कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

स्वच्छता अभियान: सूखाग्रस्त क्षेत्रों में फ्लॉप लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान

भौगोलिक, आर्थिक व सामाजिक हकीकतों को दरकिनार कर सिर्फ शौचालयों की गिनती पर ध्यान दे रही है बिहार सरकार

बिहार के किसानों के लिए साल 2018 भी अच्छा नहीं रहा. उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं हुई. नतीजतन फसल बर्बाद हो गई है. बिहार सरकार ने 23 जिलों के 206 प्रखंडों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. सरकार ने भले ही सिर्फ 206 प्रखंडों की सूची जारी की हो लेकिन बिहार के 38 में से 33 जिले सूखे की चपेट में हैं. सिंचाई की व्यवस्था न होने से चिंतित किसानों के लिए लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान हास्यास्पद और उनका माखौल उड़ाने जैसा है.

दरअसल, 2 अक्टूबर, 2014 को भारत सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. स्वच्छ भारत अभियान के दो भाग हैं- ग्रामीण और शहरी. बिहार सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान को ही लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के नाम से लॉन्च किया था. इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों को खुले में शौच मुक्त बनाना है. 2 अक्टूबर, 2019 महात्मा गांधी की 150वीं जन्म जयंती के अवसर पर बिहार सहित समूचे भारत को खुले में शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य है.

पानी की विकट समस्या और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान फ्लॉप शो साबित हो रहा है. उसकी कई वजहें हैं, जिसकी चर्चा हम रिपोर्ट में आगे करेंगे. दिलचस्प है कि स्थानीय सरकारी महकमे को भी योजना की खामियों का अंदाजा है. चूंकि केन्द्र सरकार की ओर से डेडलाइन पूरा करने का दबाव है इसीलिए ‘काग़ज़ों’ पर गांवों को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) बनाने का काम तेजी से हो रहा है.

नहीं हैं शौचालय बनवाने के पैसे

25 वर्षीय अखिलेश मांझी भूमिहीन मजदूर हैं. वह समृद्ध किसानों के खेतों में मजदूरी करते हैं. उनका परिवार मटियानी गांव (बोधगया प्रखंड) के बेलाही टोला में पिछले 40 वर्षों से रह रहा है. वह बताते हैं कि उनका परिवार इन 40 वर्षों से खुले में ही शौच जाता रहा है.

अखिलेश मांझी, भूमिहीन मजदूर

 

अक्टूबर 2016 में पहली बार जीविका (JEEVIKA) (बिहार में गरीबी उन्मूलन के लिए बनाए गए स्वयंसेवी समूह) कार्यकर्ताओं ने अखिलेश के गांव में शौचालय बनवाने की बात कही. “हमें बोला गया कि घर में शौचालय होना चाहिए. सरकार हमें आर्थिक सहायता देगी. लेकिन बाद में मालूम चला कि पहले हमें अपने पैसे से शौचालय बनवाना होगा, बाद में सरकार पैसा देगी,” अखिलेश मांझी कहते हैं. वह आगे जोड़ते हैं, “महीने का बमुश्किल 4000 से 5000 हजार रुपया कमाते हैं. इस पैसे में घर की मूल जरूरतें ही पूरी नहीं होती, शौचालय कहां से बनवाएंगें?,” अखिलेश ने कहा.

अखिलेश मांझी की पत्नी आंती देवी बताती हैं कि उन्होंने सालभर में 2500 रूपये की बचत की थी. सरकार की योजना से उत्साहित होकर आंती ने बचत के सारे पैसे शौचालय बनवाने के लिए गड्ढा खुदवाने में लगवा दिया. “पैसे कम पड़े तो मदद के लिए हम जीविका कार्यकर्ताओं के पास गए. वही लोग शौचालय बनवाने के लिए कहने आईं थी लेकिन मदद मांगने पर उन्होंने हमें आर्थिक सहायता नहीं दी. फिर हमारी शौचालय बनाने की हिम्मत टूट गई,” आंती बताती हैं.

