कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भारत को अंधेरे खोह में लेकर जाता अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

कई बौद्ध स्तूपों को तोड़ कर मंदिर बना दिए गए. तो क्या हम इन मंदिरों की जगह पर फिर से बौद्ध स्तूप बनाने की वकालत करेंगे? भारत के उन आदिवासी समूहों के पूजा स्थलों का क्या जिन्हें बलपूर्वक हिन्दू धर्म स्थलों में बदल दिए गए?

अयोध्या ज़मीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भारत में कुछ टूट-सा गया है. कई विमर्शों को जबरन बदल दिया गया है.

अयोध्या मामले की मैराथन सुनवाई करते समय सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि वे उत्तर प्रदेश के किसी ऐसे ज़मीन का मामला नहीं देख रहे हैं, जिस पर फुटबॉल खेलने को लेकर विवाद हुआ है. यह एक मध्यकालीन मसजिद और एक काल्पनिक विशाल मंदिर के बीच की लड़ाई भी नहीं थी. बल्कि यह लड़ाई इस बात के लिए थी कि भारत कैसा देश है और इसे आगे कहां जाना है? यह लड़ाई इस बात को दिखाने के लिए भी थी कि यह देश किसका है और किन शर्तों पर अलग-अलग धर्म और पहचान के लोग इस महान देश में रह सकते हैं.

भारत का एक ही विचार था, जिसे महात्मा गांधी ने अपने पूरे जीवन भर में स्थापित किया था. यह विचार था कि भारत यहां रहने वाले सभी धर्म और पहचान के लोगों के लिए बराबर है और रहेगा. गांधी जी का विचार था कि भारत के मुसलमानों का भी यहां पर उतना ही हक़ है, जितना हिन्दू, सिख, बौद्ध, पारसी या ईसाई समुदाय के लोगों का है. इस विचार के ठीक उलट एक और विचार था जो मानता था कि भारत हिन्दूओं (सवर्ण जाति के लोगों) का देश है. इस विचारधारा के लोगों ने सिख, जैन और बौद्ध धर्म मानने वालों को बस इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि इन धर्म की शुरुआत भारत में ही हुई थी. यह विचारधारा इस्लाम और ईसाई धर्म को विदेशी मानता है और इसके अनुसार किसी ईसाई और मुसलमान को भारत में रहने का अधिकार इसी शर्त पर दिया जा सकता है कि वह बहुसंख्यकों की भावनाओं के हिसाब से अपने धार्मिक गतिविधियों में समझौता कर सके.

अदालत के फ़ैसले की शुरुआती पंक्तियों को पढ़कर लगता है कि कोर्ट इस मामले की सुनवाई “भारत के हिन्दू और मुसलमानों के बीच विवाद” समझकर कर रहा था. जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था. असल में यह विवाद उन स्वघोषित संस्थाओं के बीच था, जो खुद को हिन्दुओं या मुसलमानों के प्रतिनिधि बताते हैं. ना इन संगठनों के पास उनके धर्म के लोगों का कोई प्रामाणिक समर्थन है ना ही उनके लिए कोई फ़ैसले लेने का अधिकार. फिर भी कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि यह विवादित ज़मीन हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए काफ़ी अहम है. कई बार कोर्ट ने अपने फ़ैसले में पक्षकारों की जगह पर “हिन्दू” और “मुसलमान” लिख दिया है. यह एक चिंताजनक बात है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इकाई विश्व हिन्दू परिषद एक कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी संगठन है और यह कहीं से भी भारत के सभी हिन्दुओं का प्रतिनिधि नहीं है. ना ही उत्तर प्रदेश सुन्नी वक़्फ बोर्ड भारत के मुसलमानों का संगठन है.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले में इस तथ्य से साफ़ इनकार किया है, लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि कोर्ट ने इतिहास और आस्था को ध्यान में रखकर ही अपना फ़ैसला सुनाया है. फ़ैसले में कहा गया है कि मसजिद एक ग़ैर-इस्लामिक धार्मिक संरचना के ऊपर बनाई गई थी और सबूत यह भी बताते हैं कि वहां पहले एक हिन्दू मंदिर था. जबकि, सुप्रीम कोर्ट यह भी कहता है कि इस बात के प्रमाण नहीं हैं कि मसजिद तोड़ कर मंदिर का निर्माण हुआ.

जिस पुरातात्विक सबूत के बल पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया वह भी निर्विवाद या शाश्वत नहीं है. लेकिन, यह भी मान लिया जाए कि मसजिद वाली जगह पर पहले एक हिन्दू मंदिर था तो क्या लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा चलाया गया राम मंदिर आंदोलन भी संवैधानिक रूप से जायज था? अगर हां तो कौन बताएगा कि इसका अंजाम क्या होगा? क्या इन ग़लतियों को दूसरे धार्मिक स्थलों के लिए भी सुधारा जाएगा? और हमें कितने साल पुराने इतिहास में जाना चाहिए? हम आख़िरी 500 साल के इतिहास पर ही क्यों रुके? क्यों ना हम 1000, 1500 और 2000 साल पुराने इतिहास पर विचार करें?

इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि 9वीं शताब्दी तक भारत का अधिकांश हिस्सा बौद्ध धर्म को मानता था और इस धर्म के पहचान वाली चीज़ों को ब्राह्मणवादी हिन्दुओं ने बलपूर्वक नष्ट कर दिया. कई बौद्ध स्तूपों को तोड़ कर मंदिर बना दिए गए. तो क्या हम इन मंदिरों की जगह पर फिर से बौद्ध स्तूप बनाने की वकालत करेंगे? भारत के उन आदिवासी समूहों के पूजा स्थलों का क्या जिन्हें बलपूर्वक हिन्दू धर्म स्थलों में बदल दिए गए? क्या माननीय न्यायाधीश हमें बताएंगे कि हमें इतिहास में कितना पीछे जाना चाहिए और हम इतिहास की कुछ चुनिंदा ग़लतियों का ही सुधार क्यों करें? सबसे जरूरी बात यह कि क्या सुप्रीम कोर्ट के जज हमें बता पाएंगे कि संविधान और क़ानून में कौन सा ऐसा प्रावधान है जो हमें कुछ मामलों में  चुनिंदा बना देता है?

