कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

आख़िर गोदी मीडिया ने भी माना- हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ा दे रही है मोदी-योगी की जोड़ी: रवीश कुमार

जब कोई अखबार सच न लिखने दे तो रिपोर्टर को पंक्तियों के बीच सत्य और तथ्य को छोड़ देने की कला सीखनी होगी.

दैनिक जागरण, महासमर 2019, पेज नंबर 6. इस पर चुनाव की चार बड़ी-बड़ी रिपोर्ट हैं. पहली रिपोर्ट जयप्रकाश पांडेय की है. इस रिपोर्ट के आधे के बराबर हिस्से में पश्चिम उत्तर प्रदेश में गंग नहर बनने का संक्षिप्त इतिहास बताया गया है. यह बताने के लिए कि कैसे लोगों ने भी गंगा के इस हिस्से को कम प्रदूषित किया है. बचा कर रखा है.

रिपोर्टर ऐलान करता है कि गंगा जल की शुद्धता को देखने उनकी टीम निकली है. लेकिन इसमें एक जगह भी मोदी सरकार की नमामि गंगे प्रोजेक्ट का नाम नहीं है. न बजट और न ही रिपोर्ट में दर्ज इलाके में नमामि गंगे के किसी प्रोजेक्ट या किसी प्रयास का ज़िक्र है.

“मां कितनी निर्मल है और कहां अविरल मोक्षदायिनी है और स्वभाव से सरल. इस चुनाव में मात्र संकल्पों का आचमन हो रहा है या गंगाजल इस बार वाकई शुद्ध हो रहा है यह देखने, समझने और मां से मिलने दैनिक जागरण की टीम गंगा के किनारे पहुंची. गढ़ मुक्तेश्वर से हस्तिनापुर और कानपुर से प्रयागराज होते हुए वाराणसी तक हमारी टीम ने मां के चेहरे के बदलते भाव देखे. मां कैसी हैं, बताएंगे इस पड़ताल के सारथी हमारे अलग-अलग गंगायात्री. पहले यात्री हैं मेरठ से संपादकीय प्रभारी जयप्रकाश पांडेय.“

संपादकीय प्रभारी की रिपोर्ट है. पढ़कर लगता है कि च्यवनप्राश बेचने वाले किसी आश्रम के प्रभारी की रिपोर्ट है. इस रिपोर्ट में गंगा को लेकर प्रयोग की गई भाषा का विश्लेषण हो सकता है. पत्रकार के लिए नदी की धार्मिकता सर्वोपरि है. ये और बात है कि रिपोर्ट में वह इससे भी ईमानदारी नहीं बरतता है और इसकी आड़ में सरकार को बचा ले जाता है.

गंगा के प्रति लोग आस्था रखते हैं और नहीं रखने वाले भी उतना ही गंगा को लेकर चिन्तित रहते हैं और प्यार करते हैं. इस रिपोर्ट को पढ़ने से अंदाज़ा हो सकता है कि अख़बारों में संपादकीय प्रभारी लोगों की गुणवत्ता क्या है. हम एंकरों की सख़्त समीक्षा होती है. अख़बारों के संपादकीय प्रभारियों और संपादकों की भी समीक्षा होनी चाहिए. पांडेय की रिपोर्ट का इंट्रो देखकर लगता है कि इनका नहीं रामदेव का लिखा है.

“यह है हस्तिनापुर से गुज़रती गंगा से 67 किलोमीटर दूर स्थित भोला की झाल. यहां होता है मानव श्रम और मां गंगा के आशीर्वाद का अदभुत संगम, यहां गंगनहर पूरे वैभव के साथ मेरे ठीक सामने है. यह एक स्थान इस बात का मूक गवाह है कि यही आपने गंगा के प्रति आस्था रखने के साथ-साथ उनके प्रति एक पुत्र समान कर्तव्य भी निभाया तो बदले में मां से समृद्धि का आशीर्वाद मिलना ही मिलना है.“

इसी तरह के धार्मिक रूपकों से पूरी रिपोर्ट भरी है. क्या यह रिपोर्टर की भाषा हो सकती है? संपादकीय प्रभारी रिपोर्ट लिख रहे हैं या कथावाचक बनने का अभ्यास कर रहे हैं. उपरोक्त पंक्तियों में पुत्र की तरह कर्तव्य की बात करते हैं, पुत्रियां क्या करें फिर गंगा को लेकर? गंगा प्रदूषित हुई है सरकारी नीतियों के कारण. उससे ध्यान हटाकर व्यक्तिगत प्रयास की बात करना गंगा के साथ बेईमानी है.

