कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

राफ़ेल विवाद पर लीपापोती कर निकल गई सीएजी की रिपोर्ट- रवीश कुमार

सीएजी की रिपोर्ट में कीतमों का ज़िक्र नहीं है जैसा कि MiG29K की ख़रीद की सीएजी रिपोर्ट में दामों का ब्यौरा है.

वो ज़माना कुछ और था जब सीएजी ने 2 जी घोटाले में पौने दो लाख करोड़ के घोटाले की रिपोर्ट दे दी जो आज तक साबित नहीं हुई. तब यह आंकड़ा अखबार के पन्ने में एक किनारे से दूसरे किनारे तक छपा था. इस बार सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इतनी मेहरबानी तो की है कि गणित के मास्टर और बैंकर भी पैसे का हिसाब समझ नहीं पाएंगे. सीएजी ने ही जोड़ा, उसी के घटाया और उसी ने गुणा भाग किया.

विनोद राय ने इंटरव्यू दिया था कि चार लाख करोड़ का घोटाला था, हमने तो कम बताया. बताइये चार लाख करोड़ के घोटाले में दो लाख करोड़ घटा देने वाले विनोद राय उस वक्त ईमानदारों के मसीहा मान लिए गए.  किसी ने पूछा नहीं कि घटाया क्यों, किसी ने तब भी नहीं पूछा कि जितना बताया वो कहां गया.

जिन इकाइयों में रफाल विमान सौदे की गिनती की गई है उन्हें यहां रख दे रहा हूं. आप कोई समझ सकता है तो बताइये, नहीं बता सकते तो अपनी आंखों से देख लीजिए. फिर आगे सीएजी की रिपोर्ट पर मेरी टिप्पणी पढ़ने चल पड़िए.

“TR2” million €, “TR5” million €, “TR7” million €, “ST11” M€,“ST12” M€. , “AZ8” M€, “ASN” M€,“IS1” M€, “T” million €,` “XXZ”crore, “TIK” billion €. , ` “E(+)” crore ,` “H(+)” crore, ` “E” crore

क्या आपको कुछ समझ आया? लेख लंबा है मगर पढ़ लीजिएगा.

मार्च 2016 सीएजी रिपोर्ट

एच ए एल से हाक Mk 132 AJT एयरक्राफ्ट की सप्लाई की आडिट में जहाज़ की कीमतों का पूरा ब्यौरा है. रक्षा मंत्रालय की तरफ से कितने पैसे दिए गए और नहीं दिए गए इसे लेकर विस्तार से बताया गया है. रक्षा मंत्रालय ने एच ए एल के साथ 42 विमानों के लिए 1982 करोड़ का करार किया.

मार्च 2015 सीएजी रिपोर्ट

भारतीय नौ सेना के लिए नई पीढ़ी के MiG29K की ख़रीद की ऑडिट रिपोर्ट है. नई तकनीकि और नौ सेना की ज़रूरतों से लैस इस विमान को ख़रीदा जाना था. इसकी ऑडिट रिपोर्ट में सीएजी ने लिखा है कि भारत ने 16 MiG29K एयरक्राफ्ट और सहायक उपकरणों के लिए 3,568 करोड़ का करार किया है. पूरी रिपोर्ट में दाम के साथ चर्चा है.

2017-18 के लिए वायुसेनी का ऑडिट रिपोर्ट में सीएजी ने लिखा है कि 15 जनवरी 2019 और 6 फरवरी 2019 को रक्षा मंत्रालय ने इंटर-गवर्नमेंटल अग्रीमेंट की धारा-10 और 25 जनवरी 2008 को भारत और फ्रांस के बीच हुए करार का उल्लेख करते हुए पत्र भेजा है कि करार से संबंधित कई बातों का ज़िक्र नहीं हो सकता है.

इसलिए सीएजी की रिपोर्ट में कीतमों का ज़िक्र नहीं है जैसा कि MiG29K की ख़रीद की सीएजी रिपोर्ट में दामों का ब्यौरा है. सीएजी की रिपोर्ट में लिखा है कि दास्सों एविएशन और रक्षा मंत्रालय के बीच 15 साल जो बातचीत चली है उसे मार्च 2015 में रद्द कर दिया गया. अब यह बात मैं नहीं समझ सका कि पुरानी बातचीत जो रद्द हो चुकी थी उसकी गोपनीयता की शर्त नई बातचीत पर कैसे लागू होती है?

सीएजी ने क्या यह रिपोर्ट पांच दिन में तैयार की है? आपने देखा कि रक्षा मंत्रालय 6 फरवरी 2019 को पत्र लिख रहा है कि आप चुनिंदा चीज़ें नहीं बता सकते हैं. क्या सीएजी ने अपनी तरफ से इन शर्तों की कोई पुष्टि की या फिर जो रक्षा मंत्रालय ने पत्र भेज दिया उसी पर भरोसा कर लिया?

सीएजी सबसे पहले 2000 से मार्च 2015 के बीच की प्रक्रिया का ब्यौरा देती है. कम दाम में रफाल की पेशकश करने के कारण दास्सों से कहा जाता है कि वह लागत का ब्यौरा दे. इसके लिए रक्षा मंत्रालय की तरफ से सात अलग अलग श्रेणियों में लागत का ब्यौरा मांगा जाता है. रफाल रक्षा मंत्रालय की श्रेणियों के हिसाब से लागत का ब्यौरा नहीं देता है. सीएजी इस बात की आळोचना करती है. मगर इस रिपोर्ट से पता नहीं चलता है कि जब रफाल ने जब भारतीय शर्तों के अनुसार लागत का ब्यौरा नहीं दिया तो फिर उससे करार रद्द करने के बारे में क्यों नहीं सोचा गया.

क्योंकि इस डील के लिए राफेल के साथ यूरोफाइटर का भी चुनाव हुआ था. उसने जुलाई 2014 में 20 प्रतिशत कम दाम पर विमान देने की पेशकश की थी. रक्षा मंत्रालय ने सीएजी को बताया कि एक तो बिना मांगे प्रस्ताव लेकर आ गए और दूसरा उनके प्रस्ताव में भी कमियां थीं. क्या कमियां थीं इसका ज़िक्र नहीं है. ध्यान रहे कि क्षमता के पैमाने पर रफाल और यूरोफाइटर को समान रूप से बेहतर पाया गया था.

चलिए ठीक है कि यूरोफाइटर में कमियां थीं मगर दास्सों एविएशन दे ही नहीं रही थी. यही नहीं उसे भारत में 108 रफाल बनाने के लाइसेंस देने थे. मगर उसने कहा कि हम इस बात की गारंटी नहीं देंगे कि विमान का परफार्मेंस कैसा होगा. साथ ही हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड ने 109 विमान बनाने में कितने मानव घंटे लगेंगे, इसका हिसाब ठीक से नहीं लगाया. तो सीएजी के हिसाब से इन दो बातों के कारण पुरानी डील रद्द हो गई.

अब नई डील की बात होती है. कोई ज़िक्र नहीं है कि नई बातचीत में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड क्यों बाहर हो गई जबकि 10 अप्रैल 2015 को पेरिस में हुए एलान की शर्तों के अनुसार मेक इन इंडिया पर भी ज़ोर देना था.

मार्च 2015 में पुरानी डील समाप्त हो जाती है. अप्रैल 2015 में नई डील का एलान हो जाता है. 12 मई 2015 को इंडियन निगोशिएशन टीम का गठन होता है. इसमें यह साफ नहीं है कि पुरानी प्रक्रिया की शर्तें लागू होंगी कि नहीं. मेरा मतलब है सौदे से संबंधित कुछ बातों को न बताने की शर्तों से है. जिसे रक्षा मंत्रालय ने 6 फरवरी 2019 को सीएजी को बताया. इस पर मेरा ध्यान अटक गया है.

खै़र इंडियन निगोशिएटिंग टीम के तीन सदस्यों के एतराज़ की खबर आपने द हिन्दू अख़बार में पढ़ी थी. जिसमें इन सदस्यों ने सवाल उठाया है कि डील से भ्रष्टाचार विरोधी शर्तों को क्यों हटाया गया. जबकि अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सुरक्षा मामलों की कमेटी ने मंज़ूरी दी थी. मगर सितंबर 2016 में रक्षा मंत्रालय अपने स्तर पर बैठक कर भ्रष्टाचार विरोधी शर्तों को हटा देता है. इसके बारे में सीएजी चुप है.

सीएजी ने कीमतों के मामले को जटिल बना दिया है. यह कहते हुए कि 126 विमान की कीमत की तुलना 36 विमान की कीमत से नहीं हो सकती है. मगर सीएजी को किसने रोका था कि कतर से लेकर मिस्र को किस भाव में विमान दिया गया, दास्सो एविएशन अपनी सालाना रिपोर्ट में विमान की कीमत बताती है. ये रिपोर्ट सार्वजनिक बताई जाती है. तो सीएजी ने इस बात का सहारा क्यों नहीं लिया?

वित्त मंत्री कहते हैं कि 2007 के करार और 2015 के करार के बीच कई तकनीकि बदलाव आ चुके थे. इस लिहाज़ से बेहतर तकनीकि से लैस विमान कम दाम में खरीदे गए. इस डील को विस्तार से कवर करने वाले पत्रकार अजय शुक्ला कहते हैं कि तकनीकि मामले में कोई बदलाव नहीं आया है. उसी तकनीकि पर विमान खरीदा गया है. इस लिहाज़ से पुरानी चीज़ नए दाम पर ली गई तो भारत को घाटा हुआ है.

अब आते है बैंक गारंटी, संप्रभु गारंटी और एस्क्रो अकांउट वाली बात पर. सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि फ्रांस और दास्सो शुरू से तीनों से इंकार करते रहे. कंपनी का तर्क था कि बैंक गारंटी देने पर बैंक चार्ज देना पड़ेगा जो कई मिलियन यूरो होगा. हालांकि भारतीय पक्ष का मानना था कि जो दास्सों रेट बता रहा है उससे काफी कम पर ब्याज़ देना पड़ेगा.

अब कहा जा रहा है कि बैंक गारंटी नहीं देने से दास्सों के मिलियन डालर बच गए. किसी किसी मीडिया रिपोर्ट में दास्सों को 500 करोड़ से अधिक का फायदा बताया गया है. अजय शुक्ला कहते हैं कि इन सब रियायतों को जोड़ लें तो दाम कम नहीं हुए हैं.

ये और बात है कि 2.5 प्रतिशत अधिक दाम पर खरीदने की बात पर वित्त मंत्री जेटली भी सहमत नहीं हैं. राहुल गांधी का आरोप है कि मोदी सरकार के मंत्रियों ने 9 से 20 फीसदी कम दाम पर रफाल खरीदने का दावा किया था. अब तो 2.5 फीसदी अधिक दाम पर खरीदने की पुष्टि हो गई.

दिक्कत ये है कि इससे न तो सरकार संतुष्ट है और न ही विपक्ष. विपक्ष को लगता है कि महंगे दामों में रफाल खरीदने का उसका आरोप सही साबित हुआ, वित्त मंत्री कहते हैं कि अगर सब कुछ जोड़ा जाए तो विमान सस्ता ही खरीदा गया है. सच्चाई यह है कि इस रिपोर्ट के अनुसार सस्ता और महंगा होने का किसी का भी दावा 2.5 प्रतिशत के करीब नहीं है.

सीएजी की रिपोर्ट पढ़ते हुए साफ लगता है कि फ्रांस की कंपनी दास्सो एविएशन अपनी शर्तों पर डील कर रही है. पहले दास्सों भारतीय शर्तों के अनुसार रक्षा मंत्रालय को लागत नहीं बता रही थी, अब भारत पर शर्त डाल रही है कि अपनी जनता को भी दाम नहीं बताना है. कमाल की कंपनी है. बैंक गारंटी की बात से इंकार कर जाती है. तो यह डील क्यों हुई?

अब आते हैं विविद होने की स्थिति में. अगर दो देशों के बीच करार था तो विवाद होने की स्थिति में फ्रांस की सरकार को गारंटी देनी चाहिए थी. फ्रांस ने बैंक गारंटी नहीं दी. कानूनी झगड़ा होगा तो मुकदमा भारत और दास्सों एविएशन के बीच होगा. भारत जीत गया और दास्सों ने हर्जाना नहीं दिया तो फिर भारत केस लड़ेगा। तब जाकर फ्रांस की सरकार पैसा दिलाने का प्रयास करेगी.

भारत की संप्रभुता और स्वाभिमान को दांव पर लगा कर रफाल विमान के लिए करार क्यों हुआ?

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