कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

स्वयंसेवक की किस्सागोई- तोते की जान गुजरात में फंसी है

नरेन्द्र मोदी के पॉलिटिकल नैरेटिव ही सकारात्मक-नकारात्मक हो कर चल रहे हैं । दूसरा कोई नहीं है । संघ भी नहीं ।

तो गर्म गर्म चाय । ग्रीन टी का जायका और उस पर चाय लाते हुये स्वयसेवक की टिप्पणी । गुजरात चाहे देश ना हो लेकिन देश के तोते की जान तो गुजरात में ही फंसी है ।

इस बार मै कुछ बोलता उससे पहले ही प्रोफेसर साहेब जो डीयू के एक कॉलेज के प्रिंसिपल हैं वही बोल पडे़ । आपने तोता शब्द क्यों कहा ।
क्यों !
बाज या चील भी कह सकत थे ।

तो फिर आप ही सोच लिजिये …..क्या कहना है । स्वयसेवक कुछ सख्त लहजे में बोले लेकिन यहा बात प्रसून वाजपेयी जी पक्षियों की नहीं कर रहे है । हम और वो बैठे है देश के हालात पर चर्चा करने । तो आप यहा प्रोफेसरी के नजरिये से हालात को ना परखे ।

अरे छोड़िये…मुझे बीच में कूदना पडा ।

केशुभाई । लालजी भाई । संजय जोशी । प्रवीण तोगड़िया । कितने भी नाम ले लीजिये और इस फ़ेहरिस्त में हरेन पांड्या की हत्या या सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर को भी याद कर लीजिये । लेकिन इन नामो के आसरे घटनाओ की नहीं बल्कि इन्ही दिल्ली तक पहुंचने की सीढ़ी के तौर पर समझें और फिर सियासी चालो का जिक्र करना चाहिये ।

मतलब…

मतलब यही कि अतित की सियासी चालों ने ही मौजूदा सियासी परिणामो को पैदा किया है । और आने वाले वक्त में हालात ठीक हो जायेगें…मेरा भरोसा इससे डिग गया ।

अरे आप भी उम्मीद खो देगें । तो फिर संघ के होने या ना होने का मतलब भी तो खत्म हो जायेगा ।

मुझे नहीं पता मौजूदा वक्त में आप संघ का मतलब क्या समझते हैं । लेकिन इस हकीकत को समझे कि संस्थानों का खत्म होने की बात जो आप कहते हैं । या लगातार टीवी पर बोलते रहे उस दिशा में क्या आपने कभी सोचा है कि स्थिति रिजर्व बैक तक पहुंच जायेगी । और ये भी आपने सोचा है एक तरफ सत्ताधारी बीजेपी के पास नान डिजटिललाइज रकम की भरमार होगी और दूसरी तरफ सरकारी खजाने में पैसा ही नहीं होगा । तो सरकार रिजर्व बैक से कहेगी…..जनता का जमा रुपया जो इमरजेन्सी सरीखे हालात के लिये रखा होता है उसे दे दो ।

आप भी गोल गोल बात कर रहे है । सरकार तो मना कर रही है कि रिजर्व बैक की रिजर्व रकम में से उसने कुछ मांगा है ।

तो फिर इंतजार किजिये । 19 नवबंर का । देखिये बैठक में क्या क्या होता है । और अगर आपमे बहुत ज्यादा संयम है तो फिर जनवरी में पेश होने वाले इक्नामिक सर्वे का इंतजार कीजिये . तब पता तलेगा कि सरकारी खजाने की रकम कहां कहां उड़ाई गई ।

देखिये मैने शुरु में ही कहा गुजरात का मतलब देश नहीं होता या फिर देश गुजरात हो नहीं सकता । किसी राज्य में ऐसा इक्नॉमिक मॉडल काम कर सकता है कि सीएम निर्णय लें और तमाम संस्थान उसी दिशा में काम करने लगें । पर देश के साथ ऐसा करने से खिलवाड़ होगा ।