रिपोर्टर किस आधार पर लिख रहा है कि “उनके प्रति एक पुत्र समान कर्तव्य भी निभाया तो बदले में मां से समृद्धि का आशीर्वाद मिलना ही मिलना है.“ बहुत से ग़रीब आस्थावान पीढ़ियों से गंगा नहा रहे हैं. समृद्धि नहीं आई तो क्या किया जाए. धार्मिक आस्था को ढाल बनाकर पत्रकारिता हो, यह ठीक नहीं है. आप अपनी ही रिपोर्ट पर पानी डाल देते हैं.

अन्य दिनों में गंग नहर के इतिहास की जानकारी अच्छी रहती. इसका शानदार इतिहास है. चलिए चुनाव के सहारे एक बार और सही. इस रिपोर्ट का मकसद यही बताना था कि लोग इसे साफ रखते हैं तो उसके बारे में भी और विस्तार से बात हो सकती थी कि लोग क्या क्या करते हैं जिससे गंग नहर का पानी प्रदूषित न हो.

कायदे से रिपोर्टर को नमामि गंगे की नीतियों के तहत सरकारी प्रयासों का भी ज़िक्र करना चाहिए था. जय प्रकाश पांडेय आधा से अधिक हिस्सा इतिहास पर ख़र्च करने के बाद अब आते हैं और उसकी सब हेडिंग इस तरह दी जाती है कि “सवाल उठता है कि हमने क्या किया, जवाब देती है सीपीसीबी की रिपोर्ट.“

यहां “हमने” क्या किया पर ज़ोर है. इस “हमने” का क्या तात्पर्य है, सरकार या आम जनता? 2018 की केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के हवाले से लिखते हैं कि यूपी में बिजनौर औऱ बुलंदशहर दो ऐसे ज़िले हैं जहां गंगा का पानी नहाने योग्य है. मेरठ व आस-पास के ज़िलों में स्थिति कमोबेश ठीक है जबकि प्रदेश के बाकी दूसरे स्थानों पर इसका पानी नहाने योग्य भी नहीं है. ये दूसरे स्थान कौन कौन है, इनका नाम दिया जा सकता था. शायद भावुकता और धार्मिकता की लफ्फबाज़ी से जगह न बची हो.

सीपीसीबी की रिपोर्ट बताती है कि मेरठ व आस-पास के गंगातटीय ज़िलों में लोगों ने गंगा के प्रति दायित्व निभाए हैं. “ऐसा नहीं है कि इस भू-भाग पर कोई नाला गंगा में नहीं गिरता है लेकिन उनकी संख्या तुलनात्मक रूप से कम है.“ क्या जो भी नाला गिरता है, उसका गंदा पानी साफ करने की व्यवस्था की गई है, क्या रिपोर्टर जयप्रकाश को इस बात का अहसास है कि इस तरह की लापरवाही गंगा को आज न कल बल्कि अभी ही प्रदूषित कर रही है.

इस तरह रिपोर्ट समाप्त हो जाती है. आख़िर के बड़े से हिस्से में एक तस्वीर है. जिसमें गंगा का पानी गंदा दिख रहा है. तस्वीर के ऊपर लिखा है कि “ धरा को देव की भेंट है मां गंगा. हिमालय से गंगासागर तक जिस मानव सभ्यता ने जाह्वी को माता का मान दिया, वहां का भू-क्षेत्र आज सोना उगल रहा है. और जहां के समाज ने गंगा के प्रति आस्था तो रखी मगर कर्तव्य विमुख हुआ, वहां से लक्ष्मी रुठ गई.“ अब आप ही कहें कि यह किसी बाबा का प्रवचन है या रिपोर्टर की रिपोर्ट.

