कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

सुंदर वन के निवासियों की पुकार- वोट लेना है तो वन अधिकार कानून लागू करो

सुंदर वन निवासियों ने यह भी कहा कि अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006 को लागू नहीं करने से उनकी अजीविका पर खतरा है.

सुप्रीम कोर्ट के 13 फ़रवरी के आदेश के बाद वन में रहने वाले आदिवासी पलयान को मजबूर हैं. ऐसे में कोलकात्ता के सुंदरवन के मैंग्रोव वन के निवासियों ने शनिवार को मांग की कि यदि उनका वोट चाहिए तो वन अधिकार कानून को तत्काल लागू किया जाए.

सुंदर वन निवासियों ने यह भी कहा कि अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006 को लागू नहीं करने से उनकी अजीविका पर खतरा है.

सबरंग इंडिया के मुताबिक मछुआरो और वनवासियों का संगठन जन शांति समिती के सचिव पावित्रा मंडल ने कहा, “ हम इस अधिनियम को तत्काल लागू करने की मांग करते हैं. हम उसी उम्मीदवार को वोट करेंगे जो हमारी मांग का समर्थन करेगा. वन- निर्भर समुदाय जंगलों को नष्ट नहीं करते हैं क्योंकि यह उनकी आजीविका का एकमात्र स्त्रोत है.”

वहीं, इस मंच के आयोजक तपस मोंडल ने कहा कि “द्वीपों में लगभग छह लाख वन-निर्भर लोग रोज़मर्रा की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें मनमाने और अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है और झूठे मामलों में जुर्माना भरना पड़ता है. उनके वन उपज का संग्रह अक्सर जब्त कर लिया जाता है.

मोंडले ने आगे कहा कि “वनआश्रित लोग जो शहद इकठ्ठा करते हैं, मछलियां पकड़ते हैं. उन्हें वन विभाग द्वारा कानून के नाम पर परेशान किया जाता है.
वन अधिकार अधिनियम उन्हें स्थानीय स्तर पर चुने गए निकायों के माध्यम से जंगल की गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार देता है, जिन्हें ग्राम सभा, कार्यकर्ता कहा जाता है.

अखिल भारतीय वन संघ कामकाजी लोग के महासचिव अशोक चौधरी ने कहा “वन अधिकार अधिनियम में वनवासियों के दावों की अस्वीकृति की कोई अवधारणा नहीं थी. लेकिन अगस्त 2017 में संसद के सामने प्रस्तुत आंकड़ों ने सुझाव दिया था कि 68 प्रतिशत व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को खारिज कर दिया गया था.”

मंच के कार्यकर्ताओं ने वनवासियों सहित आदिवासियों को बेदखल करने के सुप्रीम कोर्ट के 13 फरवरी के आदेश की निंदा की. बाद में, शीर्ष अदालत ने राज्यों के मुख्य सचिवों को वन भूमि पर दावों का निर्णय करने में अपनाई गई प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा.

चौधरी ने कहा, “भले ही शीर्ष अदालत ने अपने 13 फरवरी के आदेश को निलंबित कर दिया है, हम चाहते हैं कि केंद्र सरकार आदेश को अलग करने के लिए अध्यादेश लाए.”

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+