कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

कहानी मेरी माँ के भारत की – दंगों और दयालुता की

विभाजन के ज़ख्मों की वजह से मेरी माँ का भारत अब भी लंगड़ा रहा था अपने भविष्य की तरफ रुख़ करते हुए.

घड़ी

“उसको बताना है,

अभी कुछ और भी दल हैं,

कि जिनको बांटने का, काटने का काम जारी है,

वो बंटवारा तो पहले था,

अभी कुछ और बंटवारा भी बाकी है ….’ टोबा टेक सिंह, गुलज़ार

1962 में मेरी माँ ने पहली बार अपना घर खोया था।

उनका गृहनगर हिन्दू-मुस्लमान दंगों की आग से घिरा हुआ था जो लगातार एक हफ्ते तक जलता रहा. इस दौरान उनके परिवार ने एक रात भी अपने घर में नहीं बितायी. हिन्दू पड़ोसियों की सुरक्षा में वे लोग दिन में हमेशा की तरह अपनी दिनचर्या का पालन करते और रातें किसी एक पड़ोसी के घर में बिताते थे. सटीकता से कहा जाए तो औरतें रात भर जागती थीं और बच्चे सोते थे. लेकिन जल्द ही लकड़ियों की ‘लाठियों’ के मुकाबले हिंसक भीड़ ज़्यादा बढ़ गयी और पड़ोसियों ने झिझकते हुए मेरी नानी से कहा, “भाभी, हम आपकी और रक्षा नहीं कर पाएंगे.”

रात के अँधेरे में बड़ो ने सभी को, यहाँ तक कि बच्चों को भी, कोई न कोई क़ीमती  चीज़ उठाने को कहा गया और मेरी माँ ने फुर्ती से एक एक अलार्म घड़ी उठा ली. घड़ी की टिक टिक रात के सन्नाटे में ख़लल करती रही और माँ आस-पास सभी लोग परेशां होते रहे. लेकिन उन्होंने उसे घड़ी हाथ से नहीं छूटने दी. और जब उन्होंने एक नए मोहल्ले, एक नए घर में आंखें खोलीं तो वो घड़ी उनके हाथ में थी.

बीतते सालों में अलार्म घड़ी की ये घटना परिवार वालो के लिए एक मज़ाक की वजह बन गयी लेकिन माँ की इस घड़ी ने 1992 के दंगों के बाद मेरे भयावह सपनों में गहरी पैठ जमा ली. एक बार मैंने सपना देखा कि मेरे चारों तरफ दंगे चल रहे हैं और जब मुझे कोई कीमती चीज़ उठाने को कहा गया तो मैंने अपनी छोटी बहन को गोद  में उठा लिया, एक रोती हुई नन्ही बच्ची जो रास्ते में चलते चलते बड़ी हो गयी पर दंगे कभी नहीं रुके.

दंगे बढ़ते रहे और रास्ते भी.

1992 में मेरी सुरक्षा के लिए किसी ने लाठी नहीं उठायी – न सपनों में, न जीवन में।

***

मेरी माँ ने जिस भारत में आँखें खोलीं वो विभाजन के ज़ख्मों से लंगड़ाता हुआ भविष्य की ओर अग्रसर था। बंटवारे का पागलपन भी कम हो चला था. मेरी माँ कहती हैं, “साम्प्रदायिकता की आग ज़िंदा थी लेकिन ज़िन्दगी दयालुता पर चल रही थी।”

मैंने अक़्सर इस दयालुता की पहेली को सुलझाने की कोशिश की।  क्या वजह थी इस संवेदना की? क्या सरहद पार से आए लोगों की ख़ाली आँखों और ख़ाली हाथों को देख के इस पार के  लोगों के दिल इसलिए पिघले क्योंकि उन्होंने कुछ न खोया था? या क्रूरता का पलड़ा संवेदना से संतुलित हो गया?

वजह कोई भी हो, उस दौर की दयालुता ने मेरी माँ के वयक्तित्व को ढाला। और मेरी ज़िन्दगी में उसी की कमी ने मुझे.

