कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

वसुंधरा राजे ने लाखों लोगों को रोज़गार देने का दावा किया है, जानिए क्या है पूरी सच्चाई

बेरोज़गारी की वजह से चार युवकों द्वारा किये गए आत्महत्या ने वसुंधरा राजे के रोज़गार को लेकर झूठे दावों पर से पर्दा उठा दिया

राजस्थान के अलवर ज़िले में चार युवकों ने कोई रोज़गार नहीं मिलने की वजह से आत्महत्या कर ली. इन चार युवकों में मनोज मीणा (24), सत्यनारायण मीणा (22), ऋतुराज मीणा (17) और अभिषेक मीणा (22) थे. इस घटना ने विपक्ष को भाजपा के रोज़गार मुहैय्या करवाने के बड़े बड़े वादों के ख़िलाफ़ चल रहे उनके मुहीम के लिए एक बड़ा मुद्दा दे दिया है.

भाजपा ने इन आत्महत्याओं के ठीक 11 दिन पहले ही एक ट्वीट के ज़रिये यह दावा किया था कि पार्टी ने 2013 में अपने घोषणापत्र में 15 लाख नौकरियां देने के किये गए वादे को पूरा कर दिया है. इस बयान ने सोशल मीडिया पर एक गरमागरम बहस छेड़ दी.  भाजपा ने अपने इस ट्वीट में यह भी दावा किया कि कौशल विकास और स्वरोज़गार के माध्यम से सरकार ने 44 लाख रोज़गार सृजित किया है और 2018 के चुनावी घोषणापत्र में उनका वादा है कि अगले पांच वर्षों में वे 1.5 लाख सरकारी नौकरियां और 50 लाख नौकरियां प्राइवेट सेक्टर में देंगे. इस सिलसिले में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने एक ट्वीट में लिखा, “मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का यह दावा एक झूठ है”, और सरकार को उन 15 लाख युवाओं की सूची सार्वजनिक करने के लिए कहा जिन्हें रोज़गार मिला है.

राजनीतिक दांव-पेंच से अलग हटकर विभिन्न सरकारी एजेंसियों में रोज़गार सृजन और विभिन्न कौशल विकास योजनाओं के प्रभावशीलता के आंकड़े और उलझा देने वाली हैं. यही हाल है मुद्रा योजना के ज़मीनी हकीक़त का भी. ढोलपुर ज़िले में गांव कल्लापुरा के निवासी डालचंद शर्मा ने एक दुकान खोलने के लिए मुद्रा योजना के तहत 20,000 रुपए का ऋण लिया था, लेकिन उन्हें अपने किसानी में वापस लौटना पड़ा, क्योंकि उनका कहना था कि जो “राशि उन्हें मिली वह दुकान खोलने के लिए बहुत कम थी”.  बिझौली गांव के कल्याण ने एक जनरल स्टोर खोलने के लिए 2015 में 50,000 रुपयों का ऋण लिया था और वर्त्तमान में एक पत्थर तोड़ने वाले के यहां काम कर रहे हैं. इन सब के बावजूद डालचंद और कल्याण जैसे लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में ‘स्व नियोजित’ सिर्फ इसलिए दिखा दिया जाता है, क्योंकि उन्होंने मुद्रा योजना के तहत ऋण लिए थे.

आधिकारिक आंकड़ों का दावा है कि राजस्थान में 2015 से 2018 के बीच मुद्रा योजना के तहत 33,971.54 करोड़ रुपए का ऋण दिया गया है. इस मामले में बेंगलुरु स्थित अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अमित बसोले ने कहा, “ऋण देना और रोज़गार देना दो बिल्कुल ही अलग-अलग बातें हैं. अगर एक लाभार्थी ने ऋण लिया, लेकिन उन पैसों को दूसरी चीज़ों में ख़र्च कर दिया, तो आप कैसे उस व्यक्ति को नियोजित मानेंगे?” बसोले ने आगे बताया कि मुद्रा योजना के तहत ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे यह देखा जाए कि ऋण लेने के बाद कौन क्या कर रहा है.

अजीब बात यह है कि जहां एक तरह रोज़गार आंकड़ों को लेकर इतने विवाद हो रहे हैं, वहीं सरकारी पदों की रिक्तियां अब तक नहीं भरी गई हैं. 2013 से लेकर अक्टूबर 2018 तक सरकार ने 2,25,398 रिक्त पदों की घोषणा की थी. इनमें से 1,06,548 पद अब भी भरे जाने हैं. शिक्षा विभाग ने सबसे ज्यादा पदों की यानि 1,43,373 रिक्त पदों की घोषणा की थी, जिनमें से 88,648 पद अब भी खाली हैं. पुलिस विभाग में 15,155 रिक्त पदों में से 2,155 पद भरे जाने हैं. इनके अलावा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ आरएएस, स्कूल सहायकों, नर्सों, लैब सहायक, लाइब्रेरियन, स्टेनोग्राफर, फार्मासिस्ट और सहायक इंजीनियर के पद भी अब तक खाली हैं.