अबतक गांव में सिर्फ 4 घरों में शौचालय बने हैं. उनमें एक है सोनवा देवी का परिवार. उन्होंने फरवरी 2018 में सेप्टिक टैंक वाला पक्का शौचालय बनवाया था. वह बताती हैं, “महिलाओं के लिए खुले में शौच जाना किसी सामाजिक उत्पीड़न से कम नहीं है. पति से लड़कर हमने सेठ से कर्ज लेकर शौचालय बनवा लिया. शौचालय बने 10 महीने होने वाले हैं. अबतक सरकारी सहायता राशि हमें नहीं मिली है.” सोनवा देवी ने गांव के ही सेठ से 20,000 हजार रूपये कर्ज लिया था. ब्याज मिलाकर अब यह रकम 35,000 के आसपास पहुंच गई है.

सोनवा देवी को सहायता राशि मिलने में देरी दूसरे ग्रामीणों को शौचालय बनाने से हतोत्साहित करती है. “शौचालय हमें भी चाहिए लेकिन ऐसा शौचालय बनवाकर क्या करेंगे जिसके बाद खाने के ही लाले पड़ जाए?” कहते हुए मालती देवी की आवाज़ में रोष झलकता है. वह चाहती हैं कि सरकार शौचालय बनाने के लिए पहले सहायता राशि देती ताकि किसी को भी कर्ज लेने को विवश न होना पड़े.

बेलाही टोला में ज्यादातर लोग मांझी समुदाय (अनुसूचित जाति) से ताल्लुक रखते हैं. दिहाड़ी मजदूरों की इस बस्ती में किसी के पास अपनी कोई जमीन नहीं है. चार शौचालय जो गांव में बने हैं, उन चारों के पास अपनी जमीन है. विस्थापन का डर भी शौचालय बनवाने के आड़े आ रहा है. “अगर कल सरकार हमारी जमीन छीन ले तो हम लोग क्या करेंगे? माथे पर छत होगा नहीं, शौचालय में पैसा भी फंस जाएगा,” मालती देवी कहती हैं. उनकी बात से सहमति जताते हुए अखिलेश कहते हैं, “यह सच है कि शौचालय जरूरी है लेकिन उतना ही जरूरी है अपना घर.” एक तरफ रोजगार और छत की अनिश्चितता. दूसरी तरफ शौचालय बनाने के लिए जरूरी साम्रगी (ईंट, बालू, सीमेंट और मजदूरी) का मंहगा होना. कुल मिलाकर गरीब परिवारों के लिए शौचालय निर्माण  प्राथमिकता की सूची से बाहर हो जाता है.

भौगोलिक स्थितियों को नज़रअंदाज करके बने हैं शौचालय

गंगा नदी के बहाव के स्तर पर बिहार दो भागों में बंटता है- उत्तरी बिहार और दक्षिणी बिहार. उत्तरी बिहार में कोसी नदी बहती है. यह नदी हर वर्ष उत्तरी बिहार में भीषण बाढ़ का कारण बनती है. वही दक्षिण बिहार में सोन, गंडक और फलगू नदी बहती है. ये बारहमासी नदियां (पेरिनिअल रिवर) हैं. बरसात का मौसम छोड़ बाकी महीने इन नदियों के प्रवाह का स्त्रोत जमीन के नीचे संचित भूजल होता है. जलवायु परिवर्तन के कारण इन नदियों के चरित्र में अमूलचूल परिवर्तन आ गए हैं. भू-जल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है. यही कारण है कि दक्षिण बिहार का एक बड़ा भू-भाग सूखे की चपेट में है.

