कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

RTI में संशोधन लोकतंत्र पर घातक प्रहार: मोदी सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हुए पूर्व सूचना आयुक्त

पूर्व आयुक्तों ने कहा कि इस संशोधन के जरिए सरकार सूचना आयोग की स्वतंत्रता और स्वायत्तता नियंत्रित करना चाहती है.

मोदी सरकार द्वारा सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) में संशोधन को पूर्व मुख्य सूचना आयुक्तों ने लोकतंत्र के लिए घातक बताया है. पूर्व सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, शैलेश गांधी, श्रीधर आचार्युलु और यशोवर्धन आजाद समेत 7 पूर्व सूचना आयुक्तों ने प्रेस वार्ता में कहा कि इस संशोधन के जरिए सरकार सूचना आयोग की स्वतंत्रता और स्वायत्तता नियंत्रित करना चाहती है. इस बिल के जरिए सूचना आयोग के कद को कम करने की कोशिश की जा रही है.

क्या है आरटीआई संशोधन बिल

मोदी सरकार ने बीते दिनों आरटीआई संशोधन बिल लोकसभा में पेश किया था. जिसके जरिए मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों तथा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन एवं शर्ते केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे.

हालांकि आरटीआई की दिशा में काम करने वाले लोग और संगठन इस संशोधन का जमकर विरोध कर रहे हैं. इसे लेकर नागरिक समाज और पूर्व आयुक्तों ने कड़ी आपत्ति जताई है. संशोधन विधेयक 2019 बीते 22 जुलाई को लोकसभा में पारित हो गया था और अब इसे राज्य सभा द्वारा पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है.

पूर्व सूचना आयुक्त द्वारा बिल का विरोध

देश के पहले मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने कहा, “मैं आरटीआई संशोधन की जरूरत को समझने में विफल रहा हूं. आयुक्तों का वेतन और कार्यकाल समस्या या विवाद का विषय नहीं रहा है.” उन्होंने कहा कि चूंकि मोदी सरकार का अभियान स्वच्छता पर आधारित है और आरटीआई कानून शासन में स्वच्छता सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा साधन है. इसलिए इसे कमजोर नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने दावा किया कि इस संशोधन के जरिए सरकार केन्द्र और राज्य स्तरों पर आरटीआई कानून द्वारा पक्के किए गए सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और उनका वेतन तय करने की संसद की शक्ति को छीनना चाहती है.

वजाहत हबीबुल्लाह (साभार- नई दुनिया)

पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी का कहना है, “सरकार ने आरटीआई अधिनियम में संशोधन के लिए कोई ठोस कारण नहीं दिया है. सूचना आयोग की स्थिति और अधिकार को कम करने के लिए मोदी सरकार का तर्क पूरी तरह त्रुटिपूर्ण है.”

पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त दीपक संधू के अनुसार, “सरकार ने इस तरह के महत्वपूर्ण संशोधन पर अपनी पूर्व-विधायी परामर्श नीति (प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी) का पालन नहीं किया है.”

बता दें कि नियम के मुताबिक अगर सरकार कोई संशोधन या विधेयक लेकर आती है तो उसे संबंधित मंत्रालय या डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाता है और उस पर आम जनता की राय मांगी जाती है. हालांकि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ.

इस बिल को 5 अप्रैल 2018 को ही तैयार कर लिया गया था. लेकिन काफी दिनों तक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया. लेकिन बीते 12 जुलाई को मानसून सत्र के लिए लोकसभा के कार्यदिवसों की सूची में सूचना का अधिकार (संशोधन) बिल भी शामिल था. जिसके बाद पूरे बिल को सार्वजनिक किया गया है.

पूर्व सूचना आयुक्त यशोवर्धन आजाद ने आरटीआई कानून को हाशिए के वर्गों का हित बताते हुए कहा,  “जब आप आयुक्त की कुर्सी पर बैठते हैं तो राशन, घरों और बिजली बिलों के केस सामने आते हैं. अगर एक संस्था गरीब व्यक्ति की शिकायत सुन रही है और वो शिकायत सरकार के नुमांइदों के ख़िलाफ़ हो लेकिन आयुक्त का पद सरकारी नुमाइंदे के पद से ऊपर न हुआ तो शिकायत का हल ठीक तरह से नहीं हो पाएगा. अगर सरकार उस पद को नीचा दर्जा देगी तो इससे समाज को संदेश जाएगा कि ये संस्था हमारी समस्याओं को हल करने में सक्षम नहीं है.”

