कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

5 सालों में मसूद अज़हर और दाऊद को लाने का प्रोपेगैंडा न्यूज़ चैनलों पर ख़ूब चला, महीना भर पहले अज़हर को मारने वाले चैनलों ने आपको सच बताया?- रवीश कुमार

जब न्यूज़ चैनल आपको बेवक़ूफ़ बनाने का कारख़ाना बन जाए तो आपको चैनल देखना बंद कर देना चाहिए. ऐसा कर आप घर बैठे भारत के लोकतंत्र को बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं.

ये मार्च महीने के किसी दिन का स्क्रीन शाट है. चैनलों पर मसूद अज़हर के मर जाने की ख़बर चली थी. एक में मीडिया रिपोर्ट का हवाला है तो दूसरे में सरकारी सूत्रों का. सूत्रों के हवाले से भारत सरकार का बयान भी फ़्लैश कर रहा है कि अज़हर के मर जाने के बाद आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहेगी.

इसी समय हमारे सहयोगी उमा शंकर ने रिपोर्ट की थी कि पाकिस्तान मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने का विरोध नहीं करेगा. उस खबर के बाद कुछ चैनलों की लाइन बदली थी. उमा शंकर की वह ख़बर वेबसाइट पर मौजूद है.

अज़हर के मारे जाने तो कभी दाऊद को लाने का प्रोपेगैंडा इन पाँच सालों में न्यूज़ चैनलों पर ख़ूब चला है. ऐसे कितने ही झूठ को ख़बर बता कर पेश किया गया. इसीलिए कहता हूँ कि आपने जिन न्यूज़ चैनलों को देखकर मौजूदा सरकार का मूल्याँकन किया है वो ग़लत मूल्याँकन किया है.

अगर मीडिया आज़ाद नहीं है तो आप सरकार का मूल्याँकन उसके आधार पर कर ही नहीं सकते. आपको आज तक नहीं पता चला होगा कि प्रधान मंत्री ने अक्षय कुमार के साथ बाल नरेंद्र कामिक्स का जो वीडियो वर्ज़न बनाया था वो किसने शूट किया था. किस चैनल के संसाधन का इस्तेमाल हुआ था.

जब न्यूज़ चैनल आपको बेवक़ूफ़ बनाने का कारख़ाना बन जाए तो आपको चैनल देखना बंद कर देना चाहिए. ऐसा कर आप घर बैठे भारत के लोकतंत्र को बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं. आप किसी भी चैनल के कंटेंट को देखिए. सूचना नहीं मिलेगी. न्यूज़ चैनल डिबेट के बकवास और वॉक्स पॉप पर चलते हैं. यानी जनता की टिप्पणियों पर जो न्यूज़ चैनलों की बनाई धारणाओं से ही निकलती हैं.

आप बहुत कम बार देखेंगे जब चैनल सूचना ला रहा है. एकाध बार तो सूचना आ ही जाएगी. वैसे भी खोज कर लाई गई रिपोर्ट न के बराबर दिखती है. बयान से निकली बात विवाद के लिए होती है सूचना के लिए कम होती है. इसका कहा बनाम उसका कहा.

न्यूज़ चैनल व्हाट्स एप हो गए हैं. फ़ेसबुक पर शेयर किए गए सेल्फी की तरह हो गए हैं. आपको पता है कि इसमें कुछ नहीं है लेकिन आप आदतन देखे जा रहे हैं. आपको लगता है कि कुछ देख रहे हैं. यानी सूचना पा रहे हैं लेकिन आप धारणा ग्रहण कर रहे हैं. आप रोबोट बनते जा रहे हैं जिसकी प्रोग्रामिंग चैनलों के ज़रिए फ़ीड की जा रही है.

न्यूज़ चैनलों में रिपोर्टिंग का ढाँचा बर्बाद है. सब कुछ एंकर की बड़बड़ाहट या हुनर पर निर्भर है जो किसी तरह फार्मेट यानी खाँचा भर देता है. अंग्रेज़ी में इसे फ़िल इन द ब्लैंक्स कहते हैं. आप ग़ौर कीजिएगा रिपोर्टर न के बराबर सूचना ला रहा है. ला रहा है तो आसान और राह चलती उपलब्ध सूचनाओं को पेश कर रहा है. एंकर उसे अपनी सुंदर और युवा देह भाषा से पेश कर रहा है. इसे सभ्य लोगों की अश्लीलता कहते हैं. आप जिसे मीडिया कहते हैं.

इसलिए आप न्यूज़ चैनल देखना बंद कर दें. कई लोगों ने कहा है कि जब से चैनल देखना बंद किया है, सुकून से हैं. आप समय लेकर विचार करें. हमलोग कुछ कर नहीं सकते. इसलिए मैं दावा करने से बचता हूँ ख़ासकर मुझे अपवाद के बहाने मुख्य धारा में बह रहे गटर के पानी को न्यूज़ कहना अच्छा नहीं लगता है.

मैं फ़रमान जारी नहीं कर रहा. यह मेरा तरीक़ा नहीं है. अपनी बात कह रहा हूँ कि हम सभी को न्यूज़ चैनलों को देखने का तरीक़ा बदलना चाहिए. जब ठोस विकल्प न नज़र आए तो चैनल बंद कर शाम को टहलना चाहिए. यही विचार कुछ हिन्दी अख़बारों के बारे में है.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फ़ेसबुक पोस्ट से हू-ब-हू लिया गया है.)

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