कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

रिपोर्ताज़: हरित क्रांति के दुष्चक्र में फंसी पंजाब की खेती

दूसरे प्रदेशों के किसान भाइयों को भी लगता है कि पंजाब के किसान अच्छे खुशहाल स्थिति में हैं, जबकि आज की हकीकत हैं कि पंजाब के किसान अंधकार में हैं.

दिवाली के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, दिल्ली और एनसीआर क्षेत्रों में सिर्फ खास तरह के पटाखे बेचे जाने की अनुमति थी. कम ध्वनि और कम धुंआ करने वाले पटाखे बेचे और फोड़े जा सकते थे. इन पटाखों को ग्रीन क्रैकर्स (हरित पटाखे) कहा गया. कोर्ट ने पटाखे फोड़ने के लिए रात 8 से 10 का समय निर्धारित किया था. कोर्ट के आदेश ने न सिर्फ पर्यावरणविदों बल्कि विक्रेताओं और खरीददारों के लिए भी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी. मसलन, धुंध की चादर में लिपटी दिल्ली की दिवाली इसी अस्पष्टता में बीत गई कि कितने डिसिमल तक की ध्वनि और कितना धुंआ ‘मान्य’ होगा. नतीजतन दिल्ली में पटाखे फूटे, और जमकर फूटे. धार्मिक ध्रुवीकरण के दौर में लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने-अपने तरीके से चुनौती दे डाली.

सोशल मीडिया ने हमें ऐसे उदाहरणों से भी रूबरू करवाया जहां एक महिला फेसबुक लाइव में कोर्ट के फैसले को चुनौती देती सुनाई पड़ती है. वह लाइव कैमरे के सामने कोर्ट द्वारा पटाखे फोड़ने के निर्धारित समय का उल्लंघन करती है. पटाखे जलाते हुए वह हिंदुओं के त्यौहार के संरक्षण की बात करती है. एक अन्य तस्वीर में एक महिला अपने बच्चे के साथ मुंह पर मास्क पहनकर पटाखे जलाते दिखती है.

राजनीतिक स्तर पर दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के कोई प्रभावी प्रयास नहीं किए गए. हां, इतना जरूर हुआ कि दिल्ली का सरकारी महकमा एक नैरेटिव तैयार करने में कामयाब रहा. नैरेटिव यह कि पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में किसान पराली (पुआल, धान की कटाई के बाद बचे अवशेष) जलाते हैं, जिसकी वजह से दिल्ली स्मॉग से पीड़ित है. पंजाब और हरियाणा सरकारों से आग्रह किया जाता रहा कि वे अपने प्रदेश में किसानों द्वारा खेतों में जलाई जा रही पराली पर रोक लगाएं.

दिल्ली में पसरी धुंध (स्मॉग)

दिल्ली में प्रदूषण की समस्या का राजनीतिक हल नहीं निकल पाने का एक बड़ा कारण है – दिल्ली में केजरीवाल सरकार और केन्द्र सरकार के बीच बेमेल रिश्ते. दोनों सरकारों के बीच न्यूनतम स्तर की राजनीतिक सहभागिता है, जिसका खामियाज़ा दिल्ली की जनता को भुगतना पड़ रहा है.

केन्द्र सरकार की संस्था सिस्टम ऑफ एयर क्वॉलिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग (सफर) के रियल टाइम आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2018 में दिल्ली के वायू प्रदूषण में पराली के धुंए की भागीदारी 3 प्रतिशत से 33 प्रतिशत के बीच रही है.

सफर की रिपोर्ट और सरकार के ब्लेम-गेम का जिक्र मैंने इसीलिए किया क्योंकि दिल्ली में प्रदूषण का सारा जिम्मा पंजाब और हरियाणा के सरमाथे डाल दिया जाता है. वास्तविक स्थिति समझने के लिए मैंने पंजाब के दो सबसे प्रभावित जिलों बठिण्डा और पटियाला की यात्रा की. पंजाब के मालवा क्षेत्र के गांवों में घूमते हुए मैं सैकड़ों किसानों और ग्रामीणों से मिला. उन्होंने मुझे प्रदूषण और दिल्ली केन्द्रित बहसों से बिल्कुल अलहदा प्रतिक्रियाएं दी और पराली की समस्या को व्यापकता में देखने की बात कही.

“पराली-पराली नहीं वीरे, पानी-पानी करो”

सोनीपत, गन्नौर, समलखा, पानीपत, करनाल, कुरूक्षेत्र, अंबाला और राजपुरा के रेल मार्ग होते हुए मैं पटियाला पहुंचा. रेल मार्ग के इर्द-गिर्द जितने भी खेत दिखे, वहां पराली जलाई जा चुकी थी. खेत काले पड़े थे. लेकिन जैसे-जैसे मैं पटियाला के करीब पहुंचता गया, धुंध गहराती गई.

पटियाला शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर है अब्दुलपुर. यहां बड़े स्तर पर धान और गेंहू की खेती होती है. मैंने देखा कि लगभग पचास फीसदी खेतों में पराली जलाई जा चुकी थी. कुछ खेतों में गेंहू की बुवाई भी हो चुकी थी. लेकिन पचास फीसदी खेतों की पराली जलाई जानी बाकी थी.

पराली जलाए जाने के बाद काले पड़े खेत

यहां मेरी मुलाकात हुई अकलजोत सिंह से. अकलजोत सिंह के पास 13 एकड़ जमीन है. मोटे तौर पर उनके खेतों से पराली जलाकर साफ की जा चुकी है. खेतों में आग लगाने के दो-तीन बाद उसकी जुताई की गई और अब कंबाइंड मशीन से गेंहू की बुवाई का काम चल रहा है.

अकलजोत बताते हैं, “हमारे खेतों में पराली पहले से जलती रही है. यह एक किस्म की रीत रही है. फर्क सिर्फ इतना पड़ा है कि पहले यह सर्दी के मौसम में नहीं जलाई जाती थी.”

दरअसल पंजाब सरकार के पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर ऐक्ट, 2009 के अनुसार पंजाब के किसानों को साल के 10 मई के पहले धान की बुवाई करने से मना किया गया है.

पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल  वॉटर ऐक्ट, 2009

2009 में पंजाब सरकार ने यह फैसला तेजी से भू-जल के गिरते स्तर के मद्देनज़र लिया था. चूंकि धान की फसल को अत्यधिक पानी चाहिए होता है, सरकार ने पानी की निर्भरता मानसून से पूरी करने की अपील की. इस कानून के पहले तक किसान राबी की फसल के तुरंत बाद धान की बुवाई करते थे. भूमिगत जल से उसकी सिंचाई की जाती थी.

जहां एक तरफ अकलजोत सिंह मानते हैं, “सरकार हमें कैसे बता सकती है हम कौन सी फसल कब लगाएंगें? हमारे पंजाब में चावल की खपत ही नहीं है और हमारे यहां सबसे ज्यादा धान की खेती हो रही है. आखिर क्यों? क्यों नहीं सरकार धान के मुकाबले दूसरी फसलों (जिसमें कम पानी की खपत होती है) को उचित समर्थन मूल्य देकर प्रोत्साहित करती है? पंजाब सरकार ने खुद ही पराली से प्रदूषण की समस्या को जन्म दिया है.”