यशोवर्धन आजाद (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

यशोवर्धन आजाद  ने कहा, “सूचना आयोग की अखंडता को बनाए रखना होगा. आरटीआई अधिनियम में संशोधन और उसका मूल्यांकन होना आवश्यकता है लेकिन उसका तरीका अलग होना चाहिए. क्योंकि यह व्यस्था गरीब लोगों के लिए है. संशोधन में यह होना चाहिए कि यदि कोई अपील लगाए तो जल्द से जल्द आयोगों द्वारा उसपर निर्णय लिया जाए, टेक्नोलॉजी का प्रयोग ज्यादा किया जाए.”  उन्होंने कहा कि जिस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी अपने शो के लिए जनता से सुझाव मांगते हैं, उन्हें आरटीआई संशोधन विधेयक पर भी लोगों  से सुझाव मांगने चाहिए.

सूचना आयुक्त एम.एम. अंसारी ने अपना मत रखते हुए कहा, “हम सूचना आयोगों की स्वायत्तता को लेकर काफी चिंतित हैं. हमने देखा है कि कैसे पिछले कुछ सालों में सीबीआई, चुनाव आयोग जैसे स्वतंत्र संस्थानों में हेरफेर किया गया है और अब सूचना आयोग की बारी है.”

उन्होंने कहा, “एनडीए सरकार ने 2002 में सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम को लेकर लोगों को अधिसूचित नहीं किया था. एनडीए हमेशा से लोगों के अधिकार के ख़िलाफ़ रही है.”

पूर्व सूचना आयुक्त अन्नपूर्णा दीक्षित ने केंद्र सरकार के फैसले को आरटीआई अधिनियम के ख़िलाफ़ एक तरह का भेदभाव करार दिया है. उन्होंने संशोधन की आवश्यकता पर सवाल उठाया और कहा कि सरकार को यह विधेयक को वापस लेना चाहिए.

पूर्व सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने चेताया कि वर्तमान में आरटीआई अधिनियम ही नहीं, बल्कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी खतरे में  है. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित बिल सूचना आयोग की स्वायत्तता को ‘गंभीर रूप से कमजोर’ कर देगा.

श्रीधर आचार्युलु (साभार- फ़ेसबुक)

बता दें कि आचार्युलू ने ही दिल्ली विश्वविद्यालय को 1978 बैच (जिस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्नातक करने का दावा किया था) के बी.ए. पास विद्यार्थियों के अकादमिक रिकार्ड का खुलासा करने और पारदर्शिता पर उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन न करने पर आरबीआई गवर्नर को तलब करने का आदेश जारी किया था.

श्रीधर आचार्युलु ने कहा, “मैं चाहता हूं कि हर नागरिक प्रस्तावित आरटीआई संशोधन का विरोध करे. क्योंकि मौजूदा आरटीआई अधिनियम दुनिया का सबसे अच्छा कानून है.”

सामाजिक कार्यकर्ता और एनसीपीआरआई की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज ने कहा, “सूचना आयोगों को लगातार कमजोर करने के लिए प्रयास किए गए हैं. अगर किसी व्यक्ति को सूचना का अधिकार कानून के तहत सही सूचना नहीं मिलती तो वह अपील या शिकायत के जरिए सूचना आयोग के पास जा सकता है. सूचना आयुक्तों के पास ये अधिकार होता है कि सबसे बड़े पदों पर बैठे लोगों को आदेश दे सकें कि वे एक्ट के नियमों का पालन करें. लेकिन इस संशोधन के बाद अब उनका ये अधिकार छिन जाएगा.”

उन्होंने बताया कि साल 2014 के बाद से, अदालतों के हस्तक्षेप के बिना  सरकार ने एक भी आयुक्त नियुक्त नहीं किया.  उन्होंने कहा कि आरटीआई संशोधनों का विरोध करने के लिए देश भर में प्रदर्शन किए जा रहे हैं.

इसे भी पढ़ें- RTI कानून को बाधा मानती है मोदी सरकार, संशोधन करके कानून को नष्ट करने की तैयारी: सोनिया गांधी 

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+