काग़ज़ के फूल

“मैंने सरहद के सन्नाटों के सहराओं में अक्सर देखा है,

एक ‘भमेरी’ अब भी नाचा करती है,

और एक लट्टू अब भी घूमा करता है.” – भमेरी, गुलज़ार

मेरी माँ और उनकी 85 वर्षीय चाची को श्याम सुन्दर अच्छे तरह याद है. वे एक चयनित वार्ड सदस्य थे जब उनके सामने एक पंजाबी मुस्लिम जोड़े का केस आया।  पति पत्नी पटियाला से बंटवारे के खून-ख़राबे से भागे थे. वह औरत, जिन्हें सब बाद में पंजाबी बड़ी अम्मा के नाम से जानने लगे, उनके शरीर पर ताज़े तलवार के वार के घाव थे और उनके पति, अब्दुल गफ्फूर के पास अपनी घायल पत्नी के सिवा कुछ नहीं था – न खाना, न पैसे, न कपड़े, न बच्चे. श्याम सुन्दर उन्हें खुर्शीद अली नाम के एक आदमी के पास ले आये  थे जो कि एक बड़े व्यवसायी थे और मेरी माँ के पड़ोसी.

सुन्दर ने अली से कहा, “मैं कुछ दिनों के लिए मेहमान ला रहा हूँ।” अली ने इस जोड़े को अपने घर में जगह दी और ज़िन्दगी भर अपने माँ बाप की तरह उनकी देख-रेख की।

गफ्फूर दंपत्ति पटियाला से थे और उनके 9 से 19 साल की उम्र के बीच के चार  बेटे थे. 1947 में सिख दंगाइयों ने बन्दूक और तलवार लेकर उनके घर पर हमला किया था. उनके बेटे अपने दादी के साथ सो रहे थे और पति पत्नी घर के पीछे के हिस्से में सोये थे जहां का दरवाज़ा पीछे के आँगन में खुलता था. जब उन्होंने गोलियों की आवाज़ सुनी तो वे यह सोच कर अँधेरे में भाग निकले कि वे अपने परिवार के लिए वापस आयेंगे.

वे उन्हें कभी नहीं ढूंढ पाए.

पंजाबी बड़ी अम्मा अपने बेटों की तलाश में कई बार पाकिस्तान गई. (भारत ने 1952 तक पाकिस्तान जाने के लिए पासपोर्ट-वीसा प्रणाली लागू नहीं की थी और एक विशेष परमिट के साथ पाकिस्तान जाया जा सकता था.) बंटवारे के तुरंत बाद मेरे नाना के भाई की मदद से उन्होंने सरहद पार के रिफ्यूजी कैम्पों में भी अपने बेटों की तलाश की. पर उन्हें उनके मोहल्ले का बस एक आदमी ही मिला जिसने कहा की, “अपने मोहल्ले का कोई मुसलमान नहीं बचा.”

और फिर भी पंजाबी बड़ी अम्मा पटियाला से किसी भी मुसलमान बच्चे की ख़बर मिलते ही पाकिस्तान चली जाती थी. और ख़ाली हाथ लौट आती थीं।

मेरी माँ बताती हैं की बड़ी अम्मा हर बीतते साल के साथ और चुप होती गईं. बस हर साल ईद उल फितर की नमाज़ के बाद उनकी आवाज़ सुनाई देती जब वह ज़मीन पर लोट लोटके अपने बच्चों के लिए चिल्लाती थीं।

अम्मा को ज़िन्दगी का नया लक्ष्य तब मिला जब अली के पड़ोसियों के घर जुड़वां बच्चियां का जन्म हुआ. बच्चियों की माँ को मदद चाहिए थी और अम्मा को बच्चे. उन्होंने बच्चियों के पालन पोषण किया और अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिन उनमे से एक के साथ बिताये. अम्मा की मृत्यु कुछ ही साल पहले हुई और गफ्फूर की उनसे कुछ पहले.

और यूं, गफ्फूर दंपत्ति ने अपने बेटे तो खो दिए पर बेटियाँ भी पा ली.

***

जिन्दी का नमक

“जब तक मेरे सामने वाले घर में रौशनी जलती है,

मेरे कमरे की दीवार पे

उस घर की परछाइयां चलती रहती हैं.” – गुलज़ार 

पिछले साल, मैंने बीबीसी के ‘पार्टीशन वॉइसेस’ की एक लिंक अपनी माँ को भेजी, जिसे देख के उन्होंने मुझसे सिखों और मुसलमानो के सामाजिक सम्बन्धो की बात छेड़ी।

उन्होंने बताया, “वो लोग (मुसलमान और सिख) एक दुसरे से बहुत लम्बे समय तक डरते रहे . सारा डर सदमे और दुःख से जुड़ा था.”

लेकिन ये डर साल दर साल धुंधला होता गया. कैसे? मैंने पूछा.

उन्होंने कहा, “दोनों ही अल्पसंख्यक समुदायों से थे. पहनावा, रहन-सहन, पारिवारिक मान्यताएं थीं भी एक सी थीं. वे कड़ी मेहनत करते थे और एक दूसरे को काम देते थे और एक से मोहल्लों में रहते थे. और फिर सिखों एक अलग सी चमकती, अच्छाई थी.”

