कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

शाहीनबाग़ का प्रदर्शन: सत्ता से सवाल पूछने का असाधारण मॉडल

हमें इस समय इन प्रदर्शनों से प्रेरणा लेकर अपनी आवाज़ को बाहर लाना होगा. यह समय है कि हम एकजुट होकर विरोध की आवाज़ को मजबूत करें.

करीब एक महीने से दिल्ली की सड़कों पर नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में बैठी महिलाएं मुझे मेरी अम्मी की याद दिलाती हैं.

अम्मी उत्तर प्रदेश के जौनपुर की थीं और वो हमेशा मुझे मेरी माताजी (दादी मां) की याद दिलाया करती. दादी लाहौर के मुस्लिम परिवार में पैदा हुई थीं जबकि मेरी मां का जन्म पंजाबी हिन्दू परिवार में हुआ था. उन दोनों ने मुझे सुरक्षित होने का एहसास दिलाया. उनके कारण ही मैं भावनात्मक रूप से मजबूत हो पाई. मेरी निगाह में वो दोनों एक जैसी थीं. उनके भीतर कोई अंतर मुझे नहीं दिखता था. अम्मी और दादी की योग्यता भी एक ही जैसी थी. जैसे-खाना पकाना, सिलाई-कढ़ाई करना. उनका पूरा समय दूसरों की जरूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता. वे हद से ज्यादा क्रिएटिव थीं. हमेशा पर्दे के पीछे से ही वे अपनी दुनिया जीती थीं, लेकिन जरूरत पड़ने पर वे सभी अदृश्य बंधनों को तोड़कर सामने भी आती थीं.

कुछ इसी तरह की मिसाल शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रही हजारों महिलाएं रोज पेश कर रही हैं. नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ ये महिलाएं एकजुट होकर सामने आई हैं. इनमें ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने आज तक किसी धरने का मुंह तक नहीं देखा था. कुछ छात्राएं भी इन प्रदर्शनों में शामिल हो रही हैं. गोद में नवजातों को लेकर भी महिलाएं धरने पर बैठी हैं. दादी-नानी सब हैं इस प्रदर्शन में. यहां कलाकारों, कवियों, गायकों और आयोजकों की एक पूरी जमात है. ये सभी एक क्षण में गुस्से से भर जाते हैं तो दूसरे क्षण में पूरे उत्साह और जोश-ख़रोश के साथ नारे लगाने लगते हैं. प्रदर्शन में शामिल महिलाएं समय-समय पर अपने घर जाती हैं और कामों को निपटा कर जल्दी ही इसमें फिर से शामिल हो जाती हैं. उन्होंने इस प्रदर्शन को एक संकल्प के तौर पर लिया है. उन्हें नागरिकता संशोधन क़ानून-एनपीआर और एनआरसी के बारे में पता है और वे इन क़ानूनों के नुक़सान को भी भली-भांति पहचानती हैं. महिलाओं की इस समझ को हम सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया के तमाम वीडियोज़ में देख सकते हैं.

नागरिकता क़ानून-एनपीआर-एनआरसी के मुद्दे पर सरकार और जनता इस क़दर सामने है कि मेरे लिए समझना मुश्किल है कि आख़िर यह हो क्या रहा है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. देश के सभी शहरों में हर रोज लोग हजारों की तादाद में रैलियों में शामिल हो रहे हैं. इन प्रदर्शनों का कोई एक नेता नहीं है और ना ही ये भीड़ किसी के बुलाने पर जुटती है. देश ने हुकूमत के सामने सच बोलने का अपना रास्ता अख़्तियार कर लिया है.

इन प्रदर्शनों से निपटने के लिए सरकार हिंसा का सहारा ले रही है. उत्तर प्रदेश में पुलिस के जरिए लोगों पर अत्याचार किए जा रहे हैं. पुलिस की हिंसा का यह पैटर्न जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ भी देखने को मिला है.

एक तथ्य-जांच टीम का हिस्सा बनकर मैं उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर गई थी. यहां हम हाजी हामिद हसन से मिले. हाजी हामिद मुझे मेरे दादी जी की याद दिलाते हैं. वैसा ही रंग-रूप, वही आवाज़ और बिल्कुल मेरे दादी जी की तरह की एक कोट उन्होंने पहन रखा था. हाजी हामिद हसन लकड़ी का व्यापार करते हैं. बीते दिनों पुलिस ने तोडफ़ोड़ मचाकर उनके घर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया. डकैतों की तरह पुलिस ने हमला किया था. हाजी हामिद के 14 साल के पोते को पुलिस ने बुरी तरह मारा और हिरासत में बंद रखा था. जिस दिन हमने उनके परिवार से मुलाकात की थी, उनके बेटे उस दिन भी जेल में थे. उनकी पोती के सिर में गंभीर चोटें आई थीं और वह एक बिस्तर पर लेटी थी. घरवालों ने हमसे अपनी आपबीती सुनाई.

