कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू पढ़ते समय गूगल भी करते रहें, मज़ा आएगा- रवीश कुमार

आंकड़े बताते हैं कि मोबाइल का पार्ट पुर्ज़ा का आयात काफी बढ़ गया है. जहां 2014 में पार्ट-पुर्ज़ा का आयात 1.3 अरब डॉलर का ही हुआ था वो अब 2017 में 9.4 अरब डॉलर का हो गया है. इस तरह 2014 से 2017 के बीच मोबाइल और मोबाइल पार्ट-पुर्ज़ा का कुल आयात 7.6 अरब डॉलर से बढ़कर 12.7 अरब डॉलर हो गया.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में प्रधानमंत्री से मेक इन इंडिया की असफलता पर सवाल पूछा गया है. जवाब में वे सफल बताने के लिए तीन चार उदाहरण देते हैं. भारत में रक्षा ज़रूरतों के सामान के उत्पादन के लिए भारतीय कंपनियों से क़रार किया गया. वाराणसी में डीज़ल इंजन और अमेठी में राइफ़ल के उत्पाद का उदाहरण देते हैं.

बताते हैं कि जापान से कार की कंपनियाँ भारत आकर कार बना रही हैं और उसका उत्पादन कर रही हैं. 2014 से पहले मोबाइल फोन बनाने की दो फ़ैक्ट्री थी जो अब 268 हो गई है.  प्रधानमंत्री ने मैन्यूफ़ैक्चरिंग यूनिट शब्द का इस्तमाल किया है.

पिछले साल 17 अक्तूबर को हिन्दुस्तान टाइम्स के विनीत सचदेव की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2014 में चीन से 6.3 अरब डॉलर का मोबाइल आयात किया था जो 2017 में घट कर 3.3 अरब डॉलर का हो गया. आपको लगेगा कि यह तो बड़ी कामयाबी है.

लेकिन दूसरे आंकड़े बताते हैं कि मोबाइल का पार्ट पुर्ज़ा का आयात काफी बढ़ गया है. बना बनाया नहीं आ रहा है लेकिन जहां 2014 में पार्ट-पुर्ज़ा का आयात 1.3 अरब डॉलर का ही हुआ था वो अब 2017 में 9.4 अरब डॉलर का हो गया है. इस तरह 2014 से 2017 के बीच मोबाइल और मोबाइल पार्ट-पुर्ज़ा का कुल आयात 7.6 अरब डॉलर से बढ़कर 12.7 अरब डॉलर हो गया.

31 मई 2018 के फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस में खबर छपी है. इसमें प्रधानमंत्री मोदी का बयान है कि 2014 में मोबाइल बनाने वाली दो कंपनियाँ थीं जो अब 120 हो गई हैं.

25 अक्तूबर 2018 को रायटर के हवाले से इकोनोमिक टाइम्स में ख़बर छपी है कि पिछले चार साल में 120 से अधिक मोबाइल मैन्यूफ़ैक्चरिंग यूनिट के कारण साढ़े चार लाख नौकरियाँ पैदा हुई हैं. रायटर ने यह आँकड़ा इंडियन सेलुलर इलेक्ट्रोनिक्स एसोसिएशन के हवाले से दिया है.

22 नवंबर 2018 को इंडियन सेलुलर इलेक्ट्रोनिक्स एसोसिएशन का बयान छपा है कि भारत में 268 मैन्यूफ़ैक्चरिंग यूनिट हो गई हैं. साढ़े छह लाख से अधिक नौकरियाँ मिली हैं.

यानी 31 मई 2018 से 22 नवंबर 2018  के बीच 148 फैक्ट्रियां आ गईं ! और ढाई लाख नौकरियाँ बढ़ जाती हैं.

 27 अगस्त 2016 को रविशंकर प्रसाद का बयान छपा है कि पिछले एक साल में 37 मोबाइल मैन्यूफ़ैक्चरिंग यूनिट लगी हैं. इस औसत से अगले तीन साल में 100 यूनिट का हिसाब बनता है.

इस तरह से डेटा को वैधानिकता प्रदान की जाती है. कोई बयान दे देता है वही डेटा बन जाता है.  सत्य जानने का कोई ज़रिया नहीं है. सत्य को सिर्फ आप झूठ के फटे कुर्ते से झाँकते हुए देख सकते हैं.

वैसे भारत मोबाइल फोन उत्पादन में दूसरे नंबर का देश बन गया है. इसका ज़िक्र हर जगह आया है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि जापान की कार कंपनी यहाँ आकर कार बना रही है. मोदी कार्यकाल में कौन सी जापान की कार बनाने वाली कंपनी आई है और उत्पादन कर रही है, इसकी जानकारी आप भी पता करें. डैटसन आई है मगर उसकी पेरेंट कंपनी निसान पहले से है.

प्रधानमंत्री लिस्ट दे सकते हैं कि कौन कौन सी कंपनी जापान से भारत आई है. उनके मंत्री ही बता दें. मारुति सुज़ूकी पहले से है जिसने अपना उत्पादन घटा दिया है. मीडिया में ज़रूर इस बात की रिपोर्ट मिली कि भारत से कार का निर्यात अच्छा है. मगर इसमें जापान की कंपनी का क्या रोल है, इस पर और स्पष्टता की ज़रूरत है.

प्रधानमंत्री अपने इंटरव्यू में साफ़ साफ़ की जगह तथ्यों को यहाँ वहाँ से मिला जुलाकर बोलते हैं. उनके हर बयान की जाँच करेंगे तो महीना गुज़र जाएगा. दुख भी होता है कि ये सब करना पड़ता है. इसीलिए कहता हूँ कि अखबार पढ़ने का तरीक़ा बदल लें. अख़बार पढ़ने से पढ़ना नहीं आ जाता है. वैसे भी अख़बारों में इस तरह से कोई रिसर्च छापता नहीं है.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फ़ेसबुक पोस्ट से हू-ब-हू लिया गया है.)

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