कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मोदी जी का स्वच्छ भारत ‘हाथ में झाडू लेकर फ़ोटो खींचो अभियान’, सफाई करने वालों की कोई सुध नहीं

“मोदी सरकार ने स्वच्छता अभियान के प्रचार में 530 करोड़ रुपये ख़र्च किए, लेकिन सफाईकर्मियों के लिए 1 रुपया ख़र्च नहीं किया.”

‘हम क्या जाने भारत में भी आया अपना राज, आज भी हम भूखे नंगें हैं आज भी हम मौहताज…ए मज़दूरों और किसानों, ऐ दुखियारे इंसानों, ऐ छात्रों और जवानों, ऐ दुखियारे इंसानों… झूठी आशा छोड़ो, तोड़ो बंधन तोड़ो, तोड़ो बंधन तोड़ो….’

ये शब्द हैं उन लोगों के जो आज भी आज़ाद भारत में ग़ुलामी की सांस और ज़िन्दगी जीने के लिए मजबूर हैं. इन्हें अपने अधिकारों के लिए सरकार से गुहार लगाने की ज़रुरत पड़ रही है. ये आवाज़ है उन लोगों की जो इस देश को साफ़ रखने में अपनी मेहनत और जान दोनों लगा देते हैं – हमारे देश के सफाई कर्मचारी, जो अपने हाथों से मैला ढोने और सीवर में उतर कर सफाई करने को मजबूर हैं.

ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसलिंग ऑफ ट्रेड यूनियन (ऐक्टू) ने शुक्रवार को जंतर-मंतर पर सफाई कर्मचारियों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों और मैला ढोने वालों की समस्याओं को लेकर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. ऐक्टू के साथ देशभर के अलग-अलग राज्यों से सफाईकर्मियों के कल्याण के लिए कार्य करने वाले संगठनों (ऑल इंडिया म्यूनीसिपल वर्कर्स फेडरेशन, उत्तर प्रदेश सफाई मज़दूर एकता मंच, आदि) ने भी हिस्सा लिया. यहां आए सफाईकर्मियों ने मांग की कि सरकार उनका वेतन 5000-6000 से बढ़ा कर 15000 से 18000 तक करें, सीवर में सफाई के दौरान मरने वाले सफाई कर्मचारियों के परिवार को मुआवज़ा दें और ठेकेदारी समाप्त कर परमानेंट नौकरी दें.

प्रदर्शन में शामिल होने के लिए बिहार, उड़ीसा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश से सफाई कर्मचारी और सफाई संगठन शामिल हुए. ऐक्टू ने मोदी सरकार द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान को खोखला करार देते हुए कहा कि स्वच्छ भारत अभियान केवल हाथ में झाडू लिए फ़ोटो खिंचाने और विज्ञापन करने के लिए है. स्वच्छ भारत अभियान के विज्ञापन में 530 करोड़ रुपये ख़र्च किया गया, लेकिन सफाई कर्मचारियों का न तो वेतन बढ़ाया जाता है और न ही उनके उद्धार के लिए धनराशि ख़र्च की जाती है. ऐक्यू ने मोदी सरकार को जातिवाद को बढ़ावा देने वाली सरकार बताते हुए कहा कि सरकार ने दलितों को मैला ढोने और सीवरों की सफाई करने के लिए आरक्षित किया है. महाराष्ट्र सरकार ने तो सरकार द्वारा बनाए जा रहे टॉयलेटों की सफाई के लिए केवल सीवर सफाई कर्मचारियों को आरक्षित किया हुआ.

इस विरोध प्रदर्शन के दौरान ऐक्टू को अपना समर्थन देने के लिए पत्रकार और लेखिका भाषा सिंह भी मौजूद रहीं. सिंह ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा, “पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी जी वाराणसी में सीवेज टैंक का उद्घाटन करने गए थे. लेकिन उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले टैंक को साफ करने उतरे दो सफाई मज़दूरों की मौत हो गई. अगले दिन मोदी जी उद्घाटन करने पहुंचे लेकिन उन्होंने एक बार भी उन दो सफाईकर्मियों की मौत का ज़िक्र नहीं किया. समाचारों में भी उस ख़बर को बहुत छोटा पेश किया गया. ऐसी जानकारी भी दी गई कि इस मामले को पुलिस ने दर्ज कर लिया है. इस घटना की ख़बर को मीडिया से रफा-दफा कर दिया गया. वहीं जब मैंने खुद मृतकों के परिजनों से बात की तो मुझे जानकारी मिली की पुलिस द्वारा सफाईकर्मियों की मौत पर कोई एफआईआर नहीं की गई. उल्टा मृतकों के परिजनों को मृतकों का शव जल्द से जल्द ले जाने के लिए डराया और धमकाया गया था.”

सिंह ने ऐसी मौतों को हत्या बताते हुए कहा कि इसे रोकने के लिए एक बड़े अभियान की ज़रुरत है. उन्होंने कहा, “सीवर सफाईकर्मियों की मौत को रोकने के लिए मोदी सरकार पैसे ख़र्च करने के लिए तैयार नहीं है, परंतु स्वच्छता के विज्ञापन पर करोड़ों रुपए ख़र्च कर दी जाती है. मोदी सरकार द्वारा स्वच्छ भारत के नाम पर बड़ी साज़िश रची जा रही है. हर दिन 3 में 1 सीवर सफाईकर्मी की मौत सीवर में सफाई करने के दौरान होती है. लेकिन सरकार फिर भी उन्हें तकनीकी उपकरण उपलब्ध नहीं करवाती है.”

ज्ञात हो कि भाषा सिंह ने अदृश्य भारत नामक किताब लिखी है जो कि मैला ढोने वाले सफाईकर्मियों के जीवन और उनकी परिस्थितियों और कठिनाइयों पर आधारित है.

प्रदर्शन में शामिल इलाहाबाद से आए धर्मेंद्र ने कहा, “मुझे सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करते हुए 30-35 साल हो गए हैं. इतने समय से मेरा वेतन 4400 था और आज भी हमारा वेतन 7 हज़ार से ज़्यादा नहीं है. मंहगाई बढ़ती जा रही है लेकिन वेतन नहीं बढ़ता. हमें गंदे सीवर में उतारा जाता है. किसी इंसान की लाश तो कभी किसी जानवर कुत्ते-बिल्ली के कीड़े पड़े लाश भी हम सफाईकर्मी अपने हाथों से निकालते हैं. लेकिन सरकार के लिए सफाई केवल जुमला है. वह सफाई कर्मचारियों के लिए कोई कदम नहीं उठाती. बिमार होने पर हमें या हमारे परिवार को किसी प्रकार की स्वास्थ सुविधा नहीं मिलती. लोगों के घरों में सफाई रखने वाले हम यदि किसी घर से पीने का पानी मांगते हैं तो लोग हमारे साथ छुआ-छूत का व्यवहार करते हैं.”

उन्होंने कहा, “एक बार हमारे साथी मज़दूर ने एक घर से पीने के लिए पानी मांगा तो महिला ने उन्हें बाथरूम के जग से पीने के लिए पानी दिया.” अपने तकलीफ़ों को बयां करते हुए धर्मेन्द्र की आँखें छलक पड़ी. उन्होंने दुखी और क्रोधित मन से कहा, “मोदी जी के स्वच्छ्ता अभियान से हमें बहुत दुख होता है क्योंकि वे तो फ़ोटो में सफाई करते नज़र आते हैं. और जो सफाई कर्मी असलीयत में सफाई का जिम्मा संभाले हैं उनका न कहीं नाम लिया जाता है और न ही उनके जीवनयापन के लिए सरकार द्वारा पैसे ख़र्च किए जाते है. ठेकेदारों के नीचे हमें काम करना पड़ता है, जो न तो सफाई करने के लिए दस्ताने उपलब्ध करवाते हैं और न ही मुंह ढकने के लिए मास्क देते हैं. यदि ठेकेदारों से मास्क मांगो तो वे गाली देकर नौकरी से निकालने की धमकी देते हैं.”

धर्मेंद्र ने कहा, “मोदी सरकार के राज में सफाई मज़दूरों की हालात दिन ब दिन ख़राब होती जा रही है.”

उत्तर प्रदेश से ही आए संतोष कुमार ने अपने अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा, “हम प्रधानमंत्री मोदी को संसद में बैठने नहीं देगें. कुंभ मेले में गांव से सफाईकर्मियों को झूठे वादे करके ले जाया जाता है और वहां उनसे काम तो करवा लेते हैं पर उन्हें पैसे नहीं दिए जाते हैं. ये तो बस शुरूआत है. यदि मोदी और योगी सरकार ने सफाई कर्मचारियों के लिए सटिक कदम नहीं उठाए तो ऐक्टू सरकार के ख़िलाफ़ पूरे देशभर में प्रदर्शन करेगा.”

उन्होंने मोदी सरकार से सवाल किया कि सफाई कर्मचारियों के हालातों का उनके पास क्या जवाब है. संतोष ने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान केवल दलित विरोधी अभियान है. दलितों को केवल वोट पाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. सफाई कर्मचारियों की काम के स्थान पर इज़्ज़त नहीं होती है.” उन्होंने केंद्र सरकार के रवैये के प्रति क्रोध प्रकट करते हुए कहा कि मोदी सरकार को बाहर फेंकना पड़ेगा.

प्रदर्शन में भागीदारी करने आई छत्तीसगढ़ की महिला सफाईकर्मियों ने अपनी बात रखते हुए कहा, “12 सालों से काम करते हुए हमारा वेतन 7000 रूपये है. हमें झाडू, कूड़ा उठाने के लिए फावड़ा या किसी भी तरह के उपकरण नहीं दिए जाते. यदि ठेकेदारों से मांग करते हैं तो वो हमें गालियाँ देते हैं. कई बार हमें बड़े-बड़े नालों में हाथ डालकर सफाई करनी पड़ती है. हमें उपयोग के लिए दस्ताने और मास्क तक नहीं दिया जाता है.”

सफाई कर्मचारी तथा ऐक्टू के जेएनयू इकाई की अध्यक्ष उर्मिला चौहान ने कहा, “जेएनयू में 2014 में हमारी यूनियन ने एक लंबी लड़ाई लड़कर यह सुनिश्चित करवाया था कि कोई सफाई कर्मचारी सीवर में नहीं घुसेगा और न ही मरे हुए जानवर उठाएगा. जेएनयू में हमारे तीन साथी मज़दूरों की मृत्यु सफाई करने के दौरान हो गई, लेकिन हम लोग आज भी अपने सम्मान और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं.”


इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले ज़्यादातर कर्मचारी अपनी नौकरी को परमानेंट करने, ठेकेदारी समाप्त करने, सीवर साफ करने के लिए तकनीकी उपकरणों का उपयोग और सीवर में सफाईकर्मियों की होने वाली मौत पर रोक लगाने जैसे मुद्दों उठाए. हालांकि देखना होगा केंद्र सरकार के कानों में सफाईकर्मियों की आवाज़ कब तक पहुंच पाती है. देश के प्रधानमंत्री बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं और विज्ञापन के प्रचार-प्रसार में करोड़ो की धनराशि समाप्त कर रहे हैं लेकिन जो लोग देश को साफ़ रखने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाते हैं सरकार उन सफाईकर्मियों की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं देती उन्हें अनदेखा करती है.

 

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