दिक्कत यह है कि सरकार की योजना “देसी शौचालय”/ “इंडियन लैट्रिन” को ही हर जगह मॉडल शौचालय की तरह पेश कर रही है. दिनभर में एक व्यक्ति के एक बार इंडियन लैट्रिन उपयोग करने पर औसतन 8-10 लीटर पानी की जरूरत होती है. अर्थात चार लोगों का परिवार दिनभर में एक बार भी लैट्रिन का उपयोग करता है तो उसे 32-40 लीटर पानी की जरूरत होगी. सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जहां पीने की पानी का भी अकाल है, वहां यह मात्रा शौचालय के लिए इकट्ठा करना नामुमकिन जैसा है.

सूखाग्रस्त क्षेत्र में देसी शौचालय का हाल

 

जमुई जिला के केनुहट गांव में जौहरी मांझी योजना के तहत शौचालय बनवाने वाले पहले शख्स थे. उन्हें सरकार की तरफ से सहायता राशि भी मिल गई है. लेकिन उनका परिवार पानी की कमी के कारण  शौचालय का उपयोग कम ही करता है. “घर की महिलाएं शौचालय में जाती हैं. मर्द खुले में जाते हैं शौच करने,” जौहरी मांझी इसके पीछे एक दिलचस्प तर्क देते हैं.

सरकार के विज्ञापनों में खुले में शौच न जाने के लिए प्रेरणादायी स्लोगन दिए गए हैं. उनमें से कुछ स्लोगन जिसपर ज्यादा जोर दिया गया है, “वह है घर में शौचालय बनवाएं, मां-बहनों की लाज बचाए,” “बेटी ब्याहो उस घर में, शौचालय हो जिस घर में,” आदि. इन अपीलों का केनुहट में असर यह हुआ है कि जिन परिवारों ने शौचालय बनवा लिया, उसका उपयोग सिर्फ महिलाएं करती हैं. “सरकार की बात से हमलोग भी सहमत हैं, बहु-बेटी को खुले में शौच नहीं जाना चाहिए. हमलोग उनके लिए पानी किसी तरह शौचालय में पानी का व्यवस्था कर देते हैं. बाकी मर्द लोटा लेकर सुबह-सुबह खुले में शौच कर लेते हैं,” जौहरी बताते हैं. जौहरी बॉलीवुड फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा से प्रभावित हैं. यह भी एक कारण है कि वह महिलाओं के लिए शौचालय की अनिवार्यता को प्राथमिकता देते हैं.

जौहरी मांझी

 

जौहरी के घर के करीब एक चापाकल है लेकिन उसमें नियमित पानी नहीं आता. दूसरा चापाकल उनके घर से करीब 500 मीटर की दूर पर है. गांव में यही दो चापाकल जल स्त्रोत हैं. अहले सुबह ही मर्द बर्तनों-बालटियों में पानी का स्टॉक कर जाते हैं. कई बार पीने का पानी भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाता, मजबूरन महिलाएं कपड़े धोने के बाद बचा गंदा पानी शौचालय में धोने के उपयोग में लाती हैं. और, जब गंदे पानी का भी इंतेजाम न हो तो महिलाएं भी मर्दों की ही तरह खुले में शौच जाने को मजबूर होती हैं.

वहीं बाढ़ प्रभावित इलाकों में इंडियन लैट्रिन कारगार नहीं है क्योंकि उसकी सोख्ता टंकी जमीन के नीचे बनती है. बाढ़ आने पर यह व्यवस्था ध्वस्त होने के साथ-साथ बिमारी का कारण भी बनती है. जीविका कॉर्डिनेटर राजेन्द्र प्रसाद बताते हैं, “सरकार की यह योजना पूरी तरह बकवास है. बिना भौगोलिक स्थितियों का पता लगाए आप हर जगह एक ही मॉडल लागू कर रहे हैं. यह आने वाले वक्त में जी का जंजाल बनने वाली है.”