हाजी हामिद हसन ने हमारी मुलाकात अपने दो किराएदारों से करवाई. ये लोग 2 दशकों से भी ज्यादा समय से हाजी हामिद के घर पर रह रहे हैं. उन किराएदारों से उन्होंने पूछा, “बताइए, मैं कोई ग़लत इंसान हूँ क्या? इन्हें बताइए कि क्या मैं ग़लत इंसान हूँ, आप लोगों के साथ इतने सालों से मेरा व्यवहार कैसा रहा है बताइए…..”

इतना कहते ही हाजी हामिद हसन फूट-फूट कर रोने लगे. उन्होंने रोता हुए देख मैं भी भावुक हो रही थी. मेरा मन हो रहा था कि बोलूं- दादाजी, आप मत रोओ. मेरे साथ कई लोगों ने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की. किराएदारों ने बताया कि हाजी हामिद हसन बहुत नेक इंसान हैं. उन्होंने कहा, “जब हमारे घर पर कोई बीमार पड़ता है तो वो खुद आकर हमारी ख़ैरियत पूछते रहते हैं. हमें कभी नहीं लगा कि हम हिन्दू हैं और एक मुसलमान के यहां किराए पर रह रहे हैं.”

इस तरह की परिस्थितियों का सामना होने पर मेरे भीतर बेचैनी बढ़ने लगती है. मैं खुद को विश्वास दिलाती रहती हूँ कि हम फिर से पहले की तरह हो जाएंगे. इससे पहले भी दुनिया में एक से बढ़कर एक संकट आए हैं. लोग पहले भी एक-दूसरे के दुश्मन थे पर हमने उस नफ़रत के ऊपर शांति कायम की. मुझे ऐसे वक्त में यह ख्याल बिल्कुल नहीं आता कि कई लड़ाईयां तो ऐसी हैं जो आज तक ख़त्म ही नहीं हुई. हमारा समाज वैसा नहीं बनेगा. मैं एक अमन पसंद भारत में पैदा हुई हूँ और इसके अमन-चैन को बचाने के लिए मुझे भी अपनी हिस्सेदारी दिखानी होगी.

पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आमलोगों के बीच चर्चा में मैं हमेशा पाती हूँ कि लोग शाहीन बाग़ की महिलाओं, जामिया के छात्रों और देश के करोड़ों लोगों के प्रदर्शन से आश्चर्य में हैं. लोग पूछते हैं कि क्या सरकार किसी दिन इन महिलाओं के साथ हिंसा करेगी? क्या तब यह आंदोलन चल पाएगा? और इस आंदोलन का असर क्या होगा?

हमारे पास इन सवालों का कोई जवाब तो नहीं है पर हमें निश्चय ही इन प्रदर्शनों से कुछ नई उम्मीदें रखनी चाहिए.

लखनऊ से मेरी ननद सायदा सुल्ताना अक्सर मुझसे इन प्रदर्शनों की ख़बरें लेती रहती हैं. लखनऊ में प्रदर्शन के पहले दिन जब एक मुस्लिम रिक्शे वाले की मौत गोली लगने से हुई थी, सुल्ताना उनके परिवार से मिली थी. उस रिक्शे वाली की पत्नी हिन्दू थी. इस परिवार को जो कुछ भी आर्थिक मदद मिलती है, वो सायदा से बताते हैं.

जब जेएनयू में नकाबपोशों ने छात्रों पर हमला किया तब सायदा आपा ने परेशान होते हुए मुझसे कहा था, “क्या आप उन्हें कह सकते हो कि कम से कम छात्रों को तो बख़्स दें.”

कभी-कभी अचानक से मेरी मां भी सीएए के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शनों पर मुझसे चर्चा करने लगती हैं. वो इस विभाजनकारी क़ानून के ख़िलाफ़ हैं. इस क़ानून ने लोगों की आत्मा पर इस कदर चोट पहुंचाई है कि आज तक जो लोग शांत बैठे थे, वो भी मुखर होकर बोलने लगे हैं.

प्रदर्शनों में दिन-पर-दिन लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है. लोगों से बातें करने और उनकी चिंताओं को जानने पर हमारी ताकत दोगुनी हो जाती है.

इसमें कोई शक नहीं है कि हम असाधारण दौर से गुजर रहे हैं. आज मानवता और मानवता विरोधियों के बीच सीधी टक्कर है. यह चुप बैठने का समय नहीं है. हमें इस समय इन प्रदर्शनों से प्रेरणा लेकर अपनी आवाज़ को बाहर लाना होगा. यह समय है कि हम एकजुट होकर विरोध की आवाज़ को मजबूत करें.

नताशा बधवार

(नताशा बधवार “माय डॉटर्स मम” और “इमोर्टल फॉर अ मोमेंट” पुस्तकों की रचनाकार हैं. यह लेख मूल रूप से लाइव मिंट में प्रकाशित है, इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

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