एक माननीय जज ने फ़ैसले में कहा कि हिन्दुओं की आस्था और विश्वास है कि मसजिद वाली जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था, इसलिए वे अपने सहयोगी जजों की इस बात का समर्थन करते हैं कि मसजिद वाली जगह को राम मंदिर के लिए सौंप दिया जाए. यह अचंभित करने वाली बात है कि एक ज़मीन बंटवारे की सुनवाई में किसी समुदाय की कथित आस्था और विश्वास को कैसे तवज्जो दिया गया. अगर यह भी मान लिया जाए कि सभी हिन्दू मानते हैं कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था. फिर भी, बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो मानते हैं कि भगवान राम की जन्म भूमि वाली अयोध्या और मौजूदा अयोध्या दो अलग-अलग स्थान हैं.

मौजूदा अयोध्या में भी भगवान राम की जन्मभूमि के अलग-अलग दावे किए जाते हैं. शुरुआती पैराग्राफ में सुप्रीम कोर्ट ने लिखा है- “हिन्दुओं का मानना है कि विवादित ज़मीन भगवान विष्णु के अवतार राम की जन्मभूमि है.” यह सच नहीं है. कुछ ही हिन्दू मानते हैं कि राम का जन्म विवादित स्थल पर हुआ था, जबकि कुछ हिन्दू इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते. कोर्ट ने कुछ हिन्दुओं की आस्था और विश्वास को मानते हुए कैसे मान लिया कि राम का जन्म मसजिद वाली जगह पर ही हुआ था. कोर्ट ने उन हिन्दुओं की आस्था पर विचार क्यों नहीं किया जो यह मानते हैं कि राम का जन्म विवादित स्थल से अलग किसी दूसरी जगह पर हुआ था.

अयोध्या भूमि विवाद की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने एक और कानूनी पहलू को दरकिनार किया. हमारा मतलब उन तीन आपराधिक कारनामों से है जिनकी वजह से मसजिद की यथास्थिति से छेड़छाड़ कर मंदिर बनाने की कोशिश की गई. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में बहुत जगह पर मसजिद की जगह “मसजिद का ढांचा” लिखा है. सुप्रीम कोर्ट की यह भाषा उन हिन्दुत्ववादी संगठनों की तरह ही है जो मसजिद को “एक विवादित ढांचा” बोलते हैं. पहला आपराधिक काम उस दिन हुआ, जब 1949 में मसजिद के भीतर राम की मूर्तियों को ग़ैर-कानूनी तरीके से रखकर मसजिद की नमाज पर रोक लगा दी गई. दूसरा अपराध उत्पाती भीड़ ने 1992 में बाबरी मसजिद को तोड़कर किया. इस अपराध का नेतृत्व लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता कर रहे थे. तीसरा अपराध तब हुआ जब बाबरी विध्वंस के 36 घंटे के भीतर कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए बाबरी मसजिद की जगह पर राम का अस्थायी मंदिर बना दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उन लोगों की पीठ थपथपाता है, जिन्होंने क़ानून को कम से कम तीन बार तोड़ा है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अनादर करते रहे हैं. इसके साथ-साथ इस फ़ैसले से उन लोगों का भी हौसला बढ़ा है जिन्होंने भारतीय संविधान और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा दिए गए धार्मिक समानता केअधिकार का सरेआम माखौल उड़ाया. कोर्ट अपने फ़ैसले में यह भी मानती है कि मसजिद को तोड़ने जैसे अपराध किए गए हैं, लेकिन फिर भी कानून, संविधान और सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने वाले लोगों को पुरस्कृत भी करती है. इन अपराधों की वजह से 1989 से 1993 के बीच देश में दंगों ने सैकड़ों लोगों की जानें लीं. इसके घाव अभी भी नहीं भरे हैं. कोर्ट को ऐसा लगता है कि मसजिद बनाने के लिए 5 एकड़ ज़मीन का मुआवज़ा देकर वह मामले को निपटारा कर रहा है, जबकि कोर्ट यह भूल रहा है कि इस विवाद में मसजिद बनाने के लिए ज़मीन की तलाश कोई समस्या नहीं थी. विवाद यह था कि भीड़ ने जिस मसजिद को ग़ैर-कानूनी तरीके से तोड़ दिया वो मसजिद फिर से बनेगी या उस पर मंदिर बनेगा.

आख़िरी में सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारा देश किस दिशा में जा रहा है. पिछले कुछ सालों से हमें साफ़ तौर पर दिख रहा था कि हम किस ओर जा रहे हैं, लेकिन फिर भी हमें भरोसा था कि भारत की सबसे बड़ी अदालत हमें सही दिशा में लेकर जाएगी और लहरों से टकराते हुए हमें संभालेगी. हम मानकर चल रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट हमें फिर से वही शांति और समान नागरिकता दिलाएगी जिसकी कल्पना आज़ादी के आंदोलन में की गई थी और जिसे संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया है. लेकिन, ऐसा नहीं होना था. इतिहास लंबे समय तक इस वक्त को याद रखेगा कि क्या हुआ और क्या हो सकता था?

लेखक जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. इस लेख को अंग्रेजी भाषा में द वायर के लिए लिखा गया है, जिसका हिन्दी अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.

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