राजस्थान बेरोजगार एकीकृत महासंघ के अध्यक्ष उपेन यादन ने कहा कि यह रिक्तियां अब तक इसलिए नहीं भरी गई हैं, क्योंकि विभागों में भर्ती की कोई मानक प्रणाली या नियम नहीं हैं. यादव ने बताया, “हर सरकार अपने हिसाब से इन पदों पर भर्ती करती है और प्रश्नपत्रों में गलतियां इन पदों के लिए आवेदन भरने वाले युवाओं के लिए एक समस्या बनी हुई है.” उन्होंने कहा कि सरकार रोज़गार के इन आंकड़ों पर श्वेत पत्र जारी करे या फिर झूठ बोलने के लिए माफ़ी मांगे. यादव ने आगे कहा, “26 से भी ज़्यादा बेरोज़गार युवकों ने पिछले 5 वर्षों में आत्महत्या की है और कई और अवसाद से ग्रस्त हैं. अगर सरकार का 44 लाख नौकरियों का दावा सच है तो राजस्थान में एक भी युवा बेरोज़गार नहीं होता.”

विवाद का दूसरा सबसे बड़ा मसला है दावे और विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के तहत प्रशिक्षित लोगों के अधिकारिक आंकड़े एवं उनमें से कितने लोगों को असल में एक फायदेमंद रोज़गार मिला है या कितने लोग स्व-नियोजित हुए हैं. अक्टूबर में वसुंधरा राजे ने एक ट्वीट के ज़रिये कहा था कि “राजस्थान कौशल एवं आजीविका विकास निगम ने 2.6 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया है, प्लेसमेंट फेयर में 15 लाख नौकरियां दी हैं और 2.35 लाख सरकारी नौकरियां दी गयी हैं”. मात्र 15 दिनों के अन्दर ही यह आंकड़ा बढ़ कर 44 लाख हो गया. यह आंकड़ा 7 सितम्बर को राजस्थान विधानसभा में दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना एवं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत रोज़गार एवं स्व रोज़गार निर्माण को लेकर दिए गए जवाब से बिलकुल अलग था.

कौशल प्रशिक्षण को लेकर अधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 से 2018-19 तक एम्प्लॉयमेंट लिंक्ड स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत 1,99,469 लोगों को प्रशिक्षित किया गया था, रेगुलर स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत 19,789 लोगों को प्रशिक्षित किया गया और दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के तहत 40,528 लोगों को प्रशिक्षित किया गया. इन सभी योजनाओं के तहत कुल 2,59,786 लोगों को प्रशिक्षित किया गया. लेकिन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत यह दावा किया गया कि 2,75,073 लोगों को प्रशिक्षण मिला जिनमें से 94,490 लोगों का प्लेसमेंट हुआ. यह आंकड़ा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के आधिकारिक वेबसाइट के डेटा से ली गई है. भारतीय नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने अप्रैल 2018 में जारी किए अपने रिपोर्ट में इन आंकड़ों पर सवाल उठाये. उन्होंने यह कहा कि 37.45 प्रतिशत, यानी कि करीब 89,000 लोगों को ही नौकरी मिली है जो कि राजस्थान कौशल एवं आजीविका विकास निगम के दावों से बहुत ही कम है.

इन सब के अलावा, जिन लोगों को कौशल प्रशिक्षण योजना के तहत प्रशिक्षण मिला उनके पास बताने के लिए अपनी एक अलग कहानी है. टोंक में रामथला गांव के कन्हैयालाल ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत सहायक इलेक्ट्रीशियन का 3 महीने का प्रशिक्षण लिया और जयपुर में एक कंपनी में उन्हें नौकरी मिली. वहां उन्हें दिन के 12-13 घंटे काम करने के बदले में प्रति माह मात्र 8000 रु. तनख्वाह दी जाती थी. कन्हैया ने कहा, “यह तन्हख्वा एक राजधानी में रहने के लिए काफी नहीं है.”  कहारों का झोपड़ा गांव के राजेश चौहान ने भी इसी योजना के तहत प्रशिक्षण लिया था. उन्होंने पूछा, “ऐसी नौकरी का क्या फायदा जो ऋण के भार को बढ़ा दे ओर जिससे रोज़मर्रे के खर्चे भी न चले?

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