समाचार प्रदाता एएफपी से बातचीत में ओलांद ने जो कुछ कहा उसका भारतीय मीडिया ने अपने तरीके से मोदी के पक्ष में भुना लिया। ओलांद के बयान को एएफपी ने जिस तरह से छापा, वो इस प्रकार से है –

मोंट्रियल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ओलांद ने कहा है कि नरेन्द्र मोदी के शासन में आने के बाद भारत ने एक नया फ़ॉर्मूला तैयार किया जिसके कारण अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को दसॉल्ट का पार्टनर बनाया गया।

इसके बाद जब ओलांद से पूछा गया कि क्या उन्हें जानकारी है कि भारत सरकार ने रिलायंस के साथ व्यापार करने के लिए दसॉल्ट पर दबाव बनाया था? इस पर ओलांद ने कहा कि वे इस बात से अंजान हैं और इस बारे में विशेष जानकारी दसॉल्ट ही दे सकता है।

कुल मिलाकर देखें तो ओलांद अपने पिछले बयान पर अब भी कायम हैं। उन्होंने पहले भी कहा था कि मोदी सरकार ने रिलायंस का नाम भेजा था, इसलिए उन्हें रिलायंस के साथ यह सौदा करना पड़ा। वे कह चुके हैं कि मोदी सरकार के नए फॉर्मूले के कारण ही अंबानी की कम्पनी इसमें शामिल हुई। ओलांद का यह बयान मोदी सरकार के उस पक्ष को ख़ारिज करती है, जिसमें कहा जाता रहा है कि भारत सरकार का रिलायंस से सौदे में कुछ लेना देना नहीं है।

ओलांद भले ही यह खुल कर नहीं कह रहे हों कि नरेंद्र मोदी ने उनपर दबाव बनाया था, लेकिन राफ़ेल डील में मोदी सरकार के नए फ़ॉर्मूले की वज़ह से ही रिलायंस इसमें शामिल हुई थी।

मोदी सरकार भले ही यह कहती रही हो कि दसॉल्ट ने रिलायंस को खुद ही अपने पार्टनर के तौर पर चुना था। लेकिन सरकार ने कभी नहीं कहा है कि उसने अनिल अंबानी की कम्पनी का नाम दसॉल्ट के पास नहीं भेजा था।

दरअसल, ओलांद के बयान को आधा अधूरा पेश करने की एक वजह है। एएफपी ने अपने वेबसाइट पर ओलांद के बयान के दूसरे पार्ट का अनुवाद ही डाला था। इस हिस्से में ओलांद ने कहा था कि उन्हें रिलायंस के लिए दसॉल्ट पर दबाव की जानकारी नहीं है। जबकि जिस हिस्से में उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार के नए फ़ॉर्मूले की वजह से अंबानी की कम्पनी इस डील का पार्टनर बनी, उस पार्ट का अनुवाद ही नहीं किया गया था।

इसके बाद भारतीय मीडिया ने हो हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि ओलांद ने मोदी को क्लीन चिट दे दी है।

रिपब्लिक टीवी ने लिखा कि ओलांद ने साफ़ इनकार कर दिया है कि भारत ने रिलायंस के लिए दसॉल्ट पर दबाव बनाया था।

न्यूज़18 ने लिखा कि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ने राफ़ेल सौदे में किसी भी प्रकार की जानकारी होने से इनकार किया है।

इस मामले में फ्रांस्वा ओलांद के खुलकर सामने नहीं आने की भी अपनी वजहें हैं। वे इस विवाद में पड़कर दसॉल्ट की इस बड़ी डील को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते।

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