वहीं दूसरी तरफ प्रशासकीय पत्राचारों में कहा जाता है कि किसान भू-जल से धान की बुवाई अप्रैल-मई के महीने में करते थे. “इससे जल स्तर पर प्रभाव पड़ता था. इसीलिए यह नया कानून पर्यावरण और किसानों के भले की ही बात है.” यहां धान के अलावा दूसरे फसलों को प्रोत्साहन देने की बात नहीं होती.

अकलजोत और प्रशासन की बातों को जोड़ने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है जलवायु परिवर्तन. किसानों को जलवायु परिवर्तन की चिंता है लेकिन उनकी शब्दावली और संप्रेषण का तरीका भिन्न है.

अब्दुलपुर के किसानों से जब यह पूछा गया कि औसतन बारिश का महीना कौन का है. जवाब में सुक्खी बराड़ ने कहा, “आज से पच्चीस साल पहले तक बारिश मई के अंत तक हो जाती थी. गर्मी होती थी लेकिन इस कदर नहीं कि तापमान 40 से 45 डिग्री तक पहुंच जाता हो. अब बारिश का चक्र पूरी तरह से बिगड़ गया है. अब तो बारिश जुलाई मध्य या अंत तक आती है. वह भी जरूरत मुताबिक नहीं होती.”

सरकार ने 2009 में भूमिगत जल के संरक्षण का हवाला देकर कानून जरूर बना लिया लेकिन उनके पत्राचारों में जलवायु परिवर्तन और भू-जल के गिरते स्तर में संबंध स्थापित होता नहीं दिखता. पंजाब सरकार के कृषि मंत्रालय के सचिव पद के अधिकारी से जब हमने इस बाबत जानकारी चाही तो उन्होंने एक अलग ही राग अलापा.

“आप बेवजह में पराली की समस्या को पानी से जोड़कर मुद्दे को भटकाने की कोशिश कर रहे हैं. यह सोचिए कि मुख्यमंत्री साहब ने किसानों को जब दिशा-निर्देश दिया होगा, तो उनके लिए यह फैसला राजनीतिक रूप से कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा,” कृषि मंत्रालय के अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “कृषि बहुल राज्य में किसी भी सरकार के लिए किसानों के कृषि पद्धति में बदलाव की बात करने मात्र के राजनीतिक मायने भुगतने की संभावना रही होगी.”

स्पष्ट है कि अधिकारी के बयान में हमारे सवालों को जवाब नहीं था. हालांकि अधिकारी जिस ओर इशारा कर रहे थे, उसकी कड़ियां कुछ यूं थीं:

वर्ष 2005 में प्रदेश में अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार ने कृषि समस्याओं से निपटने के लिए पंजाब स्टेट फार्मर्स कमिशन (पीएसएफसी) का गठन किया. पीएसएफसी ने ही भू-जल की संकट से पार पाने के लिए पंजाब सरकार से धान की बुवाई का वक्त निर्धारित करने की गुजारिश की. उनका मानना था कि जल संरक्षण का यही एक तरीका है. तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पीएसएफसी का यह सुझाव मानने से इनकार कर दिया. पीएसएफसी इस बात से अंचभित थी कि जो सरकार बीटी कॉटन और रसायनिक खाद पर सब्सिडी दे रही है, वह धान की बुवाई संबंधी समय निर्धारित करने से क्यों घबरा रही है? जानकार बताते हैं कि अमरिंदर निजी स्तर पर समस्या समझ रहे थे. चुनाव करीब होने की वजह से वह उसके राजनीतिक निहितार्थ की संभावना का भी अंदाजा लगा रहे थे. 2007 में चुनाव हुए और कांग्रेस हार गई. अकाली दल की नई सरकार राज्य में चुनी गई. प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने. एक बार फिर से पीएसएफसी मुख्यमंत्री के पास सुझाव लेकर गया. इस बीच सिंचाई और भू-जल का मुद्दा चुनाव में प्रमुखता से उठा था. मुख्यमंत्री ने पहले तो पीएसएफसी का सुझाव नहीं माना. लेकिन उन्होंने इसे प्रायोगिक तौर पर लागू करने की मंजूरी दी. मुक्तसर के कुछ क्षेत्रों में इसे लागू किया गया. स्थानीय प्रशासन के सख्त रवैये के बाद बुवाई में देरी करवाई गई. उस वर्ष बारिश अच्छी हुई और उसके कारण फसल भी अच्छी हुई. बेहतर नतीजे होने के कारण 2008 में ही ड्राफ्ट को अध्यादेश के रूप में पास किया गया. अंतत वर्ष 2009 में इसे कानून का रूप दिया गया.

पंजाब प्रीजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर ऐक्ट, 2009 के पहले धान की बुवाई मध्य अप्रैल तक की जाती थी. सितंबर में फसल काटी जाती थी. सितंबर में हवा में नमी कम होती है जिसके कारण पराली का धुंआ खेतों के ऊपर नहीं मंडराता था. अक्टूबर में हवा की दिशा अमूमन नॉर्थ-वेस्टरली (उत्तर पश्चिमी) हो जाती है, जिसकी वजह से दिल्ली में धुंध का असर बढ़ता है. नए नियम के बाद हुआ यह कि धान की फसल कटने और गेंहू की बुवाई का अंतर मात्र 15-20 का रह जाता है.

खेतों में लगी आग

पराली की चर्चाओं के संदर्भ में बलविंदर सिंह, युवा किसान कहते हैं, “पराली-पराली नहीं वीरे (बड़े भाई), पानी-पानी चीखने की जरूरत है.” किसानों का मानना है कि पराली की समस्या पानी से जुड़ी हुई है. “पराली जलाने का काम 15-20 दिन होता है. ज्यादा से ज्यादा एक महीना. पानी की समस्या सालों भर है. पानी की वजह से ही हमलोग फसल चक्र में जरूरी बदलाव नहीं कर पाते,” बलविंदर ने कहा. उनके मुताबिक पंजाब सरकार को सर्वप्रथम पानी की समस्या पर ध्यान देने की जरूरत है.

यहां एक अंतरराष्ट्रीय ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ को समझने की जरूरत है. वो यह कि पंजाब सरकार कहती है, धान की फसल में पानी का अत्याधिक इस्तेमाल होता है इसीलिए पंजाब प्रिसर्वेजन ऑफ सब्सॉइल एक्ट लाकर फसल चक्र की अवधि में परिवर्तन का प्रावधान किया गया. जबकि इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टिट्युट (IWMI) के अनुसार, धान के खेत में पानी खड़े रहने (धान के खेत में पानी का जमाव) से भू-जल की मात्रा बढ़ती है. बहुत कम पानी भांप बनकर उड़ता है. उत्तर प्रदेश के संबंध में इंटरनैशनल वॉटर मैनेजमेंट इंस्टिट्युट ने अपने अध्ययन में बताया कि धान की खेती वाले क्षेत्रों में भू-जल का स्तर बढ़ा है.

