कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अमेरिका में श्री राम ने मोदी जी पर धावा बोला, राफ़ेल घोटाले पर किया बड़ा खुलासा

बोफ़ोर्स घोटाले को उजागर करने में वरिष्ठ पत्रकार एन. राम की अहम भूमिका थी.

राफ़ेल विमान घोटाला मोदी सरकार का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है. देश में तो इसकी चर्चा है ही, अब विदेशी अख़बारों में भी राफ़ेल घोटाले की चर्चा हो रही है. अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में राफ़ेल घोटाले के सारे तथ्य रखे गए हैं.

द हिन्दू के वरिष्ठ पत्रकार एन. राम ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक रिपोर्ट लिखा है, जिसमें कहा गया है कि 36 राफ़ेल विमानों की ख़रीद में हुई अनियमितता मोदी सरकार का पीछा नहीं छोड़ रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में फ्रांस की अपनी यात्रा में प्रधानमंत्री ने दसॉल्ट एविएशन से हुए पुराने सौदे में भारी फ़ेरबदल की.

रिपोर्ट में एन. राम ने लिखा है कि राफ़ेल विमान सौदे की बात 2007 से ही चल रही थी. 2007 में कांग्रेस सरकार ने 6 विमान निर्माता कंपनियों के पास इस रक्षा सौदे के लिए बोली लगाने का न्यौता भेजा. इन 6 कंपनियों में दसॉल्ट और यूरोफाइटर टाइफून को भारतीय वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से पाया गया. 2012 में पाया गया कि दसॉल्ट एविएशन ने सबसे कम रकम की बोली लगाई है. भारत सरकार ने तब 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीद की प्रक्रिया शुरू कर दी. इस सौदे में 18 विमान चालू स्थिति में खरीदे जाने थे, जबकि बाकी के 108 विमानों को भारत में बनाया जाना था. इस सौदे में दसॉल्ट एविएशन का पार्टनर भारत की सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को पार्टनर बनाया था. लेकिन, किन्हीं कारणों से यह सौदा अगले तीन साल तक अटका पड़ा रहा.

इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस की यात्रा की और इस डील को रातों-रात बदल दिया. पहले से तय 126 विमानों की जगह सरकार ने 36 विमान खरीदने की डील की और इस सौदे का पार्टनर सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की जगह अनिल अंबानी की रिलायंस डिफ़ेस को बना दिया. इस सौदे में अनिल अंबानी को 1.9 बिलियन यूरो का मुनाफ़ा होना था. बता दें कि अनिल अंबानी को हवाई जहाज बनाने का कोई अनुभव नहीं रहा है.

पिछली सरकार द्वारा किए गए सौदे के मुताबिक दसॉल्ट एविएशन को इस सौदे की राशि का 30 फ़ीसदी हिस्सा भारत के घरेलू रक्षा उपकरणों को बढ़ावा देने पर ख़र्च करना था. दसॉल्ट ने सौदे की राशि का 50 फ़ीसदी हिस्सा भारत में निवेश करने के लिए मंजूरी दी. नए सौदे के मुताबिक एक भी जहाज भारत में नहीं बनाए जाने हैं. नए सौदे की कुल कीमत 7.8 बिलियन यूरो रखी गई. रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञों के मुताबिक यह रकम 5.2 बिलियन यूरो से ज्यादा की नहीं होनी चाहिए थी.

सरकार ने विमान की दामों के समझौते के लिए रक्षा विभाग के सात वरिष्ठ अधिकारियों की एक कमेटी बनाई थी. इनमें से तीन अधिकारियों ने इस सौदे की क़ीमत से असहमति जताई थी. लेकिन, फिर भी उनकी असहमति को नज़रअंदाज़ करते हुए दामों को बढ़ाया गया. इसकी अंतिम मंजूरी प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली रक्षा विभाग की कैबिनेट समिति ने की. एन. राम ने अपने अध्ययन में पाया है कि प्रधानमंत्री मोदी के इस फ़ैसले के कारण हर एक विमान की क़ीमत का दाम 2007 के मसौदे से 41 प्रतिशत ज्यादा और 2011 के मसौदे से 14 प्रतिशत ज्यादा बढ़ गया.

इधर, गौर करने वाली बात है कि जुलाई 2014 में यूरोफाइटर टाइफून ने कहा था कि वह इस सौदे को दसॉल्ट एविएशन से 20 प्रतिशत कम दाम में पूरा कर सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उसकी बात नहीं मानी. अगर प्रधानमंत्री मोदी ने इस सौदे को अपना लिया होता तो भारत के 2.6 बिलियन यूरो बच जाते. हमारे देश के लिए यह बहुत बड़ी रकम है. इससे देश में कई हजार स्कूल और अस्पताल बनाए जा सकते थे. रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी सरकार द्वारा किए गए राफ़ेल सौदे से देश के कई संस्थानों पर भी नकारात्मक असर पड़ा है. कुछ इसी तरह का असर बोफ़ोर्स घोटाले के समय भी देश के संस्थानों पर पड़ा था.

लगभग 3 महीने बाद देश में आम चुनाव होने हैं. ऐसे में राफ़ेल घोटाले पर सरकार की चुप्पी उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इसे लेकर लगातार प्रधानमंत्री मोदी को घेर रहे हैं और जनता के बीच भी अब मोदी सरकार की विश्वसनीयता ख़त्म होती नज़र आ रही है. हाल ही में हुए पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन राज्यों की सत्ता गंवानी पड़ी थी. इन चुनावों में भी राहुल गांधी ने राफ़ेल को प्रमुखता के तौर पर जनता के सामने रखा था.

न्यूज़सेंट्रल24x7 को योगदान दें और सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह बनाने में हमारी मदद करें
You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+