कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

‘हर हाथ को काम’ का दावा हुआ फेल- मोदी सरकार में बीते 20 साल के अपेक्षा सबसे अधिक बेरोज़गारी

युवाओं में बेरोज़गारी की दर सबसे अधिक बढ़ी है जो अपने सबसे उच्चतम स्तर 16 फीसदी पर पहुंच गई है।

मोदी सरकार में युवाओं को रोज़गार देने के दावे का सच सामने आ गया है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री मोदी पिछले एक साल में एक करोड़ से अधिक नौकरियां देने की बात करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वर्तमान सरकार में बेरोज़गारी दर पिछले बीते बीस सालों के अपेक्षा सबसे ज़्यादा है। शोध आधारित रिपोर्ट में यह बात भी सामने निकलकर आती है कि जिस युवा वर्ग को रोज़गार देने की बात प्रधानमंत्री कर रहे हैं, उनमें बेरोज़गारी की दर सबसे उच्चतम है।

 

गौरतलब है कि यह रिपोर्ट मंगलवार को अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र द्वारा प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट को विभिन्न शोधकर्ताओं, नीति निर्धारकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वर्ष 2015-16 तक कई स्त्रोतों से प्राप्त रोज़गार के विभिन्न आंकड़ों के आधार पर मिलकर तैयार किया है। इसमें सरकारी रिपोर्ट और नेशनल सैम्पल सर्वे (एनएसएस) के आंकड़ों को भी शामिल किया गया है।

 

रिपोर्ट के अनुसार बेरोज़गारी दर निरंतर बढ़ रही है। पिछले कुछ सालों में तकरीबन 2 से 3 फीसदी के बीच बने रहने वाली यह दर 2015 में अप्रत्याशित वृद्धि के साथ 5 फीसदी पर पहुंच गई। सबसे ज़्यादा गौर करने वाली बात यह है कि युवाओं में बेरोज़गारी की दर सबसे अधिक बढ़ी है जो अपने सबसे उच्चतम स्तर 16 फीसदी पर पहुंच गई है।

 

जी़डीपी और रोज़गार के संबंधों को लेकर रिपोर्ट टिप्पणी करता है कि यह ज़रूरी नहीं कि जीडीपी बढ़ने पर रोज़गार की संभावना भी बढ़े। अध्ययन बताता है कि यदि जीडीपी में 10 फीसदी की बढोतरी हो तो रोज़गार में एक फीसदी से भी कम बढ़ोतरी होगी। भारत में जीडीपी के अनुपात में रोजगार नहीं बढ़े हैं।

 

रिपोर्ट आगे वेतन के विसंगतियों और असमनताओं पर भी प्रकाश डालता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की एक बड़ी आबादी को सामान्य जीवनयापन के लिए भी पर्याप्त वेतन नहीं मिल पाता है। 82 फीसदी पुरुष और 92 फीसदी महिला कामगारों को 10,000 से भी कम मासिक वेतन मिलता है। संगठित विनिर्माण क्षेत्र में जहां 2 फीसदी वेतन बढ़ा है वहीं असंगठित विनिर्माण क्षेत्र में वेतन में वृद्धि 4 फीसदी दर्ज़ किया गया है।
अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले लेखकों में शामिल अमित बसोले ने कहा कि इस पहल का मकसद जनता के बीच बेहतर समझ बनाना है। इसके अलावा नीतिगत उपाय सुझाना ताकि सभी को रोजगार और नियमित आय सुनिश्चित हो सके।
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