प्रोफेसर जी डी अग्रवाल ने हम सबको गंगा के प्रदूषण के बारे में जागरूक किया. वे गंगा के लिए अनशन पर बैठे और उस कारण मर गए. मगर इस रिपोर्ट में उनका ज़रा भी ज़िक्र नहीं है. क्या व्यक्तिगत प्रयासों में जी डी अग्रवाल का प्रयास ज़िक्र के लायक भी नहीं है? देखिए अखबार को पता है कि आप गंगा का सम्मान करते हैं. गंगा के बारे में पढ़ना अच्छा लगता है. उसका लाभ उठाकर वह गंगा के बारे में आपकी आंखों में धूल झोंक रहा है.

इस तरह आपने गंगा के बारे में एक बड़ी रिपोर्ट देखी मगर जाना कुछ नहीं. दस साल पहले मैं खुद अख़बार की हर रिपोर्ट को पढ़ कर वाहवाही करता था. मगर लगातार मीडिया की समीक्षा के कारण यह समझ पा रहा हूं कि अख़बार पढ़ने से अख़बार पढ़ना नहीं आता. हिन्दी के अख़बार हिन्दी के पाठकों की हत्या कर रहे हैं.

कस्बों और देहातों में स्कूल कालेज अच्छे नहीं मिले. उनके पास डिग्री है मगर पढ़ाई को समझने का नज़रिया नहीं. इन्हीं सब लोगों से बनता है हमारा पाठक संसार, जिसे और गर्त में पहुंचा देने के लिए हमारे अखबार दिन रात मेहनत करते हैं. पूरी कोशिश होती है कि हिन्दी पट्टी के पाठकों के सोचने समझने की शक्ति का प्रसार और विकास न हो.

दर-दर गंगे नाम की किताब लिखने वाले अभय से इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद बात की. अभय ने बताया कि यह सही है कि गंग नहर ने अपना अलग समाज और संस्कृति का निर्माण किया है. गढ़मुक्तेश्वर में गंगा का पानी साफ नहीं है. कोई भी अपनी आंखों से देख सकता है. बृजघाट सुंदर हो गया है मगर उससे गंगा साफ नहीं हुई है. आप ख़ुद भी इस रिपोर्ट को पढ़ें और मुझे जांचे कि मैंने जो समीक्षा की है वो सही है या नहीं.

महासमर 2019 के पेज पर एक दूसरी ख़बर है रवि प्रकाश तिवारी की. मेरठ में प्रधानमंत्री की रैली की है. हेडिंग है- मोदी, दंगों का दर्द और पश्चिम का चढ़ता पारा. इस रिपोर्ट के पहले पैराग्राफ में पश्चिम यूपी के चुनावी समीकरण का ज़िक्र है. बताया जा रहा है कि किस तरह गठबंधन के कारण भाजपा की मुश्किलें बढ़ रही हैं. अब आगे लिखते हैं कि “इन पहलुओं को देखते हुए ही ध्रुवीकरण की हवा को मोदी ने आगे बढ़ाया, जिसकी शुरूआत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहारनपुर में पहले ही कर चुके हैं.“

जो सच होता है वो फिसल ही आता है. आखिर जागरण ने भी लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी घ्रुवीकरण को हवा दे रहे हैं. योगी भी हवा दे रहे हैं. ध्रुवीकरण का मतलब हुआ हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिकता. या कुछ और मतलब होता है रवि प्रकाश? वेल डन. यही सीखना है. जब कोई अखबार सच न लिखने दे तो रिपोर्टर को पंक्तियों के बीच सत्य और तथ्य को छोड़ देने की कला सीखनी होगी.

