कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

साध्वी प्रज्ञा की लोकसभा दावेदारी अपवाद नहीं- ये दौर सिर्फ़ बेशर्म राजनीति का दौर है

यह दावेदारी, संकल्प पत्र और ऐसे बयान यह इशारा करते हैं कि अगर इन्हें सत्ता पर दोबारा कब्ज़ा मिला तो पहले से ज़्यादा कट्टरपंथी राजनीति देखने को मिलेगी.

मौजूदा वक़्त की राजनीति, भारत को उस मोड़ पर ले आई है जहाँ से उसके मुसलमानों को अपने लिए आगे हर रास्ते पर अँधेरा दिखता है. इंसाफ़ और उम्मीद की धुँधली रोशनी अब लगभग ख़त्म हो चुकी है और इस वक़्त अंधा भी मुसलमानों को ही कहा जाएगा, अंधकार फैलाने वालों को नहीं!  मुस्लिम विरोधी ताकतों को हिन्दुओं की आवाज़ के रूप में पेश किया जा रहा है. ये आवाज़े रोज़ अंधे कानून और घूंघे-बहरे लोगों के इस समाज का मज़ाक उड़ाती हैं.

 भाजपा नेता रणजीत बहादुर श्रीवास्तव ने पीएम मोदी के लिए वोट मांगते हुए, मंच से हिंदुओं से अपील की, कि यदि वो मुसलमानों की बर्बादी चाहते हैं तो मोदी को वोट दें. उन्होंने चीन से 12000 मुसलमानों का मुंडन कर उन्हें हिन्दू बनाने के लिए शेविंग मशीनें लाने का वादा किया है. वैसे वो शायद मुसलमानों का राष्ट्रीयकरण और ‘मेक इन इंडिया’ करने में यह बात भूल गए कि चीनी माल ख़रीदना भी एन्टी नेशनल है! मनेका गांधी ने अपने एक ऐसे ही भाषण में मुसलमनों को धमकी दी थी. योगी का ‘अली और बजरंग बली’ या प्रधानमंत्री का ‘शमशान और कब्रिस्तान’ भी यही पैटर्न फॉलो करता है.

एएनआई, भाजपा नेता के हवाले से कहती है, “पिछले पांच वर्षों में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों के मनोबल को तोड़ने के प्रयास किए हैं.  पीएम मोदी को वोट दें अगर आप मुसलमानों की नस्ल को नष्ट करना चाहते हैं.  विभाजन के बावजूद, देश में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है और जल्द ही वे मतदान के माध्यम से सत्ता पर पकड़ बनाने में सक्षम होंगे.” अगर ये नए भारत के नए आचार हैं तो आप हमारी चुनावी आचार संहिता और उसके पालन का अंदाज़ा भी लगा ही सकते हैं.

साध्वी प्रज्ञा की लोकसभा दावेदारी दिल को तकलीफ़ ज़रूर देती है मगर इसे अपवाद कहना झूठ होगा. प्रज्ञा और आदित्यनाथ की राजनीतिक शैली और भाषा में क्या फ़र्क है? या संगीत सोम और प्रज्ञा में? यहाँ तक कि आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में क्या फ़र्क है? भारत इतना सेक्युलर नहीं है कि यहाँ प्रज्ञा की राजनीतिक मौजूदगी और उछाल को अपवाद कहा जाए. इन्हें फ्रिंज कहना उदारता होगी. यह  फ़िलहाल भारतीय मुख्यधारा की लोकप्रिय राजनीति है. समाज का बहुत बड़ा हिस्सा इससे असहज महसूस नहीं करता है. यह एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सत्ता पक्ष के कद्दावर नेता भी पिछले पांच सालों में प्रज्ञा और असीमानन्द जैसे लोगों के साथ खुलकर खड़े नज़र आते हैं.

योगी आदित्यनाथ

स्वयं प्रधानमंत्री मोदी इस सूची में सबसे आगे दिखाई देते हैं.  उन्होंने अपनी एक हालिया रैली में यह घोषणा की थी कि हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता है. इसलिए प्रज्ञा के नामंकन से पहले ही उनके निर्दोष होने की पुष्टि हो गयी थी. हमें साधवी प्रज्ञा की दावेदारी को प्रधानमंत्री के इस भाषण की रोशनी में देखना चाहिए. उनके भाषण को भाजपा के घोषणा पत्र में लिए गए संकल्पों से जोड़कर सुनना चाहिए. उसमें विकास पे हावी हो चुके ख़तरनाक बहुसंख्यक हिंदुत्व के परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए.

चाहे भारत में हुई लिंचिंग की घटनाएं हों, कठुआ की घटना हो या कोई भी ऐसी घटना जो मुसलमानों के खिलाफ़ हुई है, हमें वहां सत्ता के लोग शोषणकर्ताओं की हिमायत करते साफ़ दिखाई देते हैं. प्रज्ञा पर आतंकवादी षड्यंत्र का आरोप है. वो मालेगांव हमलों की मुख्य अभ्युक्तों में से एक हैं.

