कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मोदी जी के अच्छे दिन – राशन कार्ड का आधार से लिंक न होना बन रहा है लोगों के मौत की वजह

2017 से 2018 के बीच 42 मौतें हुई हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें पेंशन या जन वितरण प्रणाली से राशन न मिलने के कारण हुई हैं।

भारत में कुछ सालों से भूख से मौत होने की बहुत सी खबरें सामने आई हैं। सितंबर 2017 में झारखंड में 11 वर्षीय संतोषी की मौत हुई थी। संतोषी के परिवार वालो का आरोप था कि बच्ची भात-भात कहते हुए चली गई। 2017 में मई से जुलाई के बीच झारखंड सरकार ने बड़ी संख्या में आधार से न जुड़े राशन कार्डो के रद्द कर दिया था। राशन कार्ड रद्द होने वाले परिवरों में संतोषी के परिवार का राशन कार्ड भी रद्द कर दिया गया था।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संतोषी की पुण्यतिथि पर 2015 से अब तक भूख से हुई मौतों की सूची जारी की है। सूची के अनुसार पिछले चार सालों में कम से कम भुखमरी से 56 लोगों की मौतें हुई हैं। 2017 से 2018 के बीच 42 मौतें हुई हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें पेंशन या जन वितरण प्रणाली से राशन न मिलने के कारण हुई हैं। 42 मौतों में से 25 आधार संबंधित दिक्कतों के कारण हुई थी। आधार कार्ड से न जुड़े होने से राशन कार्ड रद्द कर दिया जाता है।

झारखंड और उत्तर प्रदेश से भुखमरी की खबरें आती रही हैं। दोनों राज्यों में 16-16 व्यक्तियों की मौत की खबर आई है। झारखंड में आधार और बायोमेट्रिक सत्यापन व्यवस्था लगभग हर राशन की दुकान पर अनिवार्य है। जबकि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून देर और अव्यवस्थित ढंग से लागू किया गया है।

भुखमरी के शिकार अधिकांश लोग दलितआदिवासी और मुसलमान वर्ग के हैं। लोकतंत्र में जहां भूख से होने वाली मौतें गंभीर और प्रतिक्रिया का विषय होनी चाहिए, वहां ज्यादातर मौतें खबरों तक भी नहीं पहुंच पाती। भुखमरी से हुई कुछ मौतें चर्चित जरुर हुई हैं। लेकिन उन चर्चाओं से सरकार पर वह दबाव नहीं बन पाया कि कार्रवाई के लिए प्रशासन को विवश किया जा सके।

भूख से होने वाली मौतों से सरकार भी अंजान नहीं है। क्योंकि आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन व्यवस्था पूरे देश में केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई है। जहां इस व्यवस्था

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