यह अध्ययन पंजाब सरकार की कृषि नीतियों और नियमावलियों पर संदेह पैदा करता है. संडे गार्डियन की खबर के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) नाम की अंतरराष्ट्रीय संस्था पंजाब सरकार पर हाइब्रीड वैराइटी की जीएम (जेनेटिक्ली मोडिफाइड) मक्के की खेती के विस्तार के लिए दवाब बनाती रही है. पिछले लगभग एक दशक से यह संस्था धान की खेती को भू-जल में कमी का कारण बताती रही है. यूएसएड की एक छवि ‘पॉलिटिकल लॉबिंग’ करने की भी रही है. यह संस्था मोनसेंटो जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भी लॉबिंग का काम करती है. हालांकि किसान संगठनों के भारी विरोध के बाद मोनसेंटो का भारत में बहुत सीमित काम है. लेकिन कॉन्फल्कि्ट ऑफ इंटरेस्ट (हितों का टकराव) तो है ही.

यह बिल्कुल सच है कि मालवा क्षेत्र का भू-जल भयावह स्थिति में है. पानी में रसायनिक तत्वों की भारी मौजूदगी से लोगों को बिमारियां हो रही हैं, जिनमें से मुख्य है कैंसर.

लोगों का दावा है कि मालवा क्षेत्र में कैंसर के प्रमुख कारणों में से एक पानी ही है. हालांकि लोगों के दावे की पुष्टि के लिए फिलहाल कोई वैज्ञानिक अथवा प्रमाणित कारण उपलब्ध नहीं है.

पंजाब सरकार और किसानों की गुत्थम-गुत्थी

1970 के दशक में हुए हरित क्रांति ने पंजाब और हरियाणा को “फूड बाउल ऑफ इंडिया” का दर्जा दे दिया. पंजाब के किसानों को इस ‘प्रशस्ति पत्र’ का अब तनिक भी गुमान नहीं है. बठिण्डा में काउनी (कौनी) गांव के बूटा सिंह बताते हैं, “देश में पंजाब के किसानों की एक छवि बना दी गई है कि वे खुशहाल हैं. समृद्ध हैं. दूसरे प्रदेशों के किसान भाइयों को भी लगता है कि पंजाब के किसान अच्छे खुशहाल स्थिति में हैं. मैं उनकी (दूसरे प्रदेश के किसानों) बातचीत से महसूस करता हूं कि वे भी पंजाब का अनुसरण करना चाहते हैं और अपने राज्य सरकारों से पंजाब जैसी सुविधाएं मांगते हैं. जबकि आज की हकीकत हैं कि पंजाब के किसान अंधकार में हैं.”

बूटा के साथी किसान भी उनकी बातों से सहमति जताते हैं. उनका मानना है कि पंजाब को जितना खुशहाल बताने की कोशिश होती है, दरअसल, वह बाकी प्रदेशों के किसानों को बरगलाने और झूठा तस्वीर पेश करने की कोशिश है. वे पराली की समस्या के इतर पंजाब के कृषि संकट के संदर्भ में विस्तार से चर्चा चाहते हैं. “पराली की समस्या समूचे पंजाब में कृषि संकट का महज एक छोटा हिस्सा है. पराली सीजनल समस्या है. पंजाब के किसानों की बाकी समस्याओं का अगर आप नीतिगत सामाधन करेंगे, तो पराली की समस्या अपने-आप खत्म हो जाएगी,” कहते हुए बूटा सिंह के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच जाती हैं.

आती है ‘साथी’ की याद: ‘गोविंदा’ चावल और ‘साथी’ मक्के की एक वैराइटी है. किसान इसे ‘साथी’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह दो महीने में फसल तैयार कर देता है. यह नब्बे के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में किसानों के बीच काफी लोकप्रिय रहा था. ‘गोविंदा’ को पानी की बहुत जरूरत पड़ती थी. गोविंदा की बदौलत किसान एक खरीफ सीजन (अप्रैल से अक्टूबर) में दो बार धान की फसल कर लेते थे. इससे आमदनी में बढ़ोतरी हुआ करती थी. वहीं कुछ किसान गेंहू की फसल पूरी होने के बाद जमीन के एक हिस्से पर ‘साथी’ मक्के की खेती कर लेते थे.

पंजाब प्रीजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर ऐक्ट, 2009 के बाद ‘गोविंदा’ और ‘साथी’ दोनों पर रोक लगा दी गई. इसके एवज में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पीएयू) ने किसानों को PR 126, परमल और सुपर बासमती वैराइटी का सुझाव दिया. ये हाइब्रीड वैराइटियां हैं. इस संदर्भ में पंजाब सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह भी बताया था कि परमल, सुपर बासमती और PR 126 की फसल के बाद बचने वाली पराली ‘गोविंदा’ की तुलना में कम भारी होती है, अर्थात प्रदूषण कम करती है.

धान कमाई: जगविंदर शर्मा, ‘धुन्नी के’ गांव के पूर्व सरपंच रह चुके हैं. वह 1970 के आसपास का किस्सा सुनाते हैं. वह कहते हैं, “तब (1970 के दशक में) धुन्नी के की जमीन आप एक फीट खोदते तो पानी निकल आता. यहां न कॉटन की खेती हो पाती थी, न ही गन्ने, चने या मकई यहां संभव थी. हमारे धुन्नी के में सरकारी अधिकारी हाथ जोड़कर कहने आते थे कि आपलोग यहां चावल उपजाओ. लेकिन कोई किसान चावल उपजाने को इच्छुक नहीं होता था.”

जगविंदर की बात सुनकर मुझे पंजाब में कृषि संकट के विभत्स रूप का अनुभव हुआ. धुन्नी में मैंने 80 फीसदी खेत धान से पटे देखे. सिर्फ 20 फीसदी ही खेतों में हमने कॉटन और अन्य फसलें देखीं. जबकि मालवा क्षेत्र के बारे में एक धारणा है कि यहां प्रमुखता से कॉटन की खेती होती है.

‘धुन्नी के’ में कॉटन के खेत

2018 के धुन्नी के में मैंने जगविंदर की बातों के बरक्स दो बदलाव देखे- पहला, ज्यादातर खेतों में धान की फसल. दूसरा, सिंचाई का एकमात्र मुख्य माध्यम, नहर का पानी. नहर का पानी बिल्कुल काला था. बठिण्डा में स्थित जूते की फैक्टरियां इसी नहर में अपना कचरा गिराती हैं. अंदाजा लगाना आसान हो जाता है कि अगर जहरीले पानी से खेती होगी तो वह किस कदर कृषि चक्र (एग्रीकल्चर साइकिल) से लेकर खाद्य चक्र (फूड सिस्टम) को प्रभावित करेगी.