अगर ऐसा हो रहा है तो फिर आप रोकते क्यों नहीं । या फिर संघ के भीतर से ही बीजेपी के उन सदस्यो को क्यों नहीं कहा जाता कि आप तो आवाज उठाइये ।

मेरे ये कहते ही प्रोफेसर साहेब बोल पडे़….और बीजेपी तो सांगठनिक पार्टी है । संगठन महत्वपूर्ण है । उसके सरोकार जनता से जुडे रहे है । संघ की ट्रेनिंग भी है ।

आप दोनों ये सोच सकते हैं । आप ही बताइये । बीजेपी में महासचिव कौन है । या फिर बीजेपी में राष्ट्री नेता की छवि किसकी है । कोई नाम आपकी जुबा पर आयेगा नहीं । गुजरात माडल में गुजरात के ही पुर्जे लगे हुये हैं । चाहे वह कारपोरेट हो या व्यापारी । नेता हो या नौकरशाह । पर इसकी बारिकी ऐसे नहीं समझेगें ।

मै आपको एक उदाहरण देता हूं । जब दिल्ली में बीजेपी का नया हेडक्वाटर बना तो सभी को आंमत्रित किया गया । लेकिन जैसे ही पीएम का काफिला पहुंचने को हुआ तो संघ के वरिष्ट हो या बीजेपी को खड़ा करने वाले वरिष्ट सभी की गाड़िया सड़क पर ही रोक दी गई । हम भी एक गाड़ी में बैठे थे । एक शख्स ने बाहर से शीशे के पार हमें देखा तो रुक गया । जाना पहचाना था तो मैने ही सवाल किया । हमारा नया कार्यलय बना है । कैसा है । तो सवाल खत्म होने से पहले ही वह टूट पड़ा और सीधे बोला , कार्यालय हमारा कैसे हो गया । क्यों ये तो बीजेपी का ही हेडक्वाटर है । बीजेपी हमारा राजनीतिक दल है । ठीक है । लेकिन हमारी तो एक भी ईंट इस कार्यालय में नहीं लगी है । ये बात मेरे दिमाग में बैठ गई ।

कुछ दिनों बाद एक राज्य के मंत्री मुझसे मिलने आये और बताने लगे कि राजधानी में बीजेपी का नया दफ्तर बन चुका है । तो मैने पूछा , कैसा दफ्तर बना है । तो वह बोला आलीशान । तो मैने कहा पैसा कहा से आया है । पैसा तो केन्द्र से आया है । तो फिर दफ्तर पार्टी का हुआ कि केन्द्र का ।

आप किस राज्य के किस मंत्री की बात कर रहे हैं।

अरे वाजपेयी जी …..आप पत्रकार हैं ये आप पता कीजिये । मै तो सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं और हालात बता रहा हूं । क्योकि उसके बाद उस मंत्री ने कहा मै अपने जिले में बीजेपी का दफ्तर बना रहा हूं ….लेकिन मै आपकी बात समझ गया । जनता से चंदा लेकर दफ्तर बनाउगां ।

प्रोफेसर खुद को रोक ना पाये तो बोले ….तो आप मान रहे है बीजेपी के जन-सरोकार खत्म हो चले है ।

ये आप कहिये । बात रिजर्व बैक की निकली है तो मै अब सियासी जरुरत और पार्टी के तौर तरीको का जिक्र कर रहा हूं ।

तो संघ इस सवाल को क्यों नहीं उठाता है कि सिय़ासत रुपयो से नही चलती ।

अब ठीक पकड़ा आपने वाजपेयी जी ….ये सवाल तो उठेगें । कल ही तो कर्नाटक उपचुनाव के रिजल्ट आये हैं । बेल्लारी में तो खूब पैसा है । पार्टी के पास भी । उम्मीदवार के पास भी । पिछली बार बीजेपी 70 हजार वोट से जीती थी । पर इस बार करीब ढाई लाख मतो से चुनाव हार गई । तो पैसा और बूथ मैनेजमेंट कहा गया । किसी ने सवाल उठाया । फिर शिमोगा में तो रुपया के साथ बूथ मैनेजमेंट भी जबरदस्त था । लेकिन सिर्फ 26 हजार वोट विपक्ष को मिल जाते तो लोकसभा की ये सीट भी हाथ से निकल जाती ।

