कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अपनी ही शिकस्त की आवाज़: सआदत हसन मंटो

नंदिता दास के द्वारा सआदत हसन मंटो की ज़िन्दगी पर बनाई की फिल्म के नज़र से मंटो की कहानी

ज़माने के जिस दौर से हम इस वक़्त गुज़र रहे हैं, जहाँ मज़हबी जूनून के शोर में ज़मीर की आवाज़ गुम-सुम सी पड़ी है, जहाँ सभी को ख़िताबत का शौक़ है मगर किसी को लफ्ज़ नहीं बयाँ  के लिए, मिर्ज़ा ग़ालिब का ये शेर जब किसी फिल्म का कोई कैरेक्टर स्क्रीन पर पढ़ता है, तो वो सआदत हसन मंटो ही हो सकता है.  वो शराबी अदीब , ख़ुद को ख़ुदा से बड़ा अफ़सान निगार कहना वाला, वो जिसके अफ़सानो के किरदार सोसाइटी की ह्य्पोक्रिसी बयाँ करते हैं, वो सियाह क़लम, तरक़्क़ी पसंद , वो तख़्त -ऐ -सियाह पर काली चाक से नहीं सफेद चाक से लिखने वाला मंटो ही हो सकता है.

ऐसे इंसान  की ज़िन्दगी और मौत को सुनहरे पर्दे पर पेश करना, और वो भी सिर्फ़ 112 मिनट में , ये अपने आप में एक ग़ैर-मामूली काम है जिसे नंदिता दास  ने बड़े ही ख़ूबसूरत अन्दाज़ से पेश किया है.

उर्दू अदब के सबसे बड़े और पेचीदा अफ़साना निगार, सआदत हसन मंटो की ज़िन्दगी पर बनी ये  बायोपिक भले ही हज़ार करोड़ के उन सतरंगी बॉलीवुडिया फ़ेहरिस्तों में न शामिल हो, लेकिन ये फिल्म आज के दौर के मुंह पर एक तमाचा है, जिसकी छाप कई अरसे तक रहेगी.

बा-क़ौल मंटो, “अगर आप इन अफ़सानो को बर्दाश्त नहीं कर सकते, तो ये ज़माना नाक़ाबिल -ऐ -बर्दाश्त हो चला है.” नवाज़उद्दीन ने मंटो के किरदार को बख़ूबी निभाया है, क्यों ये शख़्स मौजूदा दौर के किसी भी अदाकार से कहीं ऊपर है, नवाज़ इन फिल्म में बतलाते हैं. हालांकि, कहीं कहीं ये ज़रूर महसूस होता है के उनके उर्दू के तलफ्फुज़ में वेस्टर्न उत्तर प्रदेश का लहजा हावी हो रहा है, मगर आम तौर पर उन्होंने मंटो की ज़बान को ख़ूबसूरती से निभाया है.

फिल्म की कहानी बम्बई से शुरू होती है, जिसके लिए वो अक्सर कहा करते थे, “मैं चलता फ़िरता बम्बई हूँ.” मंटो और बम्बई के रिश्ते को नंदिता दास ने बख़ूबी कहानी में ढाला है. फिर वो चाहे इस्मत चुगताई, दादा मुनी अशोक कुमार, श्याम या कृशन चंदर से उनकी दोस्ती हो या फिर वो कोर्ट केस जो उनके अदब को फहश निगारी के नाम पर चले थे.

मंटो और बम्बई रिश्ते के कुछ वाक़यात फिल्म में नहीं है या एडिट में हटा दिए गए जैसे अडेल्फी चैम्बर्स , सरवी कैफ़े और शुक्ला जी स्ट्रीट का और ज़िक्र होता तो नयी ऑडियंस जो पहली बार मंटो से रूबरू हो रही है, वो रेफरेन्सेस समझ पाती. शायद ये सब 112 मिनट दिखा पाना मुमकिन न हो, मगर फ़िर भी ये ख़याल आता है, यूँ होता तो बेहतर  होता.

फिल्म के सारे किरदार अपनी अदाकारी से कैरेक्टरस को इतना दिलकश बना देते हैं के आपको एक पल के लिए भी ये नहीं महसूस होगा के फिल्म चल रही है. राजश्री देशपांडेय और ताहिर राज ने किरदारों में जान दाल दी है. ख़ासकर सफ़िया के किरदार को रसिका ने एक अलग आयाम दे दिया है. मेरा हमेशा से ये मन्ना रहा है के मंटो की ज़िन्दगी का असली हीरो उनकी शरीक़ -ए -हयात, सफ़िया हैं, और अब इस फिल्म की भी. फिल्म का म्यूज़िक कहानी और किरदारों के साथ जिस तरह पिरोया गया है उसके लियें  स्नेहा खानवलकर को दिली मुबारक, म्यूज़िक नया होकर भी बीते वक़्त की नब्ज़ तलाशता है.

बम्बई से लाहौर का सफ़र

बटवारें की अफ़्सुर्दगी और दर्द को अपने क़लम की सियाही में सिमेटे हुए , मंटो का बम्बई से लाहौर तक का  सफ़र और उनके अफ़साने अपनी तारीख़ चीख़ चीख़ कर बयां करते हैं. नंदिता दास ने मंटो के  उन अफ़सानो को कहानी के साथ बोहोत ईमानदारी के साथ पेश किया है. फ़िर वो चाहे “खोल दो” हो, या “ठंडा गोश्त” या “टोबा टेक सिंह”, ये सभी अफ़साने और इनके किरदार फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले में इस तरह पिरोये गए हैं के ये कह पाना मुश्किल होगा के ये मंटो की हक़ीक़त का हिस्सा नहीं. नंदिता दास ने  बटवारें के ग़म को जिस तरह मंटो की कहानी के साथ बयान किया है, वो न सिर्फ़ क़ाबिल ऐ तारीफ़ है बल्कि मंटो फिल्म की कहानी का एक हम पहलु  है. एक शराबी अफ़साना निगार होने के साथ साथ मंटो एक लाचार खाविंद और बाप भी है जो अब बटवारें से लड़ झगड़ के  हार मान चूका है ,ये फिल्म हमे ये भी बतलाती है.

एक ऐसा शख़्स, जो हिदुस्तान और पाकिस्तान के दरमियान उस ज़मीन के टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं है ,अपनी शिकस्त की आवाज़  को तलाश रहा है जो ये चिल्ला चिल्ला के कह रही है, “ऊपर दी गुड़-गुड़ दी एनेक्सी दी बेध्याना दी मूंग दी दाल ऑफ़ दी पाकिस्तान एंड हिन्दुस्तान ऑफ़ दी दुर्र फिट्टे मूंह.”

आज के जब फ़िर से मज़हबी जूनून, हिन्दू-मुस्लमान के दंगे , पॉलिटिक्स का गन्दा शोर हमे बहरा बना रहा है, ये फिल्म आपके ज़मीर से सैकड़ों सवाल पूछती है, किन-किन का जवाब आप दे पाएंगे, ये आप तय करिए.

रेटिंग : 4  स्टार

डायरेक्टर : नंदिता दास

अदाकार : नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी , रसिका दुग्गल , ऋषि कपूर, जावेद अख़्तर, राजश्री देशपांडेय

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