वर्तमान में पंजाब में सुपर बासमती का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3100 रूपये प्रति क्विंटल है. ये किसी भी फसल के लिए पंजाब में दिया जाने वाला सबसे ज्यादा समर्थन मूल्य है. यही कारण है कि भले पंजाब में चावल खाने वाले नाममात्र के लोग मिलेंगे लेकिन पंजाब के लहलहाते धान के खेत देश का पेट भर रहे हैं.

बासमती चावल

“सरकार अगर हमें दूसरे फसलों पर एमएसपी बढ़ाकर देगी तो हमलोग बेशक दूसरी फसलों की तरफ मुड़ेंगे. लेकिन जबतक सरकार ही हमें सहायता नहीं देगी, अपनी ही रोजी-रोटी पर लात मारकर दूसरों की सेवा करने का क्या औचित्य होगा?,” मनप्रीत सिंह कहते हैं, “आखिर भूमिगत जल के स्तर गिरने के जिम्मेदार हम किसान भाई तो नहीं हैं न?”

जल चेतना: “आपने (आप) बताओ, पंजाब के किसानों के लिए सरकार ने धान बोने का समय निर्धारित कर दिया, राजी-खुशी हमने मान भी लिया. भू-जल को संरक्षित करने के लिए किसानों ने अपने समय और आमदानी से समझौता भी कर लिया. हम यह सरकार से पूछते हैं कि बताओ भू-जल का अत्याधिक इस्तेमाल किसने किया? क्या जल प्रदूषण या जलस्तर गिरने के जिम्मेदार हम किसान हैं?,” हैप्पी बराड़ पूछते हैं. हैप्पी पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के छात्र हैं और जब भी वह घर आते हैं, खेतों में अपना हाथ बंटाते हैं.

पंजाब का नाम पंजाब इसीलिए पड़ा क्योंकि पांच नदियां यहां से गुजरती हैं. पंज (पांच) और आब (नदी). हालांकि जब इस क्षेत्र का नाम पंजाब पड़ा था, पाकिस्तान भारत का हिस्सा था. बंटवारे के बाद चेनाब और झेलम नदियों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान पंजाब के साथ रह गया. वर्तमान पंजाब में सतलज, ब्यास और रावी नदियां ही सिंचाई का साधन बन पाती हैं. इन नदियों की हालत भी बेहतर नहीं बताई जाती. जल स्तर में गिरावट और पानी में रासायनिक तत्वों की भारी मात्रा नदियों के संकट के कारण बन रहे हैं.

पंजाब में हरित क्रांति के दौर ने जैसे-जैसे खेतों का मशीनीकरण होते देखा, उसमें एक बड़ा बदलाव बोरवेल का भी था. मालवा क्षेत्र में बोरवेल तकरीबन 200 से 400 फीट की गहराई से पानी खींचते हैं. जमीन की एक सीमित सीमा से नीचे जाने पर प्राकृतिक तौर पर भी पानी में रसायनिक तत्वों की मात्रा अधिक होती है. और, जब बोरवेल एक खास प्रेशर के साथ पानी खिंचता है तो वह सक्कशन के कारण पानी की टॉक्सिसिटी को और ज्यादा बढ़ा देता है.

हैप्पी पानी की समस्या का बुनियादी प्रश्न पूछते हैं, “कौन (शहरी आबादी) कितने पानी का इस्तेमाल करता है और कौन (किसान/ग्रामीण) उसकी कीमत चुकाता है.” वह शहरों को डीप बोरवेल, शहरी जीवनयापन और जल प्रदूषण की जिम्मेवारी लेने की बात कहते हैं.

“पराली जल रही है, किसान दोषी
पानी खराब है, किसान दोषी
अनाज की गुणवत्ता खराब, किसान दोषी
जल-थल-मल की बर्बादी का जिम्मा हमारे सिरे
यही होता है जब बीस फीसदी गोरे, अस्सी फीसदी पर राज करते
दोष देते, खुद के गिरेवां में नहीं झांकते”

बादला ने ये पंक्तियां हमें कविता की शक्ल में सुनाया. वह खुद को कवि मानने से इनकार करते हैं. कहते हैं, “सिर्फ गुस्से को शब्दों में ढाल देता हूं, अंगूठा छाप व्यक्ति सिर्फ आंखों (अनुभवों) से सीखता है.” जवानी के दिनों में बादला खुद को कम्युनिस्ट आंदोलनों से जुड़ा बताते हैं.

बादला से मैंने खेती के सिलसिले में बातचीत शुरू करनी चाही, उन्होंने बातचीत की शुरुआत में ही कहा, “धुंए पर भी बात होगी. लेकिन पहले बात पानी की होगी. फिर बात प्रशासकीय निरंकुशता की होगी. अगर तुम सब यह नहीं कर सकते, मतलब तुम पंजाब के कृषि संकट को रत्ती भर नहीं समझते. या समझकर भी अंजान बने रहना चाहते हो. मुझे तुम्हारी अज्ञानता पर लानत है.”

“पूंछ छूकर मत भाग प्रा (छोटे भाई)”

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 (जनवरी 2018 से सितंबर 2018 के बीच) में दिल्ली के लोगों को सिर्फ दो ही ऐसे मौके मिले, जब दिल्ली की हवा “गुड” कैटेगरी में दर्ज की गई. वह भी बारिश के कारण ही संभव हुआ. यहां ये बताने की जरूरत इसीलिए आन पड़ी क्योंकि पंजाब के किसानों के लिए पराली का धुंआ सेकंडरी इश्यू है. पराली ‘जीने-मरने’ का मुद्दा नहीं है. उनकी नजर में प्राथमिकता पानी की है. पानी और रसायनिक खादों की वजह से खेती और इंसानी स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर, किसानों की वरीयताओं में पराली से आगे है. वो किसानों की आत्महत्याओं, महिला किसानों की हालत, अर्थिया (कमिशन एजेंट) की मनमानियों आदि पर विस्तृत चर्चा चाहते हैं. उनके अनुसार, “किसानों की बाकी समस्याओं के हल का प्रयास करने से पराली की समस्या अपने-आप कम हो जाएगी.”

इत्तेफाक से दिवाली के दो दिन मैं गिदड़बाहा और बठिण्डा के ग्रामीण क्षेत्रों में था. समूचे खेतों के ऊपर धुंध की चादर छाई थी. मैं नाक और आंखों में जलन महसूस कर पा रहा था. वहां के लोग भी इसकी शिकायत कर रहे थे लेकिन वे इस बात को लेकर निश्चिंत थे कि ‘यह एक महीने की बात है’. चूंकि प्रत्येक वर्ष पराली जलाने का एक खास वक्त (20 से 25 दिनों) के लिए ही होता है, ग्रामीणों के बीच धुंध एक प्रकार से सामान्य हो चुकी थी.

