कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

चीनी के उत्पादन में हुई 6.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी, फिर भी 24,000 करोड़ रुपए के बकाया भुगतान को तरस रहे किसान

चीनी मिलें राजनीतिक दलों के पूर्ण संरक्षण का आनंद लेती हैं, लेकिन इसका लाभ किसानों को नहीं दिया जाता है.

देशभर में चीनी मिल के 20 लाख कर्मचारी और गन्ने का उत्पादन करने वाले 5 करोड़ किसान इन दिनों संकट से जूझ रहे हैं. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के किसानों की मोटी रकम मिल मालिकों के पास बकाया है.

न्यूज़क्लिक की ख़बर के मुताबिक गन्ना किसानों का लगभग 24,000 करोड़ रुपया मिल मालिकों के पास बकाया है.

इंडियन शुगर मिल एसोसिएशन के अनुसार 31 दिसंबर 2018 तक चीनी के कुल उत्पादन में 6.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. 31 दिसंबर 2018 तक देश के 501 चीनी मिलों ने 110.52 लाख टन चीनी का उत्पादन किया था, जबकि 31 दिसंबर 2017 तक 505 चीनी मिलों में मात्र 103.56 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था.

महाराष्ट्र में अत्यधिक वर्षा और सफ़ेद ग्रब संक्रमण की वजह से गन्ने की फ़सल को नुक़सान हुआ था, इसके बावजूद गन्ना उत्पादन में यह बढ़ोतरी देखी गई है. महाराष्ट्र और कर्नाटक में समय पूरा होने से पहले गन्ने की कटाई करने से इस साल गन्ने की उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है.

चीनी के उत्पादन में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक मिलकर देश के कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत योगदान देते हैं. वहीं, देश में चीनी के उत्पादन में यूपी का 36.1 प्रतिशत, महाराष्ट्र का 34.3 प्रतिशत और कर्नाटक का 11.7 प्रतिशत योगदान शामिल है.

महाराष्ट्र में मिल मालिकों पर किसानों के 4,700 करोड़ रुपए का भुगतान बाकी है. गन्ना किसानों को उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) के अनुसार लगभग 15,600 करोड़ रुपये मिलने थे. सिर्फ महाराष्ट्र में 184 मिलों द्वारा 31 दिसंबर 2018 तक कुल 43.98 लाख टन चीनी का उत्पादन किया गया था.

उत्तर प्रदेश में 117 मिलों द्वारा कुल 286 लाख टन गन्ने की पेराई की गयी, जिससे 31 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ. ऐसे में यूपी में 31 दिसंबर 2018 तक गन्ना किसानों का 10,000 करोड़ रुपया चीनी मिलों पर बकाया है.

वहीं, देश के तीसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादन केंद्र कर्नाटक के गन्ना किसानों का 2018-19 तक लगभग 3,990 करोड़ रुपए की राशि बकाया है. प्रदेश में 63 चीनी मिलों द्वारा 31 दिसंबर 2018 तक कुल 20.45 लाख टन चीनी का उत्पादन किया गया था.

तमिलनाडु में गन्ना किसान बकाया राशि के भुगतान के इंतजार में बैठे हैं. हाल ही में तमिलनाडु गन्ना किसान संघ ने राज्य सरकार से यह सुनिश्चित करने की अपील की है कि 1,854 करोड़ रुपये की बकाया राशि का ब्याज समेत भुगतान किया जाए.

तमिलनाडु गन्ना किसान संघ के महासचिव टी रविन्द्रन ने कहा है, “सुगर मिल लाभ साझा करने के फॉर्मूले पर भी धोखाधड़ी कर रहा है. 2004 से 2009 के बीच चीनी मिलों ने किसानों के साथ 240 करोड़ रुपए का लाभ साझा किया था. इसके बाद किसान संघ कोर्ट में गया और वहां मुक़दमा जीता. अपने फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि लाभ शेयर को किसानों के साथ 13 फरवरी 2019 तक साझा किया जाए. अदालत ने इसकी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार को सौंपी थी. लेकिन, अदालत के निर्देशों के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है.”

सामान्य किसानों से इतर गन्ना किसानों को सरकार की तरफ से पूरा सहयोग और लाभ दिया जाता है. इसके बावजूद किसानों की हालत बुरी है, क्योंकि समय पर उनका भुगतान नहीं किया जाता. फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने चीनी मिलों के लिए 10,540 करोड़ रुपए का लोन स्वीकृत किया ताकि किसानों के बकाये का भुगतान किया जा सके.

साल 2018 में चीनी उत्पादन में वृद्धि को देखते हुए सरकार ने इथेनॉल बनाने के लिए 4,440 करोड़ रुपये के सॉफ्ट लोन समेत चीनी मिलों को 8,500 करोड़ रुपए दिए. इसके अलावा चीनी मिलों को 138.8 रुपये प्रति टन के हिसाब से नकद राशि की सहायता भी प्रदान की गयी थी, यह सहायता कुल मिलाकर 4,100 करोड़ रुपए की थी.

स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के मुताबिक चीनी मिलों के तार राजनीतिक दलों से जुड़े हैं. महाराष्ट्र के 180 दोषपूर्ण चीनी मिलों में से 77 चीनी मिलों के मालिक भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं, जबकि 53 चीनी मिलों के मालिक एनसीपी के नेता हैं और 43 चीन मिल के मालिक कांग्रेस पार्टी के नेता हैं. बाकि की सभी चीनी मिलें शिव सेना नेताओं के हैं.

2008 से 2014 के बीच महाराष्ट्र के करीब 39 सहकारी मिलों की बिक्री की गई जिसमें अधिकतर मिलों को भाजपा, कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं ने खरीदा.

स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के राजू शेट्टी का कहना है, “जब सत्ताधारी दल ही सबसे बड़े दोषी हैं तो फिर किसान अपनी फ़रियाद लेकर किसके पास जाएं? राज्य के सहभागिता मंत्री सुभाष देशमुख के चीनी मिल पर 104 करोड़ रुपए के एरियर का बकाया है, जबकि ग्रामीण विकास मंत्री पंकजा मुंडे की चीनी मिल पर 64 करोड़ रुपए का एरियर भुगतान लंबित पड़ा है.”

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