कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बेटे को गृह ज़िला में नौकरी करते देखने का सपना देखते मां गुजर गई: बिहार के बेरोज़गार युवा ने रवीश को लिखा भावुक पत्र

"सब कुछ छोड़ कर दिल्ली से घर आ गया हूं. पिताजी की देखभाल के लिए. समझ नहीं आता क्या करें."

आज भी एक पत्र आया है. आप सभी इन पत्रों को पढ़ कर बोर होने लगे होंगे. वैसे नौजवान भी नहीं पढ़ते हैं. वो सिर्फ अपनी परीक्षा से संबंधित ख़बर पढ़कर हिन्दू मुस्लिम में लग जाना चाहते हैं. लेकिन उनके मैसेज की मायूसी थोड़ी परेशान करती है. क्या उम्र है इनकी. किन परेशानियों से गुज़रते होंगे ये.

सर नमस्ते ????

उम्मीद है कि आप सकुशल होंगे.

हमने बिहार के पंचायती राज विभाग में तकनीकी सहायक पद (संविदा) के लिए सितंबर 2018 मे अप्लाई किया था, 55 पद के लिए काउंसिलिंग नवंबर 2018 में ही हो गई थी लेकिन अब तक बहाली नहीं हो पाई. मात्र 22 पद पर 2 महीने पहले बहाली हुई. शेष 33 पद अब भी खाली हैं.

इसी बीच मेरी मां 15 may 2019 को अचानक दुनिया छोड़ कर चली गई. वो भी आस में थी के बेटे को गृह ज़िला में जॉब मिल जाएगी.

सब कुछ छोड़ कर दिल्ली से घर आ गया हूं. पिताजी की देखभाल के लिए. समझ नहीं आता क्या करें. बहुत हिम्मत कर के आपको मैसेज किया. जानता हूं आप के लिए आसान नहीं हैं स्टोरी करना. कहीं ना कहीं आपको दुखी कर रहा हूं. माफी चाहता हूं

प्रेषक

अज्ञात

नाम नहीं दे रहा क्योंकि उसे परेशान न किया जाए. कई बार मैं ख़ुद झुंझला जाता हूं कि बड़ी बड़ी ख़बरों के संसार में कहां इन सबके चक्कर में फंस गया. जो गाली देते हैं, जो मुझे चकमा देते हैं उनके लिए क्या करूं. पर इस शर्त पर तो हम कोई ख़बर ही न लिखें. मैं लिखकर मुक्त हो जाता हूं. लगता है कि मैंने इनसे नफ़रत नहीं की. ये अच्छे ही होंगे. इनकी परेशानी इन्हें क्या क्या बना देती होगी. मैं इनके अच्छे भविष्य की कामना करता हूं.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फ़ेसबुक पोस्ट से लिया गया है.)

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