गिदड़बाहा पंजाब के ‘लंबी’ क्षेत्र में पड़ता है. यह पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का प्रभाव क्षेत्र रहा है. मेरी मुलाकात शिरोमनी अकाली दल के दलित प्रकोष्ठ के सक्रिय कार्यकर्ता राघवदास से हुई. राघवदास कहते हैं, “पराली जलाने की समस्या दिल्ली से काफी गंभीर लगती होगी. लेकिन केजरीवाल को बताइए दिल्ली सालों भर प्रदूषित रहती है. आप दो-तीन चीज़ें समझिए- पहला, पंजाब में किसान सबसे ज्यादा चावल क्यों उगा रहे हैं? दूसरा, मान लिया दिल्ली में फिलहाल स्मॉग का एक बड़ा कारण पराली का धुंआ है, पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जल रही है लेकिन साल के 11 महीने दिल्ली की हवा क्यों खराब रहती है, इसपर कोई बातचीत हो रही है? तीसरा, पराली की समस्या को बाकी कृषि संकटों से काटकर मत देखिए, ये पंजाब और हरियाणा के किसानों के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा. उसे पूर्णता में समझने की कोशिश कीजिए.”

“दो छोटे राज्यों पंजाब और हरियाणा पर ही सारे उत्तर भारत के अनाज की मांग पूरा करने की जिम्मेदारी है. क्या इन अन्नदाताओं के प्रति बाकी उत्तर भारतीय राज्य सरकारों की भी कोई जवाबदेही होगी?,” राघवदास ने कहा.

गिदड़बाहा के किसानों ने इस रिपोर्टर का पूर्वाग्रह भी तोड़ा. मीडिया रिपोर्टों और सरकारी बयानबाजियों को सुनते हुए मेरी यह समझ तैयार हुई थी कि पराली जलाने पर पंजाब सरकार ने प्रतिबंध लगाया है. प्रशासनीक महकमा हरकत में होगा, किसानों को खेतों में आग लगाने से रोकने की कोशिशें चलती होगी.

सेंटर फॉर रिसर्च इन रुरल एंड इंडस्ट्रिअल डेवलपमेंट (सीआरआरआईडी) के अनुसार पंजाब में प्रत्येक वर्ष 22 से 23 मिलियन टन पराली का उत्पादन होता है. अगर इतनी पराली जला दी जाए तो प्रदूषण की भयावहता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होगा. हैप्पी सीडर मशीनों की कमी और धान काटने और गेहूं लगाने के बीच का अल्प समय पराली जलाने के मुख्य कारण जरूर हैं. सरकार ने कॉपरेटिवों के साथ मिलकर पराली के औद्योगिक इस्तेमाल पर जोर दिया, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे. लेकिन राघवदास से बातचीत करते हुए मुझे एक नया राजनीतिक परिपेक्ष्य मिला.

शिरोमनी अकाली दल के कार्यकर्ताओं और सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की अगर किसी मुद्दे पर आम सहमति है- तो वह है पराली. इस मामले पर उनका राजनीतिक विपक्ष भी स्पष्ट है- वह है ‘दिल्ली’. दिल्ली कहने का तात्पर्य है- केन्द्र की मोदी सरकार और राज्य की केजरीवाल सरकार. इसे यूं समझिए कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 1 नवंबर, 2018 को पराली और वायु प्रदूषण के मसले पर बैठक बुलाई. बैठक में राज्य के पर्यावरण मंत्रियों को बुलाया गया था. लेकिन बैठक में पंजाब और हरियाणा दोनों के ही पर्यावरण मंत्री नहीं आए. उनकी जगह उन्होंने नौकरशाहों को भेज दिया. यह पंजाब और हरियाणा में पराली के इर्द-गिर्द नैरिटव की झलक है, जिसका चरित्रार्थ राज्य सरकारों ने किया था.

धान काटने वाली मशीन. यही मशीन अपने पीछे पराली काटकर छोड़ते जाती है.

पंजाब कृषि निदेशक, जी.एस,बैंस के मुताबिक, वर्ष 2018 में 2017 के मुकाबले करीब 35 फीसदी कम खेतों में आग लगाई गई. इस आंकड़े को कृषि निदेशक हैप्पी सीडर मशीनों से जोड़कर देखते हैं.

पंजाब सरकार पराली की समस्या को खत्म करने के लिए मशीनों के उपयोग पर जोर दे रही है, उनमें से एक है हैप्पी सीडर. हैप्पी सीडर धान की फसल को काटता है, धान और पराली दोनों को इकट्ठा करता जाता है. साथ ही गेंहू की बुवाई होती जाती है. एक हैप्पी सीडर यूनिट की कीमत 1.5 से 2 लाख के आसपास होती है. ट्रैक्टर के साथ इसकी कीमत लगभग 6 से 8 लाख हो जाती है. चूंकि यह रकम बहुत ज्यादा है, यह किसानों के लिए फायदे का सौदा नहीं है.

पंजाब सरकार दावा करती है कि हैप्पी सीडर मशीन पर 80 फीसदी सब्सिडी दी जा रही है. किसान इस दावे पर दूसरा तर्क देते हैं. पहला, 80 फीसदी सब्सिडी की बात को किसान नकारते हैं. 50 फीसदी के आसपास सरकार सब्सिडी देती है. दूसरा, ये सब्सिडी की रकम भी मशीन खरीदने के साल भर बाद ही मिलती है. पहले किसान को खुद ही सारे पैसे लगाने पड़ते हैं.

हैप्पी सीडर की जरूरतों ने पंजाब में एक नए किस्म का कारोबार फलने-फूलने लगा है. इकोसिएट्स कंसल्टेंट्स एंड कॉम्यूनिक मार्केटिंग सॉल्यूशन्स, एक दिल्ली आधारित कंपनी है. इस कंपनी के पास करीब 8 से 10 हैप्पी सीडर मशीन है. बठिण्डा के कुछ क्षेत्रों में वर्ष 2017 में इस कंपनी ने किसानों के खेतों से पराली इकट्ठा कर पेपर कार्डबोर्ड बनाने वाली कंपनियों और बिजली कंपनियों को बेचे थे. पराली बेचकर हुए मुनाफे का कोई भी हिस्सा किसानों को नहीं दिया गया.

चूंकि पराली जलाने पर पंजाब सरकार ने रोक लगाया था इसीलिए किसानों ने भी सोचा कि मुफ्त में अगर कोई पराली लेकर जा रहा है, मुनाफा नहीं भी दे रहा है तो कोई बात नहीं. उन्होंने खेतों से पराली ले जाने दिया. वर्ष 2018 में कुछ बड़े किसानों ने इस कंपनी के साथ हैप्पी सीडर का काम शुरू कर दिया. पराली जलाने पर रोक इस वर्ष भी थी. किसान इस बार भी उम्मीद में थे कि कंपनी हैप्पी सीडर मशीन लेकर आएगी और पराली ले जाएगी. कंपनी आई तो जरूर लेकिन इस बार वे खेतों से पराली ले जाने के पैसे मांग रहे थे.

