कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: जयपुर के समृद्ध रत्न उद्योग को कैसे किया गया नष्ट? अनगिनत कारीगरों से छिन गया आजीविका का साधन

‘काम नहीं है, कहां से करें? मोदी जी ने हालात ही इतने बुरे कर रखे हैं.'

कभी क़ीमती रत्नों की कटाई और पॉलिशिंग के मास्टर कहे जाने वाले फुरकान अली अब एक ट्रैवल एजेंसी में ड्राइवर के रूप में काम करते हैं. NewsCentral24x7  से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘काम नहीं है, कहां से करें? मोदी जी ने हालात ही इतने बुरे कर रखे हैं. उन्होंने बताया कि रत्नों के कारीगर अब  कोई टैक्सी चलाने लगे हैं…कोई कैटरिंग का काम करने लगे और बहुत तो खाली (बेरोज़गार) घर पर बैठे हैं..

कभी रत्नों का वैश्विक केंद्र कहा जाना वाला जयपुर पिछले कुछ सालों से अपने इस ख़िताब को बचाए रखने के लिए जद्दोज़हद कर रहा है. पिछले कुछ सालों में इससे जुड़े कई असंगठित श्रमिक बाजारों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा है. लेकिन, इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव कारीगरों पर पड़ा है.

रत्नों की मांग में तेज़ी से कमी आने के कारण इस क्षेत्र से जुड़े कई कुशल कारीगरों को यह काम छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है. अब ये कारीगर बहुत ही कम वेतन में अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं.

जयपुर के जौहरी बाजार के एक रत्न दुकान के मालिक अक्षक अग्रवाल ने बताया, “कभी रत्न कटिंग का काम करने वाले कई लोग अब जयपुर में इलेक्ट्रिक रिक्शा या ऑटो चलाने का काम करते हैं.”

अक्षक कहते हैं, “रत्नों की मांग में गिरावट के पीछे का कारण बढ़ती बेरोज़गारी कई कारणों में से एक है.” उन्होंने बताया, “मेरा परिवार 1983 से रत्नों के व्यवसाय से जुड़ा हुआ है. लेकिन, अब इस व्यवसाय में 60 फीसदी की गिरावट आ गई है.”

उन्होंने कहा, “इस गिरावट के पीछे की वज़ह सिर्फ बेरोज़गारी ही नहीं है. रत्न उद्योग देश के कई सेक्टरों में से एक है जिसपर नोटबंदी के कारण भी खासा प्रभाव पड़ा है”

(पन्ना रत्न)

वहीं, जौहरी मार्केट में स्थित जेमको एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक अनिल काबरा ने न्यूज़सेन्ट्रल24×7  को बताया कि, 8 नवंबर 2016 को जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने 86 प्रतिशत उच्च मुद्रा नोटों को रातों-रात अमान्य कर दिया था. तब नकदी के कमी के कारण इस उद्योग को काफी नुकसान पहुंचा. जीएसटी का गलत कार्यान्वयन भी इस असंगठित उद्योग में मंदी का एक महत्वपूर्ण कारक बन गया.

टोपखाना में स्थित रत्न काटने वाले एक छोटे से दुकान के मालिक इमरान कहते हैं, “अभी काम-धंधे की हालत बेहद खराब है. नोटबंदी से संभले नहीं थे कि जीएसटी की मार पड़ गई.”

(टोपखाना में रत्नों की कटाई करने वाले)

ग़ौरतलब है कि कटे और पॉलिश किए गए कीमती पत्थरों के लिए 0.25 प्रतिशत की जीएसटी दर छोटी इकाइयों पर भारी पड़ गई. जो दशकों से कम मार्जिन पर चल रही थी, इस व्यवसाय की प्रकृति ऐसी है कि, भारत में रत्नों को आयात और सजाने का काम किया जाता है और तैयार किए गए उत्पादों का यहां से निर्यात किया जाता है. ऐसे में आयात पर जीएसटी का दर उद्योग से जुड़े लोगों के लिए प्राथमिक चिंताओं में से एक है.

ढांडिया जेम्स कॉर्पोरेशन के पार्टनर मनोज ढांडिया ने न्यूज़सेन्ट्रल24×7  को बताया कि, जब व्यापारी अंतर्राष्ट्रीय मेलों में प्रदर्शनी के लिए अपना माल भेजते हैं, तो उन सामानों पर जीएसटी लगाया जाता है. वो माल उनके पास फिर वापस आ जाता है. “इसलिए हमें अपने माल के लिए जीएसटी देना पड़ता है और जीएसटी की यह दर हमेशा हमें भारी पड़ती है.”

(मनोज ढांडिया)

जेम एंड ज्वैलरी एसोसिएशन एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के वाइस चेयरमैन कॉलिन शाह ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताय, ‘रिफंड मिलने में देरी की वजह से भी इंडस्ट्री वर्किंग कैपिटल में रुकावट से जूझ रही है. इन सभी कारणों ने इस वित्तीय वर्ष में कुल रत्नों और आभूषणों के निर्यात को भी काफ़ी प्रभावित किया है.”