अपने एक हालिया वक्तव्य में प्रज्ञा ने कहा है कि मुम्बई में हुए 26/11 हमले के नायक हेमंत करकरे उनके श्राप के कारण मारे गए . हमारे मिथकों में अक्सर ऐसा श्राप कोई साधु किसी राक्षस को देता नज़र आता है. फिर कोई देवता उस राक्षस का संहार करने को प्रकट होता है और संयासी का बदला पूरा हो जाता है. ऐसा बॉलीवुड में भी होता है जहाँ एक सताई हुई औरत चिल्लाती है, ‘मेरे करन अर्जुन आएंगे’. प्रज्ञा का बदला लेने पाकिस्तान से कसाब आया था.

इसमें और पुलवामा हमले के बाद सुनने में आए  ‘हाऊ इस द जैश’ में क्या अंतर है, ये बताना भी मुश्किल है. वो कहती हैं कि करकरे को अपने कर्मों के कारण ऐसी मौत मिली है.  क्या शहादत पर राजनीति करने वालों के लिए शहीद होना कर्मो की सज़ा है? प्रधान मंत्री मोदी चाहते हैं कि युवा अपना पहला वोट शहीदों को समर्पित करें तो क्या भोपाल के युवाओं को हेमंत करकरे को अपना वोट समर्पित नहीं करना चाहिए? इस बयान को एन्टी नेशनल नहीं कहा जाएगा. करकरे और प्रज्ञा को साथ में रखना भी कला है. ये वही कर सकते हैं जो गोडसे और गाँधी को एक तराज़ू तौलते हैं.

अगर पूर्वाग्रहों को हटाकर देखें तो पड़ोसी मुल्क़ में हम बदलती हुई हवा महसूस कर सकते हैं. वहाँ  के एक यूनियन मिनिस्टर, फय्याज चौधरी, को हिन्दू विरोधी भाषण के लिए पाकिस्तान के संसद से निकाल दिया गया. यह उस वक़्त हुआ कि जब बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान में युद्ध का माहौल बन गया था. उस वक़्त हिंदुओं के लिए की गई टिप्पणी भारत पर रखकर नज़रअंदाज़ हो सकती थी. एक आम पाकिस्तानी को यह बात मनवाने में शायद इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान को उतनी ही आसानी होती जितनी नाम मात्र धर्म निरपेक्ष रह गए भारत में प्रज्ञा को भाजपा टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने में हो रही है. पाकिस्तान में हाफ़िज़ सईद की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी क्या भारत में प्रज्ञा हारेंगी? हमने यह भी देखा कि एक हिन्दू दलित महिला को सम्मान देने के लिए पाकिस्तान ने एक दिन के लिए अपनी सिनेट की अध्यक्षता संभालने का मौका दिया. क्या ये सब सिर्फ़ पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए हम झूठला दें? यह उस पाकिस्तान में हुआ जिसके अल्पसंख्यकों ने बहुत दुख सहा है.

(साभार- ट्विटर, @Benjami46663163)

दो हिंदू लड़कियों के अपहरण की सनसनीखेज खबर पर तत्कालीन कार्यवाही हुई और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान खुद मीडिया में इस पर बात करते नज़र आए. भारत में पिछले पाँच साल में हुई लिंचिंग की घटनाओं में मारे गए किसी भी व्यक्ति का नाम आपने कभी अपने प्रधान मंत्री के मुँह से सुना है? क्या भाजपा अपना टिकट किसी मंदिर पर हमले के अभ्युक्त को दे सकती है? जो मुस्लिम युवा अपनी ज़िंदगी के बीस साल जेल में काट कर निर्दोष साबित होता है, क्या उसे भी प्रज्ञा जैसे अपनाया जाता है जो अब भी अभियुक्त हैं? क्या हर आतंक के अभियुक्त को ऐसे ही सेहत के नाम पर बेल मिलती है? क्या हमारा पाकिस्तान पर आतंकवादियों से हमदर्दी रखने और उन्हें संरक्षण देने का आरोप अब भी उतना ही वज़न रखता है?

यह दावेदारी, संकल्प पत्र और ऐसे बयान यह इशारा करते हैं कि अगर इन्हें सत्ता पर दोबारा कब्ज़ा मिला तो पहले से ज़्यादा कट्टरपंथी राजनीति देखने को मिलेगी. विकास का चोला उतर चुका है और ये दौर सिर्फ़ बेशर्म राजनीति का दौर है. फिर कहूंगा कि प्रज्ञा अपवाद नहीं है. 2002 मुस्लिम विरोधी हिंसा के ज़्यादातर अभियुक्त भी बाहर हैं. ऐसे बाकी हमलों के दोषी भी छूट रहे हैं. सबूत और गवाहों की रक्षा भी एक बड़ी चुनौती है जिसमें हमें अरुचि है. सन्देश साफ़ है: अब इनकी हिमायत में शर्मिंदगी का पर्दा नहीं रहेगा.

लड़ाई अब इंसाफ़ की नहीं, अस्तित्व की है. भारत के मुसलमानों को इंसाफ़ मिले या न मिले लेकिन इतिहास गवाह है कि अस्तित्व की लड़ाई में हाशिये के लोग कभी नहीं हारते हैं

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