सुखी बताते हैं, “कंपनी वाले एक एकड़ जमीन से पराली उठाने की कीमत 2,000 रूपये मांग रहे थे. किस किसान के पास इतने पैसे हैं कि वो पराली ले जाने के लिए पैसे देगा? जबकि कंपनी पराली बेचकर मुनाफा तो बना ही रही है.”

कंपनी का व्यवहार किसानों को पसंद नहीं आया. किसानों ने हैप्पी सीडर के डिमांड और सप्लाई वाले अर्थशास्त्र में 2000 रूपये के बरक्स माचिस की एक तिल्ली को मुनासिब समझा.

पंजाब सरकार पराली की समस्या से पार पाने के तीन तरीकों पर विचार कर रही है. पहला, बिजली के उत्पादन में पराली का इस्तेमाल. दूसरा, कार्डबोर्ड और पैकेजिंग मैटेरियल का उत्पादन. तीसरा, फर्मेन्टेशन की प्रक्रिया से एथेनॉल का उत्पादन. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बड़ी-बड़ी कंपनियों और कॉपेरेटिव ने सरकार के पास आवेदन किए हैं. इनमें से एक है हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉपरेशन लिमिटेड. उन्होंने लगभग 600 करोड़ रूपये एथेनॉल उत्पादन का कारखाना लगाने का आवेदन किया है. खेती विरासत मिशन से जुड़े मनदीप सिंह कहते हैं, ये जितने भी तरीके सरकार पराली की समस्या से निबटने के लिए ला रही है, “वह सारे कंपनियों और सरकारी नौकरशाही के बंदरबांट की योजनाएं हैं. क्यों नहीं सरकार किसानों को जैविक खेती की तरफ मोड़ने का प्रयास करती है?”

“जैविक खेती के लिए जरूरी सारे संसाधन किसानों के पास है. जैविक खाद (वर्मीकंपोस्ट) बनाने के लिए गाय-भैंस का गोबर, गो मूत्र, कीट (केंचुआ) आदि सारे उपलब्ध हैं,” मनदीप ने जोड़ा.

सैकड़ों के बीच अपवाद एक जैविक किसान

बठिण्डा और पटियाला क्षेत्र के तकरीबन सात गांवों में घुमने के बाद मुझे सिर्फ एक किसान ऐसा मिला जो जैविक खेती कर रहा था. उनके खेत के एक किनारे वर्मीबेड (वर्मीकंपोस्ट संरक्षित करने का स्थान) बना हुआ था. यह वर्मीकंपोस्ट ही जैविक खाद है. इसे तैयार करने का विधिवत तरीका होता है. गोबर को दो से ढाई महीने सड़ाने के बाद, केंचुए डाले जाते हैं. नियमित अंतराल पर गो मूत्र और पानी का छिड़काव होता है. बाकी सारे सातों गांवों में मेरी मुलाकात जितने भी किसानों से हुई, सभी रसायनिक खादों के इस्तेमाल करते मिले.

जगमोहन सिंह खेती विरासत मिशन से जुड़े हैं. खेती विरासत मिशन पंजाब में जैविक खेती पर काम कर रहा है. जगमोहन वर्ष 2005 से जैविक खेती कर रहे हैं. जब हमने उनसे जानना चाहा कि जब समूचा पंजाब ही रसायनिक खेती कर रहा है, ऐसी क्या वजह रही कि वह जैविक खेती की तरफ मुड़ गए. जगमोहन मुस्कुराते हुए कहते हैं, “कोई खास वजह नहीं थी. मैंने खुद को समझाया कि चार पैसे कम ही कमाओ पर जहर मत उगाओ.”

खेती विरासत मिशन से जुड़े जगमोहन सिंह

बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ने पर मालूम हुआ कि खेती विरासत मिशन के सेमिनारों से उन्हें जैविक के फायदे का मालूम चला. “जो विधि हमें सेमिनार में बताते थे, आज से तीस-चालीस वर्ष पहले वही हमारे खेतों में होता था. गोबर, गो मूत्र का प्रयोग करते थे. वर्मी कंपोस्ट बनाया जाता था. ये रसायनिक खेती तो व्यापार केन्द्रित खेती हो रही है. जैविक खेती में हमलोग कुछ नया नहीं कर रहे हैं, वही बाप-दादा के रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे भटक गए थे,” जगमोहन ने कहा.

खेती विरासत मिशन के एक अन्य वरिष्ठ सदस्य दीपू से मेरी बात हुई. उन्होंने बताया, “फिलहाल पंजाब में जैविक खेती का माहौल नहीं बन पाया है. संगरूर में खेती विरासत मिशन लगातार अपना प्रयास कर रहा है.”

जैविक खेती करने से पराली की समस्या से छुटकारा मिल सकता है. वो यूं कि पराली का प्रयोग ‘मल्चिंग’ में किया जा सकता है. इससे मिट्टी में नमी बरकरार रहेगी. मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता बढ़ेगी. फिलहाल जो पंजाब की मिट्टी है, वह अत्याधिक रसायनिक खाद डालने के कारण मृतप्राय हो चुकी है. ऐसे खेतों के पटवन (सिंचाई) में पानी भी खपत काफी ज्यादा होती है. चूंकि मिट्टी स्वस्थ्य नहीं है तो पौधों की जड़ें मजबूत नहीं होती. हल्की सी आंधी में पौधे झुक जाते हैं. मित्र कीटों (मिट्टी के लिए लाभदायक कीड़े-मकौड़े) की मौजूदगी बढ़ती है. रसायनिक खादों से न सिर्फ शत्रु कीट (पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े-मकौड़े) बल्कि मित्र कीट भी मर जाते हैं.

फिलवक्त पंजाब सरकार की तरफ से जैविक खेती को उस तरह का प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है, जैसा मिलना चाहिए था. जबकि मीडिया में सरकार के मंत्री, कृषि विशेषज्ञ और डॉक्टर खेतों में रसायनों और कीटनाशकों को कैंसर का कारण बताते रहे हैं. हालांकि अबतक एक भी ऐसी वैज्ञानिक रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है जिससे कैंसर और रसायनिक खादों के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित किया सके.

बांदी के 40 वर्षीय जसप्रीत को लगता है कि जैविक खेती घाटे का सौदा है. मैंने उनके कथित समझ का कारण पूछा. उन्होंने बताया, “जैविक खेती से पैदा हुई फसल की मार्केट अलग होती है. यहां आप मंडी में धान और गेंहू बेच सकते हो. जैविक साग-सब्जी और अनाज जैविक हाट में बेचे जाते हैं. जैविक फसल का वजन नहीं होता है.”