दोनों समुदाय एक दुसरे से ऐसे मिले की डर की जगह न रही।

मेरी माँ के घर के पास एक पंजाबी परिवार रहता था जो बंटवारे के बाद लाहौर से आया था. पिता के जीवित रहने तक वे इलाहबाद में रहे सके बाद मेरी माँ के शहर आ गए. मेरी नानी बताती थीं कि अपना घर खो देने की वजह से उनके पिता का मानसिक संतुलन बिगड़ गया था. वो इलाहाबाद में खुश थे क्योंकि पास की  मस्जिद और पहचानी सी चहल-पहल उन्हें लाहौर की याद दिलाती थी, जिससे उनकी तबियत सम्भली रहती थी.

उस परिवार के एक जुझारू बेटे और मेरी नानी का नमक का रिश्ता था.

हर रविवार की सुबह जिन्दी (रजिंदर) दरवाज़े से ‘चाची’ कहकर आवाज़ लगाते और मेरी नानी बिना कुछ कहे उन्हें जाकर 15 रु. दे आती थी. जिन्दी उन पैसो से मंडी जाकर तीन बोरी नमक लेते और दोपहर तक अपनी पहली बोरी बेच कर और अपना ‘उधार’ चुका कर वापस बाकि बची बोरियों को बेचने मंडी चले जाते.

यही कहानी चलती रही और ख़त्म हुई जब जिन्दी और उसके भाइयों ने ग्रेजुएट डिग्रियाँ और नौकरिया हासिल की।

मेरी माँ के परिवार का जिन्दी से 1962 में भड़के दंगों के दौरान संपर्क टूट गया और मुसलामानों को मुस्लमान बहुल इलाकों में जाकर बसने पर मजबूर होना पड़ा.

***

मेरी माँ की कहानियों में बुरे से बुरे वक़्त में भी दयालुता चमकती नज़र आती है . दयालुता जो उन हिन्दुओं में थी जिन्होंने सिपाहियों की तरह मेरी माँ के घर की रक्षा की, पटियाला के घायल गफ्फूर दंपत्ति में, श्याम सुन्दर में जिन्होंने उनकी मदद की और जिन्दी जिसने नमक और पसीने से अपना भविष्य बनाया.

मेरी माँ ने उन लोगों को देखा जो दर्द देखते समझते थे और उसे कम करने के लिए दौड़ पड़ते थे।

मेरी माँ ने हर तरह के लोगों में हमदर्दी देखी है और इसलिए शायद उनमे माफ़ करने की असीम क्षमता है. वहीं मैंने हमदर्दी इतनी कम देखी की ज़रा सी देख के हैरान रह जाती हूँ। माँ दयालुता की उम्मीद करती हैं और न मिलने पर अपमानित हो जाती है. मैं ऐसी कोई उम्मीद नहीं करती और इसलिए जब मुझे दयालुता मिलती है तो मैं उलझन में पड़ जाती हूँ. मेरी माँ ने विस्थापन, दंगों के पीड़ितों को देखा है और ख़ुद भी समुदाय बहुल बस्तियों में रहने को मजबूर हुई हैं. पर उसके साथ उन्होंने मानवता को अपना काम करते भी देखा है. मैंने दंगे देखे हैं और मुझे भी ऐसे बस्तियों में जाकर रहना पड़ा लेकिन सहानुभूति और दयालुता मेरे जीवन से बहुत दूर रहे.

मुझे अब इस बात का एहसास हुआ कि मैं जिस भारत से प्यार करती हूँ वो मेरी  माँ ने मेरे मन में बसाया था।  वो भारत उस भारत से बिलकुल अलग था जिसमें मैं रह रही थी. मेरी माँ के भारत ने मुझे शक्ति दी कि मैं अपने भारत के छोटे-बड़े ज़ुल्म माफ़ कर सकूं.

और अब मेरी बहनें अपने बच्चों को एक ऐसे देश में पाल रही हैं जहां उनसे अक्सर पूछा जाता है कि क्या वो पाकिस्तानी हैं.

अपने माँ के घड़ी की कहानी लिखने के बाद मैंने सपना देखा की मैं मेरी माँ हूँ  और आधी रात में एक गुस्से से भरी भीड़ से भाग रहीं हूँ . मेरे हाथ में वही घड़ी थी जिसका कांटा मेरे डर के साथ बजता चला जा रहा था.

ये सपना मेरी विरासत है. और मैं इसे किसी और को नहीं सौंपना चाहती।

 

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