कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

CAA-NPR का हर हाल में बहिष्कार क्यों करें राज्य सरकारें?

अगर राज्य सरकारें अब भी एनपीआर को अपने यहां लागू करती हैं तो वो एक ऐसी प्रक्रिया में सहायक बनेंगी जिससे करोड़ों मुसलमानों का दमन होगा.

पूरा देश आज ऐतिहासिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन का गवाह बन रहा है. लोग गांधीजी से प्रेरणा लेकर विभाजनकारी नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे हैं. लेकिन, हमें ध्यान रखना होगा कि सिर्फ जनता का आंदोलन ही नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) और नेशनल रजिस्टर ऑफ इंडियन सिटिजन्स (एनआरआईसी) को रोकने के लिए काफी नहीं है. इसके लिए सभी ग़ैर-भाजपा शासित राज्य सरकारों को खुलकर सामने आना होगा. इन्हें अपने यहां नागरिकता संशोधन क़ानून, एनपीआर और एनआरआईसी की प्रक्रिया का बहिष्कार करना होगा.

केरल और पंजाब की सरकारों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नागरिकता क़ानून को “भयावह” बताया है. लेकिन, कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल बोल रहे हैं कि राज्यों के लिए क़ानूनन यह संभव नहीं है कि वे नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करने से इनकार करें. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कांग्रेस के ही जयराम रमेश ने कहा कि उन्हें मालूम नहीं कि राज्यों द्वारा नागरिकता क़ानून का विरोध न्यायालय के सामने कितनी देर तक टिक पाएगा. 

इस बीच तमाम शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बावजूद केंद्र सरकार अब भी नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करने के अपने एजेंडे पर कायम है. बीते 10 जनवरी को इसका नोटिफिकेशन भी जारी किया जा चुका है और 1 अप्रैल के बाद से देशभर में एनपीआर की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. अमित शाह भविष्य में एनआरआईसी ना कराने के सवाल को ख़ारिज़ कर चुके हैं. 

महात्मा गांधी ने बताया था कि अगर हम किसी बुरे क़ानून का विरोध करना चाहते हैं तो शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से हमें उस क़ानून को मानने से इनकार करना चाहिए. गांधीजी के अनुसार बुरी चीजों में असहयोग करना भी उतना ही जरूरी है जितना अच्छी चीजों में सहयोग करना. बुरे क़ानून को मना करने की इसी प्रक्रिया को सविनय अवज्ञा या सिविल नाफरमानी कहा गया है.

देश के नागरिकों खासकर छात्रों ने जल्दी ही पहचान लिया कि सरकार की मंशा है कि नागरिकता क़ानून-एनआरसी और एनपीआर लागू करके संविधान की मूल भावना की हत्या की जाए. इस कारण स्वत:स्फूर्त तरीके से देशभर में नौजवानों, बच्चों और महिलाओं ने विरोध-प्रदर्शन शुरू किया. इन प्रदर्शनों में लोगों ने  एक हाथ में तिरंगा और दूसरे हाथ में पोस्टर थाम रखे हैं, जिनमें सरकार की विभाजनकारी नीति के विरोध वाले नारे लिखे गए हैं. रैलियों में “हम काग़ज नहीं दिखाएंगे” के नारे लग रहे हैं.

इन सभी विरोध-प्रदर्शनों का उद्देश्य है- देश की बंधुता को बचाए रखना. लोग इसलिए सामने आए हैं कि उनके भाई-बहनों के साथ ज्यादती नहीं की जा सके. इस सविनय अवज्ञा में सिर्फ मुसलमान ही नहीं हैं, बल्कि हिन्दुओं ने भी इसका पूरा-पूरा साथ दिया है. इस सुनहरे पल को भारत के इतिहास में याद रखा जाएगा. काश ऐसा कुछ नाजी जर्मनी में भी हुआ होता. जब वहां यहूदियों की नागरिकता ख़त्म की गई, तब ग़ैर-यहूदियों की तरफ से कोई विरोध नहीं हुआ. 

इन सबके बावजूद भी, देश बांटने की नीति पर चल रहे इस सरकार को झुकाने के लिए सिर्फ आम जनता का विरोध प्रदर्शन ही काफी नहीं है. हाल ही में हमने देखा कि कैसे उत्तर प्रदेश की सरकार ने छात्रों और अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दिया है. 

सरकार की इस मंशा को नाकाम करने के लिए आम लोगों के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी इस आंदोलन से जुड़ना होगा. इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है, लेकिन जिस तरह का संकट देश के सामने आ खड़ा हुआ है उसके लिए यह नीति अपनानी होगी. राज्य सरकारों को नागरिकता संशोधन क़ानून और एनपीआर में केंद्र सरकार का सहयोग करने से इनकार करना होगा. राज्य सरकारों के संसाधनों के बिना मोदी सरकार किसी भी सूरत में इसे लागू नहीं कर पाएगी.

कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल इस क़ानूनों के ख़िलाफ़ मुखर रूप से बोल रहे हैं, लेकिन अगर राज्यों में ये सरकारें एनपीआर का बहिष्कार नहीं करती हैं तो एनआरआईसी लागू करने में ये भी सहयोगी मानी जाएंगे. राज्य सरकारें केंद्र के इस झांसे में मत आएं कि एनपीआर का एनआरआईसी से कोई लेना-देना नहीं है. हमारे सामने एक चुनौती और है. 2003 के नागरिकता संशोधन क़ानून की वजह से आज ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं. इस संशोधन में कहा गया कि भारत में जन्म लेने के बावजूद भी अगर किसी शख़्स के माता-पिता में से कोई एक “घुसपैठिया” साबित होता है, तो उसे भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा. इसके बाद “घुसपैठियों” की पहचान के लिए एनआरआईसी तैयार की जाएगी. इसी संशोधन में कहा गया कि एनआरआईसी से पहले एनपीआर तैयार किया जाएगा और इसमें “संदिग्ध” लोगों की पहचान की जाएगी. लोगों को “संदिग्ध” करार देने का अधिकार आम जनता को भी दे दिया गया. इससे कट्टरपंथी संगठनों को ताकत मिलेगी कि वो अपनी मर्जी से मुसलमानों को “संदिग्ध” बताएं.

अगर राज्य सरकारें अब भी एनपीआर को अपने यहां लागू करती हैं तो वो एक ऐसी प्रक्रिया में सहायक बनेंगी जिससे करोड़ों मुसलमानों का दमन होगा. इससे देश का अमन-चैन तबाह हो सकता है और गृहयुद्ध जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है. ऐसा होने पर राज्य सरकारें संविधान की आत्मा के साथ धोखा करने के दोषी होंगे. बाकी प्रदेश की सरकारों को केरल और पंजाब की तरह ही नागरिकता संशोधन क़ानून का बहिष्कार करते हुए इसे निरस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख़्तियार करना चाहिए. इसके साथ ही इस समस्या की जड़ 2003 वाले नागरिकता संशोधन को भी निरस्त करने की मांग करनी चाहिए. अगर सुप्रीम कोर्ट भी इसका समाधान नहीं कर पाती है तो राज्य सरकारों को संविधान की रक्षा के लिए अपनी बर्खास्तगी की मांग करनी चाहिए.

हां, यह सच है कि ऐसी अवज्ञा क़ानूनन ग़लत मानी जाएगी और इससे संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन विडंबना यह है कि संविधान की मूल आत्मा से हो रहे छेड़छाड़ को रोकने के लिए दूसरा कोई विकल्प हमारे सामने नहीं है.

(हर्ष मंदर पूर्व आइएएस अधिकारी और जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख मूलत: इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित है, जिसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

 

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