अलग-अलग गांवों में जब मैंने किसानों के साथ जैविक खेती की बात छेड़ी तो उन्होंने सबसे बड़ी समस्या “जैविक हाट” या “बाजार” का न होना बताया. जैविक पर उनकी बातों का लब्बो-लुआव यह था कि बाजार में उपभोक्ता जैविक फसल की पहचान कैसे करेगा? मनदीप सिंह ने बताया, “मैंने दो साल लगभग दो अकड़ जमीन पर जैविक खेती की. उसी मंडी, जिसमें वर्षों से रसायनिक सब्जियां बिकती रही हैं, वहां मैं जैविक सब्जियां बेच रहा था. न किसी उपभोक्ता ने यकीन किया, न मंडी के बड़े खरीददारों ने खरीदा. उन्हें यकीन ही नहीं हुआ.”

जैविक सब्जियां रसायनिक की तरह चमकती नहीं हैं. न वे बहुत ज्यादा वजनी होती हैं. पर हां, जैविक सब्जियां खाने के वास्तविक स्वाद बरकरार रखती हैं. वे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं. जैविक खेती कर रहे जगमोहन सिंह बताते हैं, “आप हर दूसरे व्यक्ति से सुनते होंगे कि उसे गैस्ट्रिक की समस्या है. ब्लड प्रेशर और मधुमेह (डायबेटिज) आम से लगते हैं. ये रसायनिक खाद से तैयार होने वाली फसलों की देन हैं. जैविक खाने से स्वास्थ्य पर कोई बुरा असर नहीं होगा.”

भारत में जैविक खेती पर काम कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस के सिनियर कैंपेनर इश्तेय़ाक अहमद बताते हैं, “हमारी कोशिश किसानों के बीच व्यवहारिक परिवर्तन करवाने की है. हमें यकीन है कि किसान हमसबों से ज्यादा काबिल और समझदार हैं. उन्हें सिर्फ थोड़ा सा गाइड करने की जरूरत है. सबसे पहले हम उन्हें यह बताने कि कोशिश करते हैं कि कम से कम अपने घर में इस्तेमाल होने भर अनाज को जैविक खेती के माध्यम से उगाए. हम जिन्हें अन्नदाता कहते हैं, उन्हें स्वस्थ्य खाना तो कम से कम मिले.”

खाद की  बोरियां

अनाज के वजन से जुड़ी एक और बात जसप्रीत बताते हैं. यह कि पंजाब प्रीजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर एक्ट, 2009 के बाद धान की फसल प्रभावित हुई है. “जब हमलोग धान की बुवाई में देरी करते हैं, तो काटते भी देरी से हैं. इसके कारण चावल में नमी की मात्रा ज्यादा होती है. इसका नतीजा होता है कि प्रति क्विंटल 300-400 रुपये का नुकसान किसान को झेलना पड़ता है.” किसान के पास दो विकल्प होते हैं. चावल की फसल को सूखने के लिए डाले या कम दाम पर बेचने को मजबूर हो.

बठिण्डा और पटियाला के किसानों की मानसिकता में एक बस घर कर गई है कि उन्हें देश की मांग पूरी करनी है. उन्हें गर्व है कि वे भारत के लिए अन्न उगाते हैं और इससे उनकी ख्याति है. और, इसलिए वे मांग पूरी करने के लिए गुणवत्ता (क्वालिटी) से समझौता को तैयार हैं. यह दिलचस्प था कि जगमोहन की सात एकड़ की जमीन पर धान की खेती नहीं होती. वे गन्ना, अनार, अमरूद, हल्दी और मालटा की जैविक खेती करते हैं. उन्होंने अपने खेत में पराली बिछा दी थी और पानी डालकर खेत को जोत दिया था. जोते गए खेत में गेहूं की बुवाई कर दी. इससे पराली सड़ने लगती है और गेहूं को पर्याप्त जैविक खाद मिल पाता है. इसे मल्चिंग की प्रक्रिया कहते हैं. बुवाई से लेकर कटाई तक की पूरी प्रक्रिया में कभी भी मिट्टी में रसायनिक खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ती.

यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट में मिट्टी के स्वास्थ्य के ऊपर गंभीर बातें कही गईं हैं. लेकिन दुखद है कि स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट का जब भी जिक्र होता है, उसे सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य के संदर्भ में देखा जाता है.

मल्चिंग की प्रक्रिया

मालवा में आम है कैंसर

35 वर्षीय मनप्रीत कौर को 2011 में पहली बार गले में गांठ (लम्पस) की शिकायत हुई थी. उन्होंने स्थानीय डॉक्टर से जांच करवाया. दवा से कुछ दिनों में गांठ में कमी आई लेकिन पेट और छाती में दर्द की शिकायत शुरू हो गई. उनके रिश्तेदार ने उन्हें सलाह दी कि वे बठिण्डा के कैंसर इंस्टिट्यूट में ईलाज करवाएं. वर्ष 2013 में ईलाज के दौरान डॉक्टर ने बताया कि मनप्रीत को सर्वाइक्ल कैंसर है. मनप्रीत का कैंसर शुरुआती स्टेज में ही पकड़ में आ गया था. उनके घर के लिए मनप्रीत का कैंसर झकझोर देने वाला था क्योंकि 2010 में ही मनप्रीत के देवर की मृत्यु ब्लड कैंसर से हुई थी. वह 18 वर्ष के थे. फिलहाल मनप्रीत की किमोथेरेपी चंडीगढ़ पीजीआई से चल रही है.

मनप्रीत कौर

410 घरों के गांव बांदी में तकरीबन सौ कैंसर के मरीज हैं. बच्चे, युवा, महिलाएं, वृद्ध- उम्र सीमा के परे जाकर बांदी में कैंसर के मरीज मिले है. डॉक्टर दूषित और रसायनिक पानी को कैंसर का प्रमुख कारण मानते हैं.

मनप्रीत के पति सुखविंदर बीटी कॉटन की खेती करते हैं. पहले उनके पास 25 एकड़ खेत थे. लेकिन पत्नी की ईलाज के लिए उन्हें 12 एकड़ खेत बेचना पड़ा. बचे 13 एकड़ पर बीटी कॉटन और चने की खेती हो रही है. सुखविंदर बताते हैं, “हां, हमारे खेतों में रसायनों, कीटनाशकों और रे स्प्रे सबका इस्तेमाल होता है. इनका इस्तेमाल नही करेंगे तो फसल बर्बाद हो जाएगी.”

अत्यधिक खाद और रे स्प्रे के छिड़काव से बर्बाद कॉटन के पौधे

सुखविंदर रसायनिक खादों के इस्तेमाल को लेकर सामान्य है. उन्हें मालूम है इससे मिट्टी और पानी को नुकसान होता है लेकिन उन्हें विकल्प कुछ नहीं दिखता. वह बताते हैं, “हम अपने खेतों में ‘उला-लाला’, ‘मैं स्टार दे रूबी’, ‘लैनो’ का उपयोग करते हैं. हर तीन दिन पर ‘रे स्प्रे’ छिड़कते हैं.” इससे स्वत: ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब मिट्टी और पौधों में इतनी ज्यादा मात्रा में रसायनों का प्रयोग होगा, मिट्टी का हालत क्या होगी?

