कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

चुनाव से पहले राजपूतों ने करणी सेना से क्यों दूरी बना ली है?

विधानसभा चुनाव से पहले कालवी ने दोनों पार्टियों से टिकटों की सौदेबाज़ी करने की कोशिश की थी, जिसका पता राजपूत समाज को चल गया था. इसलिए, अब राजपूत समाज के लोगों ने करणी सेना से दूरी बनानी शुरू कर दी है.

2018 की शुरुआत से ही करणी सेना की कारगुजारियों (गतिविधियों) के चलते ख़बरों में रहे राजस्थान में अब विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। फ़िल्म ‘पद्मावत’ के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने के लिए करणी सेना राजपूत युवाओं की अच्छी-खासी भीड़ जुटाने में कामयाब हो गई थी, जिसके लिए उसे मीडिया और प्रगतिशील लोगों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. जब लगभग हर कोई करणी सेना के ख़िलाफ़ बोल रहा था, उस समय राजस्थान के सभी दलों के नेता चुप्पी साधे हुए थे. क्योंकि उन्होंने उस समय जातीय दम्भ भरते इस संगठन को चुनावी तराजू में तौलना शुरू कर दिया था और अब चुनाव का समय नज़दीक आया तो आम लोगों ने भी इसे महत्वपूर्ण राजनैतिक शक्ति के रूप में देखना शुरू कर दिया था. लेकिन, बीते 27 अक्टूबर को जयपुर में करणी सेना की रैली फ़्लॉप साबित हुई है.

करणी सेना ने विधानसभा चुनाव से पहले राजपूतों की ताकत दिखाने के लिए जयपुर के विद्याधर नगर में अपनी रैली का आयोजन किया था. इस रैली के लिए विद्याधर नगर स्टेडियम में भारी भरकम मंच लगाने के साथ-साथ हजारों कुर्सियों का इंतज़ाम किया गया था. रैली को सुबह 11 बजे शुरू किया जाना था, लेकिन रैली के पंडाल खाली पड़े होने के कारण लगभग डेढ़ बजे शुरू किया गया. खूब हाथ पैर मारने के बाद भी आयोजक रैली में बमुश्किल 150-200 लोग ही इक्कठा कर पाए. थक-हारकर करणी नेता खाली पड़े मैदान में ही अपना भाषण झाड़कर चले गए.

आयोजक रैली में बमुश्किल 150-200 लोग ही.

करणी सेना की फ़िल्मी कहानी

साल था 2006. राजपूत नेता लोकेंद्र कालवी कांग्रेस में अपनी अनदेखी और लगातार राजनैतिक असफलताओं का सामना कर रहे थे. कांग्रेस में अपनी गिरती साख बचाने के लिए कालवी ने उसी साल अजीत सिंह मामडोली के साथ मिलकर सितंबर महीने में एक नया संगठन खड़ा किया. जिसका नाम था ‘श्री राजपूत करणी सभा’.

श्री राजपूत करणी सभा की स्थापना राजपूत युवाओं को नौकरियों में आरक्षण दिलवाने और राजपूत नेताओं को विधानसभा में टिकट दिलवाने के नाम पर हुई थी. 2008 के चुनाव में कांग्रेस ने 40 राजपूत नेताओं को टिकट देने का वादा करके इस संगठन का समर्थन हासिल कर लिया. लेकिन, संगठन के अध्यक्ष अजीत सिंह मामडोली को कांग्रेस से टिकट नहीं मिल सका. टिकट कटने का ज़िम्मेदार लोकेंद्र कालवी को बताकर अजीत ने संगठन छोड़ दिया और ‘श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना समिति’ नाम से अपना नया संगठन बना लिया.

2010 में कालवी ने संगठन के अध्यक्ष पद पर सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को काबिज़ किया, लेकिन गोगामेड़ी भी कालवी से परेशान होकर 2015 में संगठन को अलविदा कह गए और ‘श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना’ नाम से एक और नई करणी सेना बना ली.