स्वच्छ नहीं, ‘अस्वच्छ’ बिहार अभियान है ये

सरकारी तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद राजेन्द्र प्रसाद योजना की खामियों को गिनवाने में नहीं हिचकते.  वह कहते हैं, “पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने दो गड्ढों वाला शौचालय (लीचपीट) बनाने का सुझाव दिया है. नियम के मुताबिक इसकी दूरी जल स्त्रोत से तकरीबन 10 मीटर की दूरी पर होनी चाहिए. लेकिन आप गांवों में घूमेंगे तो पाएंगें कि शौचालय से जल स्त्रोत की दूरी बमुश्किल 2 मीटर भी नहीं है. इसका मतलब है कि जो भी जलमल टंकी में इकट्ठा हो रहा है, उसका रिसाव ग्राउंड वॉटर को प्रदूषित कर रहा है. यह खतरनाक स्थिति है.”

दो गड्ढों वाला शाौचालय (लीचपीट)

 

जमुई, शेखपुरा और गया के गांवों में घूमते हुए हमने देखा कि शौचालय की टंकी और जल स्त्रोत की दूरी को बिल्कुल नजरअंदाज किया गया है. हालांकि बातचीत में लोगों ने नियम से जुड़ी वास्तविक समस्या बताई. जमुई के संतोष बताते हैं, “गांवों की जनसंख्या का घनत्व अब इस प्रकार नहीं बचा है कि दो घरों की दूरी 10 मीटर हो. थोड़े-थोड़े दूरी पर मकान बने हैं. बहुत लोग जानबूझकर भी पानी के स्त्रोत से सटाकर ही लैट्रिन बनवाते हैं ताकि पानी आसानी से उपलब्ध हो सके.”

आर्थिक ढांचे में बदलाव के साथ सामाजिक रिश्तों के भी दायरे टूटे हैं.  गांवों में भी छोटे परिवार (न्यूक्लिअल फैमिली) का चलन बढ रहा है. “घर में भाईयों के बीच जमीन का बंटवारा हो गया. दोनों के अलग-अलग शौचालय होंगे. चापाकल अलग हो जाएंगें. यहां कैसे 10 मीटर की दूरी का पालन हो सकेगा?,” संतोष कहते हैं.

एक तो पानी की किल्लत और दूसरी तरफ जो पानी है, उसे सरकारी योजना ही प्रदूषित करने पर विवश कर रही है. हरिहर पासवान ने अपने गांव बरबीघा में शौचालय के जलमल के रिसाव से होने वाले प्रदूषण के रोकथाम के लिए दूसरा उपाय अपनाया. उन्होंने सेप्टिक टैंक बनवा लिया. सेप्टिक टैंक बनवाने में करीब 30-35,000 हजार का खर्चा भी आया. यह लीचपीट से बेहतर है लेकिन समस्या है कि सेप्टिक टैंक के लिए जरूरी ड्रेनेज सिस्टम नहीं है. लीचपीट शौचालय से होने वाले जल प्रदूषण का खतरा जानते हुए भी ग्रामीण हरिहर पासवान की तरह सेप्टिक टैंक बनवाने का सामर्थ्य नहीं है.

सामूदायिक शौचालयों का बेड़ा गर्क

भारत में प्रभावशाली तरीके से भूमि सुधार नहीं हुए हैं. आजादी के बाद विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन की शुरुआत की लेकिन वह वॉलेंट्री स्तर पर था. जिसमें जमींदारों के उनकी जमीन का एक हिस्सा दान में मांगा गया. केन्द्र और राज्य सरकारों ने जरूर विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत भूमिहीनों को आर्थिक सहायता या आवास बनवाकर दिया है. इसके बावजूद 2011 जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, 14.43 करोड़ भूमिहीन मजदूर भारत में मौजूद हैं. भूमि और भूमि पर स्वामित्व का अभाव भी स्वच्छ भारत अभियान के आड़े आ रहा है. हालांकि योजना के अंतर्गत भूमिहीनों के लिए सामुदायिक शौचालय बनवाने का प्रावधान है.