दूर तक फैले कॉटन के खेतों में मैंने एक अजीब तरह की महक महसूस की. सुखविंदर के अनुसार, “खेतों में रे स्प्रे की महक रह जाती है.” सुखविंदर कॉटन के बीज की खराब क्वालिटी से भी परेशान हैं. एक एकड़ जमीन पर करीब 1200 से 1300 रूपये का बीज लगता है. 1500-1800 रूपये का खाद और स्प्रे. उसके बाद भी उत्पाद में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है.

हरित क्रांति के बाद जब पंजाब और हरियाणा के खेतों में रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा तो उत्पाद में बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसका उत्सव मनाया गया और दूसरे राज्यों को पंजाब की मिशाल दी जाने लगी. लेकिन चार दशकों के बाद हालत इतने दुभर हैं कि किसान खेतों में प्रत्येक वर्ष रसायनिक खाद की मात्रा बढाते जा रहे हैं, फिर भी फसल की उत्पादन पर खासा फर्क नहीं पड़ रहा.

मीडिया ने अबोहर से बीकेनर जाने वाली सवारी गाड़ी को “कैंसर ट्रेन” का नाम दे दिया है. कारण कि मालवा क्षेत्र में कैंसर के मरीजों की बड़ी संख्या है. कैंसर मरीज इसी सवारी गाड़ी से बीकानेर के चैरिटेबेल कैंसर अस्पताल ईलाज के लिए जाते हैं.

अबोहर-जोधपुर सवारी गाड़ी. यह गाड़ी ‘कैंसर ट्रेन’ के नाम से भी जानी जाती है. 

पानी और कैंसर के रिश्ते को लेकर पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने मीडिया में अपने वक्तव्य दिए हैं. रसायनों पर नियंत्रण की बात भी कही गई है. पंजाब सरकार ने कुछ रसायनिक खादों को पंजाब में प्रतिबंधित भी किया है. लेकिन जमीनी हकीकत में फिलहाल कोई व्यवहारिक बदलाव देखने को नहीं मिलता.

‘रे स्प्रे ‘का डिब्बा

मनप्रीत के घर में मेरी नजरें रे स्प्रे के डिब्बे पर जम गईं. जिस रे स्प्रे का छिड़काव खेतों में होता है, मनप्रीत के घर में उसमें पानी रखा जा रहा था. यह स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद हानिकारक है.

बतौर रिपोर्टर मैं कोई पूर्वाग्रह लेकर पंजाब नहीं गया था. यह जरूर है कि जिस वक्त मैं पंजाब गया था, उसका चुनाव रणनीतिक था. एक बेसिक आइडिया था कि पंजाब में पराली जलाई जा रही है, इसपर किसानों और कृषि संगठनों से उनकी राय जानूं. जब मैंने यात्रा के दौरान किसानों की राय जानी और यह स्टोरी लिखने बैठा तो विचलित हो उठा कि पराली की समस्या सिर्फ एक समस्या है. पंजाब सहित समूचे भारत के कृषि को ढांचागत और आमूल-चूल बदलाव और राजनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत है.

मसलन, भारत में पंजाब को उन्नत कृषि प्रदेश माना जाता है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000 से 2015 के बीच 16,606 किसानों ने आत्महत्या की है. इनमें से 87 प्रतिशत आत्महत्याओं का प्रत्यक्ष कारण कर्ज रहा है. इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्याओं के बाद किस तरह के सामाजिक बदलाव हुए, इसपर कोई अध्ययन उपलब्ध नहीं है. मृत किसान परिवारों की स्थिति क्या है, उनके बच्चों के पास पढाई पहुंची या नहीं, क्या उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं, क्या उनके बच्चों के पास रोजगार का कोई अवसर है या वे भी खेती के दुष्चक्र में उलझे हैं, क्या वे कभी इससे उबर पाएंगें, महिला किसानों की हालत क्या है आदि – इन सवालों का हल देने की स्थिति में सरकारी व्यवस्था नहीं दिखती.

पंजाब में बैंक के कर्ज के अलावे ‘अर्थिया’ को समझना जरूरी है. ‘अर्थिया’, किसानों की उत्पाद और खरीददारों के बीच का कमीशन एजेंट है. वे किसानों को कर्ज भी देते हैं. राजनीतिक वर्ग से ‘अर्थिया’ की सांठ-गांठ चलती है. 2017 में पंजाब सरकार ने बैंक से लिए गए 2 लाख तक की लोन की रकम को माफ किया. लेकिन जिन किसानों ने ‘अर्थिया’ से लोन लिए थे, वह माफ नहीं किए गए. इस सांठ-गांठ को यूं समझिए कि अर्थिया ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर को ‘फक्र-ए-कौम’ के खिताब से नवाजा है.

मैंने पटियाला में अर्थिया समूहों से बात करने की कोशिश की. उनके अधिकारियों ने मुझे मीडिया से जानकार बात करने से पहले तो मना किया. फिर बाद में कहा, “तुम मीडिया वाले बात का बतंगड बनाते हो. पंजाब में कोई कृषि संकट नहीं है.” मुझे असहाय देखकर अर्थिया एसोसिएशन से जुड़े एक पदाधिकारी ने अपना नंबर दिया. उसने नाम न जाहिर करने की शर्त पर, मुझे फोन पर बताया “ ‘अर्थिया’ जाटों की गुंडागर्दी और बिचौलियों का संस्थात्मक रूप है. आत्महत्याओं का प्रमुख कारण अर्थिया समूह हैं. बिना उनके जाल में फंसे कोई भी मध्यम या छोटा किसान पंजाब में लोन ले ही नहीं सकता. अर्थियाओं को सरकार का समर्थन प्राप्त है. ‘अर्थिया’ को खत्म किए बिना पंजाब में खुशहाली नहीं आ सकती.”

मैं हैरत में था कि अर्थिया से जुड़ा एक पदाधिकारी मुझसे फोन पर अर्थिया के खिलाफ ही आलोचनात्मक बातें कह रहा है. संभवत: इसका कारण था कि पंजाब में कांग्रेस सरकार के पहले अर्थिया समूहों को अकाली दल का समर्थन प्राप्त था. सरकार बदलने के बाद अर्थिया समूह का अध्यक्ष एक कांग्रेसी व्यक्ति को बना दिया गया. और, खुद को ‘सच्चा अकाली’ कार्यकर्ता सिद्ध करने की कोशिश में उसने इस रिपोर्टर को अर्थिया का आलोचनात्मक पक्ष बताया हो. हालांकि बाद में स्थानीय पत्रकारों ने भी अर्थिया पदाधिकारी की बातों से सहमति जताया.

मालवा क्षेत्र में आठ दिन बिताने के बाद ऐसा लगा कि मजबूरियों, बेबसी और दुष्चक्र में फंसा पंजाब चीख-चीखकर कह रहा हो- “पंजाब को खेती के मामले में रोमेंटिसाइज करना बंद करो. धुंए की बहस के बरक्स खेती-किसानी को संपूर्णता में विचारो.”

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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