करणी सेना के तीनों ही धड़ों ने अबतक उसी साल फ़िल्मों का विरोध किया है, जिस साल राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए  हैं. 2008 के चुनाव से पहले आशुतोष गोवारिकर की फ़िल्म ‘जोधा अकबर’ को ऐतिहासिक नज़रिए से गलत बताते हुए इस फ़िल्म के ख़िलाफ़ प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन किया था. इसी विरोध की कड़ी में 2013 के चुनाव से पहले एकता कपूर के टेलीविजन शो ‘जोधा अकबर’ और अब इस साल के चुनाव से पहले संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ शामिल है.

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार नारायण राठौर से जब फ़िल्मों के विरोध और विधानसभा चुनाव के कनेक्शन का ज़िक्र किया तो उनका कहना था, ‘ये सबकुछ लोकेंद्र कालवी के नेता बनने के सपनों के कारण हो रहा है. कालवी पिछले दो दशक से नेता बनने की कोशिश कर रहा है, पर बेचारे को एक बार भी सफलता हाथ नहीं लगी है. इसके राजनैतिक करियर को देखोगे तो आपको पता लग जाएगा, कि यह हर पार्टी के साथ जा चुका है, लेकिन आजतक इसका कुछ नहीं बना है. इसके तो पिताजी ने भी इन्हें गांव में सरपंची तक का चुनाव लड़वाने से मना कर दिया था. पहले यह भाजपा में था, वहां चुनाव हार गया तो अपनी नई पार्टी बना ली. जब उस नई पार्टी ने इसे नेता नहीं बनाया, तो कांग्रेस में आ गया. अब जब कांग्रेस में कोई नहीं पूछता था तो इसने करणी सेना बना ली. यह चुनाव से पहले फ़िल्मों का विरोध इसलिए करता है, ताकि मीडिया में आ जाए और दोनों पार्टियों को अपना दम-खम दिखा सके. ये सिर्फ और सिर्फ अपने राजनैतिक कैरियर की सोचता है बाकी तो इसे समाज से कोई लेना देना नहीं है.’ करणी सेना के पास फिल्मों के विरोध करने के लिए तो भीड़ जरूर आ गई थी, लेकिन चुनाव आते-आते लोग करणी सेना से दूरी बनाने लग गए.

27 अक्टूबर को जयपुर में करणी सेना की रैली फ्लॉप साबित हुई है

भीड़ ना इक्कठा हो पाने पर करणी सेना के संयोजक लोकेंद्र सिंह कालवी ने मीडिया में दिए बयानों में कहा कि करवा चौथ होने की वज़ह से औरतें घर से बाहर नहीं आ सकीं. पुरुष पता नहीं क्यों रैली में नहीं आए. हमने बसें भी भिजवाई थीं लेकिन लोग नहीं आए. इसके लिए हम जांच करेंगे. बेशक, इस बार हम भीड़ इक्कट्ठा न कर पाए हों लेकिन, 14 नवंबर को दोबारा रैली कर भीड़ इक्कठा कर हम अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगे.

कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले कालवी ने दोनों पार्टियों से टिकटों की सौदेबाज़ी करने की कोशिश की थी, जिसका पता राजपूत समाज को चल गया था. इसलिए, अब राजपूत समाज के लोगों ने करणी सेना से दूरी बनानी शुरू कर दी है.

सूबे के राजपूत युवाओं को जातीय महानता के नारे के बल पर इक्कठा करने वाले लोकेंद्र कालवी और करणी सेना राजनैतिक शक्ति बनने में असफ़ल हुई है. पिछले कई सालों से भाजपा और संघ परिवार सवर्णों के वोट बैंक को कब्जाने के लिए करणी सेना के पोषक बने हुए थे. करणी सेना की पतली हालत के चलते अब भाजपा को भी विधानसभा चुनाव में दिक्कतें होने वाली हैं.

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