कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

यौन उत्पीड़न की विडम्बना, अपराध किसका और अपराधबोध किसका!

कई पीड़ीताएं झेलती हैं डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी एंड पैनिक अटैक्स से लेकर और भी गंभीर मानसिक विकार

मैं बचपन में अक्सर अपने आसपास अपनी हमउम्र की और मुझसे बड़ी लड़कियों को कहते हुए सुनती थी कि काश हम लड़की होकर पैदा न होते। आज से क़रीब 8 साल पहले तक मुझे ऐसी बातें तीर की तरह चुभ जाती थी। मैं इस बात पर यकीन नहीं कर पाती थी कि कोई इंसान अपने वजूद को इस तरह से बेईज्ज़त कैसा कर सकता है। ऐसी बातों पर कई बार लोगों से कहा-सुनी हो जाया करती थी मेरी। पर बीते कुछ सालों ने मुझे बिलकुल ही बदल कर रख दिया। मेरे अनुभव, मेरे साथ घटी घटनाओं ने मुझे कुछ ऐसा बना दिया कि अब इस तरह की बातें सुनकर मुझे नाराज़गी नहीं होती, हमदर्दी होती है, एक अपनेपन का एहसास होता है।

2017 में भारत में राया सरकार के #Metoo कैंपेन को शुरू करने के बाद हाल ही में बॉलीवुड की एक अदाकारा ने भारतीय सिनेमा जगत के एक जाने माने हस्ती पर उनके साथ बदसलूकी और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया जिसके बाद से #Metoo कैंपेन ने एक बार फिर ज़ोर पकड़ लिया। पिछले हफ्ते एक महिला ने एक स्टैंड-अप कॉमेडियन द्वारा यौन उत्पीड़न का अपना अनुभव ट्विटर पर साझा किया और उसके बाद से लगातार औरतें एक दुसरे का साथ देते हुए अपने-अपने अनुभवों को लेकर सामने आने लगीं। ख़ासकर मीडिया और फिल्म जगत से ताल्लुक़ रखने वाली औरतें यहां के मर्दों की पित्रसत्तात्मक सोच और उससे उपजी दरिंदगी और वेहशीपन के ख़िलाफ़ पूरी हिम्मत से अपनी आवाज़ उठा रही हैं।

ये सब देखकर एक बार को मेरा भी मन हुआ कि जो कुछ मेरे साथ हुआ उसे भी सबके सामने लाकर रख दूं और कहूँ कि आज मैं जिन हालातों से गुज़र रही हूँ उसकी वजह ये लोग हैं। और फिर जब लिखने बैठी तब एहसास हुआ कि मेरे साथ कितनी ही बार ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं। अचानक ही मुझे लगने लगा कि शायद मेरे क़िरदार में ही कुछ ऐसा है कि मैं ऐसे लोगों के बीच फंसती हूँ।

विडम्बना देख रहे हैं आप लोग? अपराध किसका और अपराधबोध किसका!

इसमें कोई दो राय की बात नहीं है कि जहां एक तरफ बहुत तेज़ी से औरतों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, वहीं ये भी सच है कि हम और ख़ासकर पुरुषों का एक बहुत बड़ा हिस्सा औरतों के साथ होने वाले उत्पीड़न और हिंसा को लेकर बहुत संवेदनशील हो गया है। पर कहीं न कहीं हम एक चीज़ में मात खा रहे हैं। हम इन अपराधों के ख़िलाफ़ बात तो कर लेते हैं और व्यक्तिगत स्तर पर कड़ा रुख भी अपनाते हैं लेकिन हम एक यौन उत्पीड़न या हिंसा की पीड़िता के मानसिक स्थिति पर गौर करने और उसके लिए कुछ उपाय निकालने के बारे में नहीं सोच पाते हैं।

दिल्ली साइकाइट्री जर्नल के अप्रैल, 2012 के अंक में सेक्सुअल हरासस्मेंट एंड मेंटल हेल्थ नामक एक लेख में बताया गया कि यौन उत्पीड़न के कई मामलों में घटनाओं का असर ज़िन्दगी भर रहता है। यौन उत्पीड़न से पीड़ित कई औरतें अवसाद(डिप्रेशन), एंग्जायटी या पैनिक अटैक, शर्मिंदगी और अपराधबोध से लेकर पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर और आत्मघाती विचारों एवं आत्महत्या करने के प्रयास की परिस्थिति तक पहुँच जाती हैं।

प्रतिकात्मक छवि

सोचिए, एक ऐसी लड़की जो कामयाब होने और ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा के साथ एक-एक क़दम आगे बढ़ा रही होती है और हर क़दम पर कई लोग उसके आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए उत्सुकता से खड़े रहते हैं, उस लड़की की मानसिक अवस्था क्या होगी? आजकल एक नया चलन आया है कि जब भी कोई औरत हमें खीजती हुई या ग़ुस्से में या फिर परेशान दिखती है तो हम उसे पीएमएस (प्रि मेनस्ट्रुअल सिंड्रोम) या पीरियड्स का हवाला देकर टाल देते हैं। अक्सर ही हम अपने आसपास औरतों को यही हिदायत दे रहे होते हैं कि कैसे यौन उत्पीड़न एक मामूली बात है, बलात्कार जैसी बड़ी घटना नहीं घटी, इनका सामना करना सीखो, पुरानी बात है भूल जाओ और न जाने क्या-क्या। कई बार हम तो उन लड़कियों पर यकीन भी नहीं करते हैं जब वो किसी भी व्यक्ति के साथ असहजता के बारे में बताती हैं और कई बार हम मज़ाक में ले लेते हैं बातों को।

पर हम यह सोचना भूल जाते हैं कि औरतों को घर में, घर से बाहर, बस में, ट्रेन में, हर जगह इस तरह की अनगिनत घटनाओं का लगातार सामना करना पड़ता है। और इस तरह के रवैये से न तो ऐसे अपराध कम होंगे और न हम पीड़ितों को खुलकर एक आज़ाद और स्वस्थ ज़िन्दगी जीने दे पाएंगे। यौन उत्पीड़न के ज़्यादातर मामलों में ज़रूरी मनोवैज्ञानिक सहायता के अभाव की वजह से औरतें समझ ही नहीं पाती हैं कि वे किसी तरह के मानसिक परेशानी से गुज़र रही हैं। जब वे ख़ुद नहीं समझ पाती हैं तो ज़रूरी यह है कि उनके क़रीबी लोग उनके बर्ताव में दिखने वाले छोटे-बड़े बदलावों को समझकर उसके मुताबिक़ उनसे बर्ताव करें, उनकी बात सुनें और उन्हें ज़रूरी मनोवैज्ञानिक सहायता मुहैय्या कराएं। हमें एक समाज के रूप में यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के साथ और भी सजग और संवेदनशील होने की ज़रुरत है।

बदलते हुए दौर के साथ अब सभी अपनी-अपनी यौन हिंसा और उत्पीड़न की छोटी बड़ी कहानियाँ लेकर खुलकर बात कर रहे हैं और बहुत ही साहस के साथ सामने आ रहे हैं। इन औरतों से प्रभावित होकर न जाने और कितनी औरतों को खुलकर सामने आने की हिम्मत मिल रही है। और शायद अब धीरे-धीरे हम लड़कियों और औरतों के लिए ऐसी एक जगह तैयार कर पाएंगे जहां वो अपनी परेशानियों से सबके साथ मिलकर लड़ेंगी और इन सब के बावजूद अपने औरत होने पर दुखी नहीं होगी। हालांकि औरतों के लिए उनके हकों की लड़ाई अब भी बहुत लम्बी है लेकिन मुझे ख़ुशी इस बात की है कि इस लड़ाई ने अब बख़ूबी ज़ोर पकड़ लिया है!

न्यूज़सेंट्रल24x7 को योगदान दें और सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह बनाने में हमारी मदद करें
You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+