कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नए दशक की शुरुआत में देश की असल भावना को बचाने की जरूरत

इस समय की मांग है कि हम अपनी ज़मीर को फिर से जिंदा करें.

बीते दिसंबर में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन तेज हुआ. उस समय परिस्थितियां मिनट दर मिनट बदल रही थीं. हमारे लिए यह तय कर पाना मुश्किल था कि देश किस दिशा में जा रहा है. विरोध-प्रदर्शनों की पहली ख़बर विश्वविद्यालयों से आई और जल्दी ही देश के अलग-अलग शहरों में भी रैलियों-प्रदर्शनों का आयोजन होने लगा.

इन विरोध-प्रदर्शनों के बीच हर्ष मंदर के नेतृत्व में बनी कारवां-ए-मोहब्बत की हमारी टीम को अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का एक ऑडियो रिकॉर्डिंग मिला. इसमें उन्होंने संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया था. इसी क्लिप में गायक टीएम कृष्णा की भी रिकॉर्डिंग थी, जिसमें बेहद खूबसूरती और अलग अंदाज में राष्ट्रगान को गाया गया था.

टीएम कृष्णा ने मुझसे बताया, “नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में मुझे जो चीज सबसे शानदार लगी वो यह कि देश के युवा हर रोज सड़कों पर उतर कर संविधान की प्रस्तावना पढ़ रहे थे. तमिल, मलयालम, हिन्दी और उर्दू जैसी तमाम भाषाओं में प्रस्तावना पढ़ी गई. मैंने पहली बार देखा कि प्रस्तावना हमारी किताबों से निकलकर सवाल पूछने का एक जरिया बन रहा है. प्रस्तावना में लिखी गई बातें अब सिर्फ शब्द भर नहीं रह गए थे, बल्कि इसने एक आंदोलन को दिशा देने का काम किया.”

आगे टीएम कृष्णा ने कहा, “इन प्रदर्शनों से दूसरी चीज यह हुई कि संविधान की प्रस्तावना में लिखी गई 26 नवंबर 1949 की तारीख भी प्रदर्शन वाली तारीख में बदल गई. इससे प्रभावित होकर मैंने नसीरुद्दीन शाह से संपर्क किया कि हम अपनी तरफ से इन प्रदर्शनों में क्या कर सकते हैं. तय हुआ कि हम भी संविधान की प्रस्तावना पढ़ेंगे. प्रस्तावना के साथ-साथ राष्ट्रगान को गाना तो अनिवार्य था ही. हम प्रस्तावना और राष्ट्रगान के हरेक शब्द को उसकी असल भावना के साथ पढ़ना चाहते थे.”

नसीरुद्दीन शाह और टीएम कृष्णा की ऑडियो रिकॉर्डिंग को हमने कारवां मीडिया टीम की सीनियर एडिटर अपर्णा रॉय के हवाले किया. प्रस्तावना और राष्ट्रगान की भावनाओं को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश में अपर्णा जुट गईं. कारवां-ए-मोहब्बत की हमारी टीम में हर उम्र के लोग हैं. यूनिवर्सिटी से अभी-अभी पास हुए छात्र भी हैं और मीडिया के क्षेत्र में लंबा अनुभव रखने वाले दिग्गज भी. हम बंधुता और प्रेम बढ़ाने वाले वीडियोज़ पूरे साल बनाते रहते हैं. अपनी शॉर्ट स्टोरीज़ के जरिए हम उन लोगों की कहानियों को सामने लाते हैं जो हमारे आसपास ही होते हैं, लेकिन कभी सामने नहीं आ पाते. कई दिनों तक अपर्णा ने इन वीडियोज़ और देशभर में प्रदर्शन की तस्वीरों को खंगालकर एक वीडियो तैयार किया.

अपर्णा द्वारा तैयार किए गए वीडियो का फाइनल एडिट देखकर मैं हैरान रह गई. ऐसा लग रहा था कि इसमें शामिल सभी पात्र एक समान हैं. छत्तीसगढ़ के कुनरा के अमानुल्लाह खान की तस्वीर इसमें थी. अमानुल्लाह अपने शहर में होने वाले रामलीला में रावण का किरदार बड़े इत्मिनान के साथ निभाते हैं. पुरानी दिल्ली के होली ट्रिनिटी चर्च में उर्दू भाषा में बाइबिल का पाठ करने वाली जॉर्जिना लज़र का वीडियो भी था. एनआरसी का अभिशाप झेल रहे असम के चार द्वीप में पैदा हुए लोगों का दृश्य भी फिल्माया गया था. देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें भी इस वीडियो में थी. विरोध-प्रदर्शन को दबाने के लिए राज्य प्रायोजित हिंसा को भी इसमें देखा जा सकता है.

