कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

संघ प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा झूठ- आज़ादी के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने निकाली थी तिरंगा यात्रा

अजीब बात यह है कि आरएसएस ने कभी भी तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार ही नहीं किया।

जनता के सवाल:

प्रश्न 1 – संघ अपनी कट्टर छवि को सुधारने के लिए झूठ का सहारा क्यों ले रहा है?

प्रश्न 2 – क्या ऐसे बयानों से मोहन भागवत भाजपा को किसी तरह का फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा झूठ सामने आया है। देश में संघ की छवि सुधारने को लेकर हो रहे व्याख्यान में संघ प्रमुख ने राष्ट्रीय ध्वज के बारे में संघ के विचारों को लेकर ऐसा झूठ बोला है, जो हज़म होने लायक बिलकुल नहीं है।

विज्ञान भवन में ‘भारत का भविष्य’ विषय पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ. के बी हेडगेवार ने निर्देश दिया था कि 1929 में पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव को समर्थन देने के लिए देशभर के स्वयंसेवक तिरंगे के साथ जुलूस में शामिल होंगे। हालांकि संघ प्रमुख का यह बयान सरासर झूठ है, क्योंकि आरएसएस ने कभी भी तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। द कारवां पत्रिका के अनुसार संघ के संस्थापक हेडगेवर ने खुद ही अपने स्वयंसेवकों को कहा था कि वे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को नहीं बल्कि भगवा झंडे को स्वीकार करें।

21 जनवरी 1930 को हेडगेवार ने लिखा था- “इस साल कांग्रेस ने देश की आजादी का लक्ष्य रखा है। कांग्रेस की कार्यकारिणी ने कहा है कि रविवार 21 जनवरी को देशभर में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसलिए देशभर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में स्वयंसेवक शाम के 6 बजे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में भगवा झंडे की पूजा करेंगे।“

हेडगेवार का यह पत्र मूल रूप से मराठी में था, जिसका अनुवाद ‘डॉ. हेडगेवार: पत्ररूप व्यक्तिदर्शन’ शीर्षक से किया गया है। इस किताब को एन एच पालकर ने लिखा है। गोलवलकर ने पालकर को जन्मजात संघी कहा था।

संघ हमेशा से तिरंगे का विरोधी रहा है। वह हमेशा से भगवा झंडे को ही मानता रहा है। देश की आजादी के पूर्व संध्या पर आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने लिखा था- “जिन लोगों ने भाग्य के बलबूते आजादी ली है, वे हमारे हाथों में तिरंगा देंगे। लेकिन हिन्दुओं के लिए इसे स्वीकार करना मुमकिन नहीं है। हिन्दू मान्यता में तीन रंगों को अशुभ माना गया है और देश का प्रतीक तीन रंगों का हुआ तो यह देश के भविष्य के लिए अशुभ साबित होगा।“

हेडगेवार के बाद गोलवलकर ने भी इसी विचारधारा का पोषण किया। उन्होंने कहा था कि संघ के नेताओं ने देश के लिए नए ध्वज का निर्माण किया है, जो भगवा रंग का होगा। उन्होंने कहा था कि भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी है और इस हिसाब से हमारे पास अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रीय प्रतीक होना चाहिए।

पिछले साल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर संघ को घेरा था। उन्होंने कहा था कि आजादी के 52 साल बीत जाने के बाद भी आरएसएस अपने नागपुर के कार्यालय में तिरंगा झंडा नहीं फहरा सका है। उन्होंने कहा था कि संघ भगवा झंडे को मानता है, तिरंगे को नहीं।

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