मनोज ढांडिया ने कहा कि, पंजाब नेशनल बैंक घोटाला में जब नीरव मोदी और उनके चाचा मेहुल चोकसी लगभग 14,000 करोड़ रुपए की बैंक से धोखाधड़ी कर देश छोड़कर भाग गए, उन्होंने जवाहरात उद्योग की प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया और क्रेडिट लाइन को बुरी तरह से निचोड़ दिया.

उन्होंने कहा, “रत्न उद्योग को क्रेडिट लाइन के लिए इतने बड़े पैमाने पर निचोड़ना और इस उद्योग को एक जोखिम भरे क्षेत्र के रूप में चिन्हित करना..मुझे लगता है कि यह ग़लत है.” ढांडिया ने कहा, “यदि किसी कारण से व्यापार नीचे जा रहा है तो यह क्रेडिट लाइन पर प्रभाव डालता है.”

(जौहरी बाजार में स्थित दुकान)

मनोज ढांडिया ने कहा, “अगर मैं कम बेच रहा हूं, तो मैं कम खरीदूंगा, मैं कम निर्माण करवाऊंगा. अगर मैं कम निर्माण करवाता हूं, तो कारीगरों के लिए कम काम होगा.”

जयपुर का अमृतपुरी मोहल्ला नगीनों की कारीगरी के लिए मशहूर है. यहां मोइनुद्दीन अपने छोटे-से करखाने में गोमेद (रत्न) को पॉलिश करने का काम करते हैं. वो कहते हैं कि पहले भरपूर काम मिलता था. पहले 5-6 दुकानों से आर्डर आते थे. लेकिन अब 1 या 2 दुकानों से ही आर्डर मिलते हैं.

(मोइनुद्दीन)

मोइनुद्दीन के कारखाने में लगभग 5-6 आदमी काम करते हैं. पहले इस इलाके में ऐसी सैकड़ों छोटी इकाइयां हुआ करती थी. लेकिन अब उसकी आमदनी (जो वह पहले कमाता था) उससे आधी हो गई है.

कारीगर संस्थागत उदासीनता का भी शिकार हुए हैं. अन्य देशों में उभरते नए बाजारों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए  जयपुर के स्थानीय कारीगरों को अपने संचालन में सुधार के लिए तकनीकी हस्तक्षेप और पूंजी समर्थन की सख्त ज़रूरत है.

मनोज ढांडिया अफसोस जताते हुए कहते हैं, “हम अपने कारीगरों को अपने व्यापार में बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं. हमें सरकार से भी थोड़ा सा समर्थन चाहिए, ताकि हम उनके कौशल पर ज़्यादा काम कर सकें.”

उन्होंने बताया कि जब कौशल विकास परिषदें थीं तब अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता थी. “जब कारीगर को प्रशिक्षित किया जाता है, तो उस कौशल को सीखने के लिए काफी पैसों की ज़रूरत होती है जो प्रशिक्षण का एक हिस्सा है. और दूसरा तकनीकी और मशीनी ज्ञान की आवश्यकता. दुर्भाग्य है कि आप उन मशीनों पर काम करना सीख सकते हैं, लेकिन कारीगर उन्हें खरीदने में असमर्थ हैं. ”

राजस्थान कांग्रेस के महासचिव महेश चंद्र शर्मा ने न्यूज़सेंटरल24×7  से बात करते हुए कहा, “चूंकि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने से कारीगर समुदाय (व्यापारी नहीं)  प्रभावित हुए हैं. यह सारा कारोबार नकदी पर चलता है. जैसे-जैसे नकदी का प्रवाह रुका, बड़े व्यवसायियों ने कारीगरों को काम देना बंद कर दिया. इस उद्योग में काम करने वालों को अब आजीविका के अन्य साधन तलाशने होंगे. यह भाजपा की विफलता है.”

महेश चंद्र शर्मा ने कहा कि कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में  जीएसटी में परिवर्तन और गंभीर रूप से प्रभावित इकाइयों के लिए पुनर्वास योजना का वादा किया है.

वहीं दूसरी तरफ राजस्थान के भाजपा प्रवक्ता  जितेंद्र श्रीमाल ने जीएसटी की प्रशंसा करते हुए दावा किया कि जीएसटी, “ईमानदार व्यवसाय की ओर देश का नेतृत्व” करने के लिए जिम्मेदार था, जो कि रियल एस्टेट और ज्वैलरी को जोड़ता है, दो उद्योग जो पहले “2 नंबर का व्यापार” करने के लिए कुख्यात थे, अब “1 नंबर के व्यापार” की ओर बढ़ रहे हैं.

(जितेंद्र श्रीमाल)

चूंकि महाराजा सवाई जय सिंह (द्वितीय) द्वारा 18वीं शताब्दी की शुरुआत में जयपुर शहर की स्थापना की गई थी. जयपुर दुनिया भर में रत्न, काटे और  पॉलिश के लिए सबसे ज्यादा आकर्षक केंद्र रहा है. लगभग तीन शताब्दियों के बाद यह उद्योग जो शहर की विरासत का भी हिस्सा है आज कयामत की कगार पर पहुंच गया है.

शहर की इस मंदी का प्रभाव आगामी लोकसभा चुनावों कितना पड़ेगा इसका अनुमान लगाना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन यहां के निवासियों ने आगामी 6 मई को अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने की तैयारी कर ली है.

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में है उसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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