केनुहट के लोगों ने गांव में बने सामुदायिक शौचालय की जो हाल दिखाई, वह हैरत करने वाली थी. तीन तरफ दीवार से खड़ी की गई शौचालय, न उसमें दरवाजा था और न ही छत. सीट भी इस अंदाज में लगाए गए थे कि वह किसी काम लायक नहीं था. अरूण सिंह बताते हैं, “जिस दिन सामुदायिक शौचालय की पड़ताल होनी थी, गांव के लोगों को मुंह खोलने से धमकाया था. यह ठेकेदारों का कारनामा है. सस्ते माल से शौचालय बनाया, वेरिफाई करवा लिया और पैसा बनाकर निकल गए.”

केनुहट, सामुदायिक शौचालय

 

सात महीने पहले बने सामुदायिक शौचालयों का कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. इसकी दयनीय ढांचा अब ऐसी हालत में पहुंच गए हैं कि उपयोग नहीं किया जा सकता. सरकारी योजनाओं में धांधली की रोकथाम के लिए ही सरकार ने लाभार्थियों को सहायता राशि शौचालय निर्माण के बाद देने का प्रावधान किया था.

नहीं हुआ है व्यवहार परिवर्तन

बिहार सरकार ने शेखपुरा जिले को अगस्त 2018 में ही खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया था. सरकारी काग़ज़ों के मुताबिक शेखपुरा में पर्याप्त संख्या में शौचालय बना दिए गए हैं और यहां लोग खुले में शौच नहीं कर रहे. लेकिन हमने जमीनी हकीकत को सरकारी दावों से अलहदा पाया.  जीतू नारायण ने जनवरी 2018 में ही लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत लीचपीट शौचालय बनवाया लिया था. उन्हें सरकारी सहायता राशि भी मिल चुकी है. पर शौचालय निर्माण के 10 महीने बाद तक उन्होंने सिर्फ दो बार ही शौचालय का उपयोग किया गया है. जीतू कहते हैं, “खुले में जाने से पेट ठीक रहता है. शौचालय में बैठने से मन-मिजाज़ खराब हो जाता है.”

जीतू की तरह ही उनकी पत्नी भी तर्क देती हैं. वह शर्माते हुए कहती हैं, “अभी आदत नहीं है हमलोगों को लैट्रिन में बैठने का. खुले में ही अच्छा महसूस होता है.”  शेखपुरा के अलावा बिहार के अन्य जिलों में भी हमने देखा कि शौचालय बन जाने के बावजूद लोग उसका प्रयोग नहीं कर रहे हैं. पानी की किल्लत और ढांचागत कमियां तो शौचालय न इस्तेमाल करने के कारण हैं ही. लोगों के व्यवहार में परिवर्तन न हो पाना भी एक बड़ी चुनौती है.

व्यवहार परिवर्तन के संदर्भ में ब्लॉक कॉर्डिनेटर दलजीत कुमार कहते हैं, “अगर सरकार चाहती है कि भारत को खुले में शौच मुक्त बनाना है तो सबसे जरूरी है माइंडसेट शिफ्ट करना. व्यवहार में परिवर्तन सैनिटेशन प्रोग्राम का मूल तत्व होता है. पर सरकार ने इसपर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. इसी का नतीजा है कि शौचालय बनने के बावजूद लोग उसका प्रयोग नहीं कर रहे हैं.”  दलजीत की बात से सहमति जताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता इश्तेयाक़ कहते हैं, “यह सबसे जरूरी है कि सरकार ने शुरुआत कहां से की है.  सरकार शौचालयों की गिनती पर जोर दे रही है. मतलब जमीन पर बदलाव आपकी वरीयता नहीं है.  सरकार योजना पूरी करने का कोरम निभा रही है.”

स्वच्छता अभियान की पड़ताल का दूसरा भाग यहां पढ़ें( स्वच्छता अभियान: “फायदेमंद शौचालय” से पर्यावरण को कोई घाटा नहीं )

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में निवास करते हैं)

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