अरे आपका विश्लेषण तो 2019 में बीजेपी के बिगडे़ हालात को दिखा रहा है ।

मै इसे बीजेपी नहीं कहूंगा ।

क्यों

क्योकि बीजेपी इस तरह कभी भी एक दो या तीन व्यक्ति की पार्टी में नहीं सिमटी । और जो आप संघ का जिक्र बार बार करते हैं । तो ये भी समझ लिजिये । जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने राजनीतिक दल बनाने की बात कही तो गुरु जी ने शुरु में ये कहकर खारिज कर दिया था कि संघ में सभी बराबर होते है । और राजनीतिक दल में आप खुद को ही लीडर मान रहे हैं तो फिर राजनीतिक दल क्यों बनेगा । इसीलिये दो साल का वक्त लग गया था जनसंघ को बनाने में ।

तब तो ये भी कहा जा सकता है कि अब तो संघ हो या बीजेपी दोनो का रास्ता सिर्फ नेरन्द्र मोदी की सत्ता कैसे बरकरार रहे उसी दिशा में काम करते हुये दिखायी देना है ।

ये आपने ठीक कहा । दिखायी देना है ।

यानी ?

यानी…. कि जीत हार सत्ता की होनी है । जिसका चेहरा नरेन्द्र मोदी है । और ये उन्हीं की नीतिया है जिसमें बीजेपी से जुड़ा व्यापारी भी परेशान है और कार्यकत्ता अपनी हैसियत सत्ता के निकट होने या दिखाने में लगा है ।

आप ठीक कह रहे हैं । वाजपेयी जी की अस्थि विजर्जन के वक्त भी सिर्फ दो लोगो की तस्वीर दिखायी । एक प्रधानमंत्री दूसरे बीजेपी अध्यक्ष । तब मेरे जहन में ये सवाल था कि क्या वाजपेयी जी के निधन के साथ राजधर्म की परिभाषा बदल गई । मैने उस वक्त इस पर लिखा भी था ।

जी मैने पढ़ा था ….आपका लिखा हुआ ।

लेकिन क्या से हमारी सफलता नहीं है कि वाजपेयी को जितने जोर से बीजेपी या सत्ता कह पायी उससे ज्यादा जोर से काग्रेस ने वाजपेयी को अपने करीब बताया ।

न न आप इसे संघ की सफलता ना मानिये । प्रोफेसर साहेब कुछ गुस्से में बोले । दरअसल वाजपेयी जी के उलट मोदी को जिस तरह संघ ने मान्यता दी है। और बीजेपी सत्ता के लिये मोदी की आगोश में सिमटी है , उसमें काग्रेस को पहली बार समझ में आ रहा है कि हिन्दु वोट बैक में सेंघ लगाना जरुरी है । और मोदी को ही बीजेपी के खिलाफ बताना जरुरी है । इसीलिये राहुल गांधी भी मंदिर जाने में होड दिखा रहे है और मोदी के कड़क मिजाज को वाजपेयी से अलग दिखा रहे है ।

तो मै भी यही कह रहा हूं ….

नहीं मेरा कहना है नरेन्द्र मोदी के पॉलिटिकल नैरेटिव ही सकारात्मक-नकारात्मक हो कर चल रहे हैं । दूसरा कोई नहीं है । संघ भी नहीं ।

पर हम बात नरेन्द्र मोदी की नहीं मौजूदा हालात को लेकर कर रहे है । मुझे टोकना पड़ा ।

ठीक कह रहे है ..लेकिन सत्ता के बगैर नेता की कोई पहचान होती नहीं । ये बीजेपी के भीतर हर कोई जानता समझता है । मुश्किल ये जरुर है कि संघ को भी लगने लगा है कि सत्ता के बगैर उसके सामने भी मुस्किल होगी तो सत्ता केन्द्र में होगी ही । और सत्ता का मतलब जब मोदी जी हैं तो फिर बात तो उनकी होगी ही ।
लेकिन सवाल तो यही है कि रास्ता सही है । गलत है । विजन की कमी है । या विजन जबरदस्त है ।