बाकी एक बहुत बड़ी रिपोर्ट है. रिपोर्ट कम विश्लेषण ज़्यादा है. इसमें नेताओं की तस्वीरें हैं. छह तस्वीर भाजपा के नेताओं की हैं और दो तस्वीर विपक्ष की. प्रधानमंत्री मोदी, वी के सिंह, हेमा मालिनी, योगी आदित्यनाथ, केशव मौर्य, साक्षी महाराज. विपक्ष में सोनिया गांधी और मुलायम सिंह यादव की तस्वीर है. दिन 13 सीटों का विश्लेषण किया गया है उसमें रायबरेली और मैनपुरी के कारण सोनिया और मुलायम की तस्वीर है. बाकी सीटें तो भाजपा की ही रही हैं. तो चित्रों को रिपोर्ट के हिसाब से ही लगाया गया है.

इस तरह आप पेज नंबर 6 के महासमर 2019 पढ़ने के बाद चुनाव से संबंधित खास नहीं जान पाते हैं. पन्ने की चमक देखकर लगेगा कि आप चुनाव के बारे में जान रहे हैं. मगर यह पन्ना योजनाओं की वास्तविक समीक्षा को लेकर होता तो बेहतर होता. लोगों की आवाज़ होती तो और बेहतर होता.

पेज नंबर सात पर एक खबर है. हाथरस के भाजपा उम्मीदवार की डिग्री को लेकर. अखबार चाहता तो इसे चुनावी पन्ने में प्रमुखता से और बाईलाइन के साथ छाप देता. मगर कम से कम छापा यह बड़ी बात है. इस तरह से छापा कि नज़र न पड़े, यह छोटी सोच है.

इस खबर के अनुसार इगलास के बीजेपी विधायक और हाथरस लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी राजवीर दिलेर ने दो साल पहले विधानसभा चुनाव में 12 वीं में फेल की योग्यता बताई थी. 26 मार्च को हाथरस से पर्चा दाखिल किया तो उसमें इंटर पास बता दिया है. शपथ पत्रों में मिलान करने से ये बात सामने आई है. अगर रिपोर्टर ने खुद चेक किया है जैसा कि पढ़ने से ज़ाहिर होता है तो इस खबर को बाईलाइन के साथ जानी चाहिए थे.

मगर रिपोर्ट में शिक्षाविदों के कंधों का इस्तेमाल किया गया है. जबकि अनाम रिपोर्टर लिखता है कि शिक्षाविदों के अनुसार यदि राजवीर दिलेर विधानसभा चुनाव के समय इंटर फेल थे तो अभी इंटर पास नहीं कर सकते क्योंकि पहले वर्ष 2017 की परीक्षा में उन्हें हाईस्कल उतीर्ण करना पड़ता और उसके बाद वर्ष 2019 में इंटर हो पाता.

अभी इस सत्र का परिणाम नहीं आया है. अख़बार इसे बड़ा कर अपनी ज़िम्मेदारी निभा सकता था. जबकि राजवीर दिलेर इसी रिपोर्ट में कह रहे हैं कि मैंने जानबूझ कुछ नहीं किया. हो सकता है कि जल्दबाजी में फार्म भरने के दौरान शैक्षिक योग्यता में कोई गलती हो गई हो. मेरा इरादा कत्तई ग़लत नहीं है.

अब आप पाठक ही बताएं. क्या डिग्री के बारे में ग़लत जानकारी देना इरादा ग़लत होने का सवाल है? इसीलिए कहता हूं कि जागरण को ध्यान से पढ़ें. हो सकता है कि भाजपा के समर्थकों को अपने लिए एक ऐसे अखबार की ज़रूरत हो मगर क्या वह समर्थक भाजपा का समर्थक इसलिए बना है कि उससे झूठ पसंद है.

अख़बारों का भरमाना पसंद है. उसे एक सवाल करना चाहिए. वह भाजपा का समर्थक ख़ुद को अंधेरे में रखने के लिए बना है. यही सवाल उसे गोदी मीडिया से पूछना चाहिए. क्योंकि यह सवाल भाजपा समर्थकों के आत्म सम्मान का है कि गोदी मीडिया उन्हें बेवकूफ कैसे बना सकता है और कैसे समझ सकता है. जय हिन्द.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के फ़ेसबुक पोस्ट से शब्दश: लिया गया है.)

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