थोड़ी घबराहट और बहुत सारी उम्मीद के साथ 2019 के आख़िरी हफ़्ते में हमने यह वीडियो यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर डाले. कुछ ही घंटे के भीतर 3 मिनट के इस वीडियो ने ऐसी पहचान बनाई कि कई समाचार वेबसाइट ने इस पर ख़बर बनाया और एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में इस पर विस्तृत चर्चा हुई. एनडीटीवी ने विशेष बातचीत के लिए गायक टीएम कृष्णा को बुलाया था.

वीडियो के ऑनलाइन लोकप्रिय होने के बाद हमने टीएम कृष्णा से बात की. उन्होंने कहा, “जब संविधान की प्रस्तावना को हम राष्ट्रगान के साथ बार-बार सुनते हैं तो यह एक अलग अंदाज में मिलता है. आपको एहसास होता है कि हमारे संविधान और संस्कृति का सिद्धांत एक हीं है. ये दोनों मानवता और समभाव पर आधारित है.”

अपने फ़ेसबुक टाइमलाइन पर इस वीडियो को शेयर करते हुए पत्रकार नदीम असरार ने लिखा, “यह शानदार है कि मुसलमानों की बहुलता वाले इस आंदोलन में गंगा-जमुनी तहज़ीब वाले भारत को बचाने की बात हो रही है और संविधान की प्रस्तावना को आंदोलन का केंद्र बनाया गया है.” एक सहयोगी ने मुझे इस फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट भेजा था.

मैंने ये स्क्रीनशॉट अपनी पुरानी दोस्त अपर्णा रॉय को दिखाया. अपने काम की सफलता से हम काफी उत्साहित हुए.

टीएम कृष्णा से बातचीत में मुझे एक चेतावनी और उम्मीद दोनों की झलक दिखी थी. उन्होंने कहा था, “1970 के दशक में मिडिल क्लास परिवारों में पैदा हुए लोग राजनीतिक और सामाजिक मामलों में काफी निष्क्रिय थे. जबकि हाशिए पर खड़े लोगों ने सत्ता से हमेशा ही कठिन सवाल पूछे.”

उन्होंने आगे कहा, “सच यह है कि हमारी हर गतिविधि राजनीतिक है. चुप रहना भी एक राजनीति है. तटस्थता भी एक अलग तरह की राजनीति है. हमें तटस्थता से बाहर निकलकर खुद को राजनीतिक प्राणी मानना ही होगा.”

टीएम कृष्णा ने आगे कहा, “इन विरोध प्रदर्शनों में हम जिस तरह की विविधता देख रहे हैं, वह बेमिसाल है. प्रदर्शन में शामिल लोग हमें राजनीतिक कल्पनाशीलता सिखा रहे हैं. जब तक आप कुछ कल्पना नहीं करते हैं तब तक कोई नया काम करने की हिम्मत आपके भीतर नहीं आती. प्रदर्शन में शामिल युवाओं के विचार और उनके काम हमें एक कल्पना देकर प्रेरित करते हैं.”

दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में करीब 20 दिनों से महिलाएं धरने पर बैठी हैं. टीएम कृष्णा से बातचीत के दौरान इन महिलाओं का जिक्र भी हुआ. दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से लोग इन महिलाओं से प्रेरणा लेने शाहीन बाग आते हैं. इस प्रकार हम देख रहे हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून और प्रस्तावित एनआरसी के विरोध को लोग एकजुटता के जश्न के रूप में मना रहे हैं.

टीएम कृष्णा ने कहा, “प्रदर्शन में शामिल ग़ैर-मुस्लिम लोग बहुत हद तक सुरक्षित हैं. मुसलमानों ने तो अपनी सुरक्षा, अपना जीवन सबकुछ दांव पर लगा दिया है. इस समय की मांग है कि हम अपनी ज़मीर को फिर से जिंदा करें.”

नताशा बधवार

(नताशा बधवार फिल्म निर्माता हैं. इन्होंने “माय डॉटर्स मम” और “इमोर्टल फॉर अ मोमेंट” की रचना की है. यह लेख अंग्रेजी भाषा में लाइव मिंट में प्रकाशित है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

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