मुझे और प्रोफेसर साहेब को तो नहीं मेरे इस सवाल से स्वयसेवक ही ठहाका लग हंस पडे । …..बोले , ये बात गंभीर है , लेकिन इस दौर में हंस कर कहनी होगी, भारत की इकोनॉमी जब मजबूत नहीं थी तब इंदिरा गांधी अमेरिका से दो दो हाथ करने को तैयार थी । और आज जब हमारी इकोनॉमी मजबूत है तब सत्ता भारत को अमेरिका की कॉलोनी बनाने की दिशा में विदेश नीति को ले गये । इससे ज्यादा बुरे हालात क्या हो सकते है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन हमने ही खत्म कर दिया । यानी जिसके जरिये दुनिया के ताकतवर देशों से हम सौदेबाजी कहे या जवाब देने की स्थिति में आते उसे हमने ही खत्म कर दिया । पड़ोसियो को साथ लेकर चलने के लिये सार्क है । हमने उसे भी ठप कर दिया । तो पड़ोसियो से संबंध है या दुनिया के ताकतवर देशों के सामने भारत की हैसियत….क्या है । इसका विशलेषण आप कीजिये । क्योंकि अब के दौर में फिर से विदेश नीति का मतलब बिजनेस हो चला है । और भारत खुद को बाजार मान कर अपनी ताकत को डालर के सामने खत्म कर रहा है ।

वह कैसे । क्या आप स्वदेशी का जिक्र कर रहे है …..

बिलकुल , जरा सोचिये हमारा मिसाइल कार्यक्रम कहां है । राफेल ने तो हिन्दुस्तान एयरोनाटिकल लि यानी एचआईएल को कमजोर करने के हालातों को उभार दिया । देखिये मुश्किल ये नहीं है कि दुनिया के किस ताकत के साथ हम खडे़ होते है । मुश्किल तो ये है कि हमारी ताकत क्या है । पाकिस्तान चीन की कॉलोनी बन चुका है । यानी आर्थिक तौर पर पाकिस्तन पूरी तरह चीन पर निर्भर है । नेपाल , बांग्लादेश , मालदीव और अब तो श्रीलंका में भी जिस तरह संसद को भंग इसलिये किया जा रहा है कि चीन के प्रजोक्ट को आगे बढञाया जाये । और श्रीलंका के राष्ट्रपति सिरीसेना जिस तरह खु ले तौर पर भारत के खिलाफ है । उसके मतलब मायने आप क्या निकलेगें ।

आप ठीक कह रहे है …क्योंकि मुझे भी लगता है कि दुनिया फिर से प्रथम विश्वयुद्द वाले हालात की तरफ है । जब युद्द कालोनी यानी उपनिवेश को लेकर हुये । हालाकि उसके बाद शीत युद्द ने हालात बदले लेकिन फिर से उपनिवेश बनाने की ही दिशा में दुनिया के ताकतवर देश बढ़ चले है । लेकिन हमारा सवाल तो भारत को लेकर है । उसका विजन क्यों डगमगा रहा है ।

सवाल सिर्फ विजन का नहीं है…और ना ही सिर्फ सत्ता का है या बीजेपी का है । वाजपेयी जी आप ही बताईये मीडिया की भूमिका ही क्या है । आप लोगो ने कभी सेना को लेकर स्टैडिंग कमेटी की रिपोर्ट को दिखाया । खंडूरी जी या जोशी जी ने रिपोर्ट में भारतीय सेना को लेकर क्या लिखा है । दुनिया भर में सवाल है । सेना भी हालात समझ रही है । लेकिन देश के लोगो तक मीडिया ही रिपोर्ट नहीं पहुंचा पायी । जबकि वह संसद में रखी जा चुकी है । इसलिये मुश्किल सिर्फ विजन का नहीं बल्कि तथ्यों की जानकारी तक लोगो तक नहीं पहुंच पा रही है । जिम्मेदारी क्या सिर्फ सत्ता की हैा

लगातार खामोश प्रोफेसर साहेब से रहा नहीं गया …..इसके लिये दूर क्यों देखना चाहे है । नेहरु मेमोरियल व म्यूजियम के नये सदस्य या निदेशक को ही देख लींजिये । जो सत्ता के करीब हैं या उसके बोल बोल सकता है वही नेहरु मेमोरियल चलायेगा । अब आप ही बताइये वहा कौन रिसर्च करेगा या रिसर्ज के लिये ग्रांट किसे मिलेगा । जाहिर है जब विचार नहीं सोच नहीं बल्कि संबंधो और अपने होने वालो को रिसर्च सेंटर सौप देगें तो फिर कौन सी सोच देश में विकसित होगी । और जो रिसर्च करने पहुंचेगे या जिन्हे ग्रांट मिलेगा वह तो वहां बैठ कर कुछ भी कर लें…..देश के सामने कोई विजन आयेगा कैसे । और सत्ता ही जब काबिलियत को दरकिनार कर सिर्फ इस आधार पर चलती है , वह हमारा आदमी है और हम सत्ता में नहीं भी रहेगें तो भी हमारी सोच जिन्दा रहेगी । तो फिर देश है कहां । मै बताऊ दिल्ली यूनिवर्सिटी में दो दर्जन कालेजो में प्रिसिपल नियुक्त हुये । एक या दो को छोड़ दीजिये बाकि सभी की क्वालिफिकेशन यही रही कि उसके संबंध बीजेपी या संघ से रहें ।

प्रोफेसर साहेब बात तो सही कह रहे है ….मेरा मत तो यह भी है कि बीजेपी या संघ के पास इन्टलेचलुल्स है ही नहीं । और जो इन्टेलेक्चलुल्स हैं बीजेपी या संघ दोनो को लगता है कि ये या तो काग्रेसी है या फिर वामपंथी । तो इसी शून्यता को भरने के लिये बीजेपी सत्ता कोर्स बदलने में लग जाती है । कभी चैप्टर बदलती है तो कभी पूरा सिलेबस । और नई नई लकीरे खिंच कर वह खुद को ज्ञानी कैसे मनवा लें सारी मेहनत इी में लगा जाती है ।

नहीं से पूरा सच नहीं है । संघ तो सास्कृतिक मूल्यों और भारत के स्वर्णिम इतिहास को भी देखता समझाता है ।

अच्छा … तो फिर मोदी सत्ता ने स्वदेसी माडल क्यों नहीं अपनाया । गांव को स्मार्ट बनाने की क्यों नहीं सोची । मंडियो में सिमटे देश में डिजिटल के गीत क्यों गाने लगे । तक्षशिला-नांलदा का शिक्षा माडल क्यों नहीं अपनाया । साधु संतो के जरीये मूल्यों का ज्ञान दिलवाने के बदले राम मंदिर के राग में सभी को क्यों फंसा दिया । भगवा बिग्रेड तले गौ रक्षा से लेकर भीड़तंत्र वाले हालात पैदा क्यों कर दिया । बनारस को क्योटो बनाने की दिशा में क्यों बढ़ने दिया ।

अब इतने सवालो का जवाब तो नहीं दिया जा सकता है । लेकिन हमारे सामने खुद की नीतियों के असफल होने का संकट है ये मै मान रहा हूं । मुझे लगाता है बहुत अतित में ना जाकर अभी के हालात को समझे ….आखिर संकट क्या है । क्योकि नरेन्द्र मोदी इस बार जापान से क्या लेकर लौटें । आपने देखा इस बार ज्यादा शोर नहीं मचा ।

क्यों
जी , इसलिये क्योकि पहली बार जापान ने भी काशी को क्योटो बनाने । बुलेट ट्रेन बनाने और दिल्ली – मुबई के बीच इक्नामिक कारीडोर बनाने को लेकर भारत से कुछ सवाल किये है ।

कैसे सवाल…..

बताते है पहले आप लोगों के लिये कुछ नाश्ते की व्यवस्था करे शाम भी ढलने वाली है ।

जारी………..

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