कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

देशहित के लिए ज़रूरी है आरबीआई की स्वायत्तता- रघुराम राजन

रघुराम राजन ने कहा, “एक बार किसी गवर्नर या डिप्टी गवर्नर की नियुक्त की जाती है, उसके बाद सरकार को उनकी बातें सुननी चाहिए.”

हाल के कुछ साक्षात्कारों में रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सुर्ख़ियों में छाए रहने वाले कई मुद्दों पर बात की है. इनमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के नकदी संकट, आरबीआई के स्वायत्तता के सवाल और मुख्यतः प्रधानमंत्री कार्यालय को फरवरी, 2015 में भेजी गई बकायादारों की सूची जैसे मुद्दे शामिल थे.

उनके साक्षात्कारों के कुछ महत्त्वपूर्ण हिस्से निम्न प्रकार से हैं:

  • डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के भाषण के संदर्भ में रघुराम राजन ने कहा, “एक बार किसी गवर्नर या डिप्टी गवर्नर की नियुक्त की जाती है, उसके बाद सरकार को उनकी बातें सुननी चाहिए.” ग़ौरतलब है कि विरल आचार्य ने कहा था कि जो सरकारें केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को कमज़ोर करते हैं, उन्हें ‘वित्तीय बाज़ारों के संकट को झेलना पड़ता है’.
  • “यह देश के हित में है कि जहां तक संभव हो सके हम रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता एवं परम्पराओं का सम्मान करें.”
  • “मुझे लगता है कि सरकार और आरबीआई के बीच पुराना रिश्ता रहा है और आरबीआई का ना कहना कोई नई बात नहीं है. सरकार पूछती रह सकती है और कह सकती है कि इस पर विचार करें या उस पर विचार करें, लेकिन किसी एक स्थिति पर पहुंचकर वह कहती है कि ठीक है हम आपके फैसले का सम्मान करते हैं. आप वित्तीय स्थिरता के नियामक हैं और मैं पीछे हट रहा हूं.”
  • “अगर धोखाधड़ी के मामलों में सज़ा नहीं होगी, तो वह और भी धोखाधड़ी को प्रोत्साहित करेगी. अगर ऐसा एक माहौल बनता है कि पृथ्वी में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां आप छिप सकते हैं, क्योंकि कानून के लम्बे हाथ आप तक पहुंचेंगे, तो मुझे लगता है कि यह एक शक्तिशाली सन्देश देगा.”
  • “मैं इसमें हुए बदलाव को लेकर चिंतित हूँ क्योंकि ऐसा माना जाता है कि वे (आरबीआई बोर्ड) समझदार लोग हैं जो और बड़े मतभेद तैयार करने के बजाय मतभेदों को कम करते हैं. बोर्ड में श्रेष्ठ लोग रहे हैं और अब भी उसमें बहुत अच्छे लोग हैं….मुझे नहीं लगता कि भारत में केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच वार्ता में कोई व्यवधान आना चाहिए.”
  • “यहां एक मसला है ऐसे कुछ व्यवसायी जिनके बारे में बैंक ऐसा मानते है कि सामर्थ्य होने के बावजूद वे लोग अपने ऋण नहीं चूका रहे हैं और अंत में एक अर्ध न्यायिक प्रक्रिया के ज़रिये उन्हें बकायादार घोषित कर देते हैं. मुझे कानून के बारे में इतनी समझ नहीं है कि मैं यह समझ सकूं कि एक न्यायिक प्रक्रिया से गुज़रने के बावजूद क्यों उन नामों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. लेकिन, यह मसला कानूनी दुनिया का है और ऐसी किसी चीज़ का नहीं जिसमें मेरी विशेषज्ञता है.”

(उपरोक्त सभी उद्धरण सीएनबीसी-टीवी18 और ईटी साक्षात्कारों से लेकर अनूदित किए गए हैं.)

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