कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मैं नास्तिक क्यों हूं.. जब मनुष्य के जन्म, दीनता, शोषण, अराजकता और वर्गभेद की स्थितियों को लेकर भगत सिंह ने उठाए सवाल

मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह मेरा शत्रु है. क्रांतिकारी भगत सिंह के विचार आज के समाज का दर्पण है.

“राख का हर एक कण मेरी गर्मी से गतिमान है. मैं एक ऐसा पागल हूं जो जेल में भी आज़ाद है.” शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के ये विचार उनके दृढ़ निश्चय और बुरे वक़्त में भी संयम को परिभाषित करते हैं.

  • अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने वाले भारतवर्ष के जाबांज क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने 23 मार्च 1932 को हंसते-हंसते मौत को गले लगाया और हमेशा के लिए अमर हो गए.
  • 23 मार्च की  शहादत हर हिंदुस्तानी के दिल में गढ़ गई और इस दिन को शहीद दिवस के नाम से जाना जाने लगा.
  • भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के बाद देश में एक नयी क्रांति का आगाज़ हुआ और अंग्रेजी हुकूमत को हमेशा के लिए आर्यावर्त की भूमि से रवाना किया गया.
  • 30 अक्टूबर 1928 को लाठी चार्ज में क्रांतिकारी लाला लाजपत राय की मौत हो गई. इसके बाद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद और जयगोपाल के साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ मोर्चा और तेज़ कर दिया था.
  • भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज अफ़सर स्कॉट की हत्या की योजना बनायी. लेकिन हमले में अंग्रेज अफ़सर जे.पी. सैन्डर्स मारा गया. इस हत्याकांड की जांच चल रही थी और ये क्रांतिकारी आज़ादी की लड़ाई में व्यस्त रहे.
  • 1929 में अंग्रेजी सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए संसद में बम फेंका और आत्मसमर्पण कर दिया. इस मामले में सुखदेव और राजगुरु की भी गिरफ्तारी हुई.
  • मैं नास्तिक क्यों हूं. यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था. जो 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार ‘द पीपल‘ में प्रकाशित हुआ. इस लेख में भगत सिंह ने ईश्वर की उपस्थिति से लेकर  संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, दीनता, शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और वर्गभेद की स्थितियों पर सवाल उठाए हैं. यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है.
  • जेल में रहने के दौरान भगत सिंह द्वारा लिखे गए लेख व पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं. अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है. उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है.
  • मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है. मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था. कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाए.
  • आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं. क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था. अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जाएगा.
  • सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी. प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा.
  • मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं. यही आज मेरी स्थिति है. यह मेरा अहंकार नहीं है,  यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिए सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूं. मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया.
  • करीब 2 साल मुक़दमा चलने के बाद जब अंग्रेजों ने अपनी हार देखी तब बिना किसी सबूत के सैंडर्स हत्याकांड में भगत सिंह और कुछ अन्य मुक़दमों में राजगुरु और सुखदेव को एक साथ 24 मार्च 1931 को फांसी देने की ऐलान कर दिया.
  • अपनी कायरता का नमूना दिखाते हुए विद्रोह के डर से अंग्रेजों ने तीनों क्रांतिकारियों को एक दिन पहले यानी कि 23 मार्च 